औरतों का डिब्बा : चाय, मांडे और ऊपर वाली बर्थ

उफ़ चलो शुक्र है ट्रेन चली तो. आज भी मैं लेडीज कोच में ही बैठी हूँ. वैसे इस कोच में औरतों से ज्यादा बच्चे हैं. समझ नहीं आता औरतें इतने बच्चे क्यूँ पैदा करती हैं..?? और फिर पूरी बर्थ घेर लेती हैं. सीट पर एक साथ सोते बच्चे ऐसे लग रहे हैं जैसे एक दूसरे से सटे मटर के दाने हो. शायद इन मटर के दानो में ही कहीं सोयी पड़ी होगी मेरी आज के सफ़र की कहानी.

देखें कब कैसे नज़र आती है. चलिए सोने देते हैं इन्हें . हम उस बूढ़ी सी औरत को जगाते हैं जो पिछली दफा मुझे भोपाल से उज्जैन आते वक़्त “जयपुर भोपाल” ट्रेन में मिली थी.

अरे वही जी जिसके सामान की गठरी में मेरे उस दिन की कहानी थी. ज़रा सी खिन्न सी हो गयी थी वो जब मैंने जबरन उसके पास अपनी जगह बनायी थी.

खैर अक्सर ऐसा होता ही रहता है. हम सोच के चलते तो हैं कि ये पूरी दुनिया हमारी है सिर्फ हमारी . मगर धीरे धीरे हमारे आजू बाजू आगे पीछे ढेर से रिश्ते जमा होते जाते हैं. जो सिखाते हैं हमें अपनी जगह बचाने के लिए जद्दो जहद करना, समझौते करना. बिलकुल इस कोच की तरह.

अम्मा ने भी अपने पाँव सिकोड़ लिए थे.

चाय चाय चाय … ओ अम्मा लो चाय पी लो. (मेरा सबसे सस्ता सुन्दर और हमेशा काम आने वाला तरीका है ये किसी को पटाने का, या यूँ कहूँ आभार व्यक्त करने का.)

अम्मा ज़रा सकुचाई, चाय पीते पीते धीरे से उन्होंने वो पोटली खोली जिसमें मेरी कहानी रखी हुई थी. उन्होंने उसमे से मेरे लिए दो तीन नान खटाई या टोस्ट सरीके कुछ पीस निकाले.

अम्मा ये क्या है…??

बेटा ये मांडे हैं. अपने पोते के लिए ले जा रही हूँ अजमेर. पढ़ता है ना वो वहाँ मदरसे में.

जी हाँ आपने सही समझा वो अम्मा मुस्लिम थी.

सच ट्रेन का ये जनरल कोच ऊँच नीच जात पात सब भुला देता है. यहाँ लड़ाई का मुद्दा सिर्फ पाँव भर जगह है.

खैर..

चाय की चुस्कियां और मांडे के साथ मुझे कहानी का किरदार भी मिल चुका था..
पता चल चुकी थी उसकी आर्थिक स्थिति जो की अम्मा की पोटली से झांक रही थी.

ओह्ह अच्छा कौनसी क्लास में पढ़ता है??

पता नहीं .. 6 7 बरस से पढ़ रहा था भोपाल में अभी महिना भर पहले ही अजमेर दाखिला करवाया है.

‘अच्छा आप अजमेर में रहने जा रहे हो भोपाल से. ”

“नहीं घर तो यहीं हैं वहाँ इसके दादा को पीर बाबा आते ना, तो तारिख पे जाने का पड़ता बार बार मेरे को.”

तारीख??

हाँ बेटा हमारा किया पीछा नहीं छोड़ता. यहीं का यहीं भुगतना पड़ता है.

चाय का स्वाद अब धीरे धीरे उतर रहा था अब कहानी चढ़ रही थी.

मैं समझी नहीं अम्मा??

अरे बेटा हम मजदूर लोग. इसके दादा पहले फैक्ट्री में काम करते. बोले यहाँ काम धंधा नहीं, बम्बई जाके काम करूँ. वहाँ काम काज तो कुछ किया नहीं उल्टा दूसरी शादी बना ली इस आदमी ने.

यहाँ तीन बच्चे छोड़ के गया वहाँ दो और पैदा कर लिए.

मैं जैसे तैसे कचरा पट्टी साफ़ करके मजूरी करके अपना घर सम्भाला तो ये मरद मेरे कन्ने आ धमका. इसके पीछे इसकी औरत और बच्चे भी आ गए रोते रोते .

अब बेटा आदमी क्या जाने औरत का दुःख . वो तो बस औरत को पेट से करके मन भर जाए तो ये चला वो चला. जैसे तैसे मैंने इसको थोड़े पैसे देके वापस भेजा. अब उस औरत को क्या कोसूं, वो भी बच्चे वाली. जा बाई तू भी जा. सम्भाल अपना घर. मैंने तो जिंदगी बिना मरद के काट दी. बच्चे पाल लिए. शादी कर दी.

फिर ?? फिर ये बब्बा वापस कैसे आ गए??

अरे बेटा खुदा का करम.

जबसे इसको पीर आये इसकी दूसरी जोरू छोड़ के चली गयी. अब मैं ही इसके साथ हर तारीख पर दरगाह रहती हूँ. सेवा करती हूँ.

भोत लोग आते बेटा वहाँ. खूब देके जाते. आराम से गुजारा होता.

अरे अम्मा क्या अच्छे से गुज़र होती, छोड़ क्यूँ नहीं देती बाबा साब के भरोसे. रहो ना यहाँ अपने बच्चों के पास.

वो कहाँ भुगत रहे, भुगत तो आप रही हो..

ऐसे कैसे छोड़ दूँ बेटा फरज अपना. आदमी है वो मेरा. खुदा को क्या मुंह दिखाउंगी ??

अब और क्या कहती, क्या सुनती.

अम्मा तो खुदा को अपना मुंह दिखा देगी, पर क्या खुदा उसे अपना कौन सा मुंह दिखायेगा?

– निवेदिता भावसार

Comments

comments

loading...

LEAVE A REPLY