राजनीति राष्ट्र हित का माध्यम है, लक्ष्य नहीं

कई महीनों से मन में बड़ी उथल-पुथल मची हुई है.

सोशल मीडिया पर ख़ासी सक्रियता रखने वाले हम राष्ट्रवादी लोग अपनी समझ से जिसे राष्ट्र हित समझते हैं, के लिये काम करते हैं.

यह पिछले 5-7 वर्ष की सक्रियता का परिणाम है.

हम में से कई विद्वानों की लेखनी बहुत चोखी-तीखी और तेजस्वी है. परिणामतः उनकी पोस्ट सैकड़ों, हज़ारों की संख्या में शेयर की जाती है. लाइक तो कहीं अधिक होते हैं.

इससे बड़ा लाभ यह भी हुआ है कि इन दीपकों से और हज़ारों दीपक लौ पकड़ गए. प्रारंभ में कुछ लेखनियों से शुरू हुआ यह क़ाफ़िला अब हज़ारों, लाखों लोगों के समवेत स्वर का तुमुल नाद बन गया है.

ये मंज़िल ज़रूरी मंज़िल है, मगर क्या यह हमारा अंतिम गन्तव्य है? मेरी दृष्टि में अब हमें अगला पड़ाव तय करना चाहिए.

इस मोड़ पर अनेकों लोग ठहरना चाहेंगे. कई साथियों का लक्ष्य विधान सभा, लोक सभा का टिकिट, राज्य सभा की सदस्यता होगी. उनका गन्तव्य निकट होगा अतः उनके पैर धीमे हो जाएंगे. इसमें कुछ ग़लत भी नहीं है.

आख़िर किसी को तो यह भूमिका निभानी ही है तो अपने वैचारिक साथी को इस दिशा में बढ़ते देखना सुखद ही है.

शेष बचे लोगों को अब तय करना ही चाहिए कि हम अपनी सक्रियता से क्या परिणाम चाहते हैं? हमें अगले लक्ष्य तय करने ही चाहिए.

हमारी सक्रियता का राजनैतिक परिणाम स्वाभाविक रूप से भाजपा के पक्ष में जाता है. यह ठीक भी है कि सोनिया गांधी, मनमोहन सिंह, दिग्विजय सिंह, लालू प्रसाद, मायावती, अखिलेश, ममता बानो से भाजपा निश्चित ही बेहतर है, मगर क्या पर्याप्त है?

भाजपा की विजय से राष्ट्र और धर्म का क्या हित हुआ? हम भाजपा की पालकी उठा कर राष्ट्र और धर्म के लिये चले थे. भविष्य में भी चलेंगे, किन्तु भाजपा को राष्ट्र और धर्म के हित के लिये प्रेरित, उत्सुक, आग्रही बनाने का कार्य भी तो हमारा ही है.

हम लोग राष्ट्रवादी संगठनों से जुड़े हो सकते हैं मगर उस विचार का परिणाम नहीं हैं. हम सबकी क्षमताएं संगठनों के कारण विकसित नहीं हुई हैं.

हम सब अपने स्वभाव, क्षमता के कारण इस पथ पर चले थे और हम सबने राष्ट्र और धर्म के ह्रास से विचलित हो कर, इस स्थिति में बदलाव के लिये लेखनी का माध्यम चुना था. हमारी लेखनी हमारी खड्ग और चाबुक दोनों है.

एक वर्ष बाद अर्थात 2019 में उन शक्तियों जो राष्ट्र और धर्म को ध्येय मानते हैं और उन शक्तियों जो राष्ट्र को भोग मानते के बीच समर होना है. पाले खिंच रहे हैं.

राष्ट्रवादी पाले का नेतृत्व भाजपा करे ऐसा हम सब चाहते हैं मगर भाजपा का मैनिफेस्टो, उसके 4 वर्ष शासन का लेखा-जोखा भी ऐसा कहता-करता है? इसका उत्तर यदि हाँ है तो उसे और प्रखर कीजिये, तेजस्वी बनाइये. यदि उत्तर न है तो उसे इस अंतिम वर्ष में दबाव डाल कर राष्ट्रवादी बनने के लिये बाध्य कीजिये.

2019 में कोई जीत या हार तुक्के में नहीं होनी चाहिए. राष्ट्रवादियों के पास भाजपा का विकल्प नहीं है, झक मार कर यहीं आएंगे, की मानसिकता बिल्कुल सही है. हम कहीं नहीं जाने वाले मगर एक साल बोलेंगे तो निश्चित ही.

कश्मीर के विस्थापितों की सहायता, उनके कश्मीर में पुनर्वास, रोहिंग्याओं की देश में अवैध बस्तियों के बढ़ने, गौ हत्याओं, गौ तस्करी पर कार्यवाही, बंग्लादेश से अवैध आव्रजन की रोक-टोक, बंगाल-बिहार-असम से हिंदुओं के सिमटते जाने पर शासन की कार्यवाही जैसे राष्ट्र और धर्म के ह्रास के विषयों पर सार्वजनिक रूप से प्रश्न निश्चित ही पूछेंगे.

सार्वजनिक सभाओं में भी सवाल उठा कर आपको बाध्य करेंगे कि राजनीति राष्ट्र हित का माध्यम है, लक्ष्य नहीं है. कृपया हमें तथ्यों के साथ चुप कराइये. यही इस लेख का लक्ष्य भी है.

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