सिर्फ राष्ट्रविरोधी ताक़तों को ही होता है राष्ट्रवादी ताक़तों से भय

जब धर्मांतरण के व्यापार और भारत विरोधी षड्यंत्र पर हुई चोट, तो पादरी को राष्ट्रवादियों से भय लगने लगा और धर्मनिरपेक्षता पर चोट दिखने लगी!

“भारतवर्ष में बसे ईसाईयों को यहाँ की राष्ट्रवादी ताक़तों से ख़तरा है,” ऐसा कहते हुए गांधी नगर के प्रधान पादरी थॉमस मैक्वेन ने ठीक गुजरात विधानसभा चुनाव से पहले ईसाईयों से राष्ट्रवादी ताक़तों को हराने की अपील की थी और कहा था कि उनके प्रभु ईसा मसीह उनकी मदद करेंगे.

प्रधान पादरी थॉमस मैक्वेन ने प्रत्यक्ष रूप से भारतीय जनता पार्टी को हराने की अपील की थी, गुजरात चुनाव के समय…

अब दिल्ली के आर्चबिशप की अपील देखिए… जिन्होंने भाजपा और मोदी को 2019 में हटाने के लिए एकजुटता की गुहार की है!

इस प्रश्न का जवाब चौथी क्लास का विद्यार्थी भी दे सकता है कि सिर्फ राष्ट्रविरोधी ताक़तों को ही राष्ट्रवादी ताक़तों से भय होता है. आर्कविशप को राष्ट्रवादी ताक़तों का डर क्यों है?

‘कम्पैशन्स ईस्ट इंडिया,’ (Compassions East India), पूरे विश्व में ईसाई धर्मांतरण कराने वाली सबसे बड़ी अमेरिकी एजेंसी है जो विदेशों से फ़ंड लेकर भारतवर्ष में बड़े पैमाने पर गरीबों और आदिवासियों का धर्मांतरण कर रही थी.

मोदी सरकार ने इसके विदेश से फंड लेने पर पहले से अनुमति लेने की शर्त लगा दी. इसके तुरंत बाद ‘कम्पैशन्स ईस्ट इंडिया’ ने भारत में अपना दफ्तर और सारे ऑपरेशन बंद करने का एलान कर दिया.

इतना ही नहीं, मोदी सरकार ने देश में काम कर रहे तमाम एनजीओ का ऑडिट करवाया, जिसमें यह पाया गया कि ‘कम्पैशन्स ईस्ट इंडिया’ भारत में हर वर्ष 292 करोड़ रुपये विदेशों से लाती थी, और इसे 344 छोटे-बड़े एनजीओ में बांट दिया जाता था. ये सभी एनजीओ देशविरोधी और धर्मांतरण की गतिविधियों बुरी तरह से लिप्त थे.

जब राष्ट्रवादी मोदी सरकार ने उस लिंक पर चोट की जहाँ चर्च द्वारा बड़े पैमाने पर हिंदुओं का धर्मांतरण किया जा रहा है तो थॉमस मैक्वेन और आर्चबिशप जैसे पादरियों ने राष्ट्रवादी ताक़तों को ख़तरा बताना शुरू कर दिया.

ज़हरीले पादरियों ने यह भी झूठ फैलाया कि “ऐसा एक दिन भी नहीं जाता जब हमारे चर्चों, चर्च के लोगों या अन्य संस्थानों पर हमला ना हो.”

दिल्ली पुलिस के रिपोर्ट के अनुसार, सन 2014 में 206 मंदिर, 30 गुरुद्वारा, 14 मस्जिद और तीन चर्च मे तोड़फोड़ की घटना दर्ज हुई फिर भी हिंदुओं ने थॉमस मैक्वेन और आर्क विशप की तरह ज़हर नहीं उगला.

आर्चबिशप का ये ज़हरीला संदेश भारत मे रह रहे इसाईयों, मुसलमानों और धर्मपरिवर्तित दलितों के लिये है…

चर्चों की संख्या भी मस्जिदों की तरह कुकुरमुत्तों की तरह बढ रही है, खास तौर से दक्षिण भारत, नॉर्थ-ईस्ट, झारखंड और छत्तीसगढ़ में… अनेक चर्च अवैध और सरकारी भूमि पर हैं, अलगाववादी हैं… माओवाद और इस्लामिक कट्टरवाद को प्रश्रय देते हैं…

सवाल ये है कि एक चर्च का पादरी ईसाईयों से राष्ट्रवादी ताक़तों के ख़िलाफ़ वोट माँग रहा है. क्या ये सेक्युलरिज्म की हत्या नहीं है?

एक-दो चैनलों को छोड़ दें तो मीडिया हमेशा की तरह आर्क विशप के पक्ष में खड़ा है… जानने वाले जानते हैं कि अनेक चैनलों में चर्च और देशविरोधी कुछ ईसाइयों का मोटा पैसा लगा हुआ है…

अगर यही किसी हिन्दू धर्म गुरू ने हिंदुओं को भाजपा के पक्ष मे मत देने के लिये आह्वान किया होता तो अब तक देश असहिष्णु हो गया होता और सेक्युलरिज्म ख़तरे मे आ चुका होता…

आज भारत सरकार के बाद यदि प्राइवेट हाथों में सबसे ज़्यादा भूमि और संपदा का आकलन किया जाय तो पहला स्थान चर्च और मिशनरी स्कूलों का आएगा… हज़ारों एकड़ प्राइम लैंड है इन ईसाई-षड्यंत्रकारियों के पास… जहां यह हिन्दू बच्चों को हिन्दू धर्म से घृणा करना सिखाते हैं…

वहीं स्वामी लक्ष्मणानंद जैसे सन्यासी की हत्या के लिए उन माओवादियों का हाथ पाया गया था, जिन्हें इन्ही मिशनरियों ने उकसाया था… देश विरोधी अनेक पादरी, बड़े-बड़े कॉन्वेंट स्कूलों-कालेजों के प्रिंसिपल और ‘फादर’ पाए जाते हैं… जैसे जॉन दयाल जैसा विषाक्त व्यक्ति एक समय सेंट स्टीफन का कथित ‘फादर’ था.

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