धर्मनिरपेक्षों… इतना तो मत हंसाओ

साफ है कि चुनावी मौसम आ गया है.

अभी चर्च ने चिट्ठी लिख कर शुरुआत की है.

देखते रहिए.

कुछ ही दिन बाद दस आईएएस अफसर, फिर दस आईपीएस अफसर, फिर कथित संस्कृति कर्मी, कला कर्मी, साहित्यकार और पुराने सत्ता प्रतिष्ठान के वफादार लाभार्थी बुद्धिजीवी एक-एक कर चिट्ठी लिखेंगे.

और अप्रैल-मई 2019 में सोनिया जी 10 जनपथ से राष्ट्रपति भवन मार्च करेंगी.

यह परेड शाम को ही होगी ताकि उन्हें धूप न लग जाए और कुशल कोरियोग्राफर की तरह ये सारे चिट्ठीबाज एक साथ सभी टीवी चैनलों पर रुदाली करते हुए प्रकट हो जाएंगे कि मोदी राज में धर्मनिरपेक्षता मुगल गार्डन से उठकर सीधे एम्स में आईसीयू में भर्ती हो गई है और मोदी जी उसका इलाज भी ठीक से नहीं होने दे रहे हैं. अल्पसंख्यकों का उत्पीड़न हो रहा है, उनमें अलगाव की भावना घर कर गई है. गंगा-जमुनी संस्कृति खतरे में है.

यह देख कर बरखा और रवीश जी की तो आंखें भर आएंगी.

वैसे यही नारा इस 23 मई को भी लगेगा जब कर्नाटक में हमारा जनादेश चुराने के बाद ये सारे धर्मनिरपेक्ष नेता-नेताइन झक सफेद खादी में मंच पर जुटेंगे.

हम तो जानते ही हैं कि वे क्यों जुट रहे हैं. मोदी का डर है.

पर वो लोग कह रहे हैं कि यह जुटान धर्मनिरपेक्षता के लिए है. धर्मनिरपेक्षता की रक्षा के लिए ही मजबूरी में 37 सीटों वाले कुमारस्वामी को मुख्यमंत्री बनाना पड़ रहा है. धर्मनिरपेक्षता की रक्षा के लिए हम इतने प्रतिबद्ध हैं कि जनादेश की चोरी करनी पड़े तो करेंगे और दस मधु कोड़ा पैदा करना पड़े तो करेंगे.

ये धर्मनिरपेक्षता है क्या? मैं तो बस एक चुटकुला सुनाऊंगा.

अमेरिका में येल विश्वविद्यालय में समाजशास्त्र के प्रोफेसर काम के प्रति बड़े समर्पित थे. 1970 के दशक में वे दो साल के लिए कैम्पस छोड़ कर गरीबों के मोहल्ले में रहने चले गए.

कैनारसी नाम का यह मजदूरों का मोहल्ला न्यू यॉर्क के कैनेडी हवाई अड्डे के ठीक सामने था जहां यहूदियों और इतालवी मूल के अमेरिकियों की कई पीढ़ियां दशकों से डेमोक्रेटों के पक्ष में एकतरफा मतदान करती रही. पर 1970 के दशक में ही वे अचानक रिचर्ड निक्सन की अगुआई वाले रिपब्लिकन के समर्थक हो गए.

‘आओ इसका पता लगाएं’ वाली शैली में जोनाथन रीडर झोला-बस्ता लेकर कैनारसी ही रहने पहुंच गए. फिर एक किताब लिखी Canarsie: The Jews and Italians of Brooklyn Against Liberalism.

रीडर ने कैनारसी में यह पाया :

1960 के दशक से यहां के यहूदियों और इतालवियों के लिए उदारवाद शब्द के मायने एकदम बदल गए हैं. अब वे उदारवाद को फिजूलखर्ची, रीढ़विहीनता, विद्वेषी, परपीड़कता, आभिजात्यता, अपने सपनों की दुनिया में रहने वाले, अराजक, नाजुक, जबरदस्ती भोला बनने वाले, गैर जिम्मेदार और दिखावटी नैतिकता जैसी चीजों का परिचायक समझते हैं.

दूसरी तरफ ‘अनुदार’ शब्द अब उनके लिए व्यावहारिकता और चरित्रनिष्ठा, पारस्परिकता, सत्यनिष्ठा, आत्मसंयम, मर्दानगी, यथार्थवाद, दृढ़ता, प्रतिहिंसा, नियमनिष्ठता और कंधे पर जिम्मेदारी उठाने के हौसले का प्रतीक है.

तो मेरे भाई, शब्दों के मायने कितने बदल गए पर उन्हें दोहराने वाले अपनी ही दुनिया में मगन रहे कि एक जुमला उछालेंगे और वोट झोली में आ गिरेंगे. पर उन्हें पता ही नहीं चल पाया कि कब से लोग उनके जुमलों को उल्टे अर्थ में लेने लगे हैं.

भारत में इसके लिए किसी शोध की जरूरत नहीं है कि धर्मनिरपेक्षता, समाजवाद, सामाजिक न्याय व इस तरह के तमाम शब्दों जिन पर राजनीति अब तक टिकी हुई थी, के मायने कितने बदल गए हैं.

लेकिन कल नारा फिर लगेगा… ‘धर्मनिरपेक्षता जिंदाबाद, जवाहर लाल नेहरू.. अमर रहें’. और हम हंसते हंसते लोट-पोट होते रहेंगे. धर्मनिरपेक्षता इतनी कॉमिकल हो गई है. धर्मनिरपेक्षों, किसी जोनाथन रीडर को भेजो हमारे पास, फिर हम बताएंगे अपनी हंसी का राज़.

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