माना कि मंदिर में आपकी श्रद्धा नहीं, पर नफरत फैलाने वाली ज़हरीली बात तो मत कीजिए

हमारे गोरखपुर में दो बहुत पुराने मंदिर हैं. एक बाबा गोरखनाथ का मंदिर. बड़ी मान्यता है इस मंदिर की.

इस गोरखनाथ मंदिर के महंत सर्वदा से ही क्षत्रिय ही होते आए हैं. अभी आदित्य नाथ हैं.

इस के पहले अवैद्यनाथ थे इस के पहले नौमीनाथ, इस के पहले दिग्विजय नाथ यह सभी क्षत्रिय ही हैं.

इस मंदिर के तमाम उप मंदिरों में तमाम योगी हैं जो किस जाति के हैं, कोई नहीं जानता. कम से कम यहां दुनिया भर से आने वाला श्रद्धालु तो नहीं ही जानता.

यहां आने वाला श्रद्धालु किस जाति का है, किस धर्म का है कोई नहीं जानता. न इस बाबत कोई जांच होती है.

जांच होती भी है कभी कभार तो बस सुरक्षा जांच होती है. जो वहां का जिला प्रशासन करता है.

यही बात मैंने काशी के विश्वनाथ मंदिर में भी देखी है. या किसी भी मंदिर में यही सुरक्षा जांच देखता हूं, जो वहां का प्रशासन करता है. मंदिर के लोग नहीं.

बड़े-बड़े सेक्युलरिस्ट यथा राजा दिग्विजय सिंह, लालू प्रसाद यादव इस गोरखनाथ मंदिर में आ कर इन के चरण छूते हैं. अखबारों में ऐसी फोटुएं छपी मैं ने देखी हैं.

दूसरा मंदिर है डोमिनगढ़ के पास बसियाडीह का मंदिर. यहां के महंत एक माली हैं. माली मतलब फूल तोड़ने वाले, शादी के लिए मौर बनाने वाले.

मतलब सवर्ण नहीं हैं. पिछड़ी जाति के हैं. लेकिन क्या ब्राह्मण, क्या यह, क्या वह सब इन के पैर छूते हैं. किसी को तकलीफ नहीं होती.

इन मंदिरों में लोग अपने पारिवारिक कार्य यथा मुंडन, विवाह आदि भी करते हैं. सभी जातियों के लोग. किसी को कोई दिक्क़त नहीं होती.

तो यह कौन लोग हैं जिन्हें मंदिरों में बहुत दिक्क़त होती है. ब्राह्मण वहां न होते हुए भी उन्हें रोक दिया करते हैं? यह समाज में ज़हर फैलाने वाले लोग कौन हैं?

अरे आप की मंदिर में श्रद्धा नहीं है, विश्वास नहीं है, मत कीजिए. लेकिन इस तरह की नफरत फैलाने वाली ज़हरीली बात भी तो मत कीजिए.

मौक़ा मिलने पर मजारों, चर्चों, गुरुद्वारों, बौद्ध मठों में भी मैं जाता हूं. शीश नवाता हूं उसी श्रद्धा और उसी भावना के साथ, जिस भावना से मंदिर जाता हूं. वह चाहे लखनऊ में खम्मन पीर बाबा की मजार हो, दिल्ली में निज़ामुद्दीन औलिया की मजार हो या अजमेर शरीफ.

इसी तरह लखनऊ की कैथड्रेल चर्च हो, दिल्ली, मुंबई, गोरखपुर की कोई चर्च हो, शिलांग की चर्च हो या फिर लखनऊ से लगायत दिल्ली तक के गुरुद्वारे, हर जगह जाता हूं.

कुशी नगर, सारनाथ से लगायत गंगटोक तक के बौद्ध मठों में जाता हूं. सपरिवार जाता हूं, शीश नवाता हूं. यह मेरा अपना यकीन है, मेरी आस्था है.

मैं बहाई समुदाय के लोटस टेम्पल भी गया हूं. लेकिन इन मजारों, चर्चों, गुरुद्वारों, बौद्ध मठों में भी मुझ से कभी नहीं पूछा गया कि किस धर्म और जाति के हो? जैसे कि किसी मंदिर में कभी नहीं पूछा जाता.

तो यह कौन लोग हैं जिन्हें हर जगह तंग किया जाता है? यह किस ग्रह के लोग हैं? जो इतनी नफरत, इतना ज़हर लिए घूमते-फिरते हैं? इन की ज़हरीली बातों को हम लोग सुनते भी क्यों हैं चुपचाप? इन का प्रतिकार क्यों नहीं करते खुल कर?

आप आस्तिक हैं, नास्तिक हैं, यह आप का अपना निजी फैसला है. आप मत मानिए, मंदिर, गिरिजा, मजार, मस्जिद, गुरुद्वारा. यह आप का अपना चयन है. लेकिन इस सब के नाम पर जहर फैलाना, गलत है, यह आप का निजी मसला नहीं है.

बंद कीजिए यह ज़हरीली और हिंसक ज़ुबान! यह मनुष्यता का हनन है, मनुष्य विरोधी है यह सब मूर्खता, यह ज़हरीली हिंसा है.

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