अय्यारी : ढेर सारे कलाकारों में गुम कहानी

मनोज एक इंटरनॅशनल क्रिमिनल को मारने के लिए एक स्पेशल ऑपरेशन पर इजिप्ट cairo में है और जब वो दिखता है तो उनकी रिवाल्वर की गोलियां उनका अस्सिटेंट नही लाया रहता है उसकी जगह वो विटामिन की गोलियाँ ले आता. फ़िल्म में ये दृश्य एके मज़ाक की तरह दिखता पर क्या कर्नल रैंक के अफसर की लापरवाही न दिखती ? ये संभव है?

फ़िल्म की कहानी भारतीय सेना के एक स्पेशल दस्ते से शुरू होती है, जो डेटा हैकिंग के लिए है. ये दस्ता कर्नल अभय सिंह बनाते हैं और इसके प्रमुख रहते हैं जिसमें मेजर जय बक्शी (सिद्धान्त मल्होत्रा ) और कैप्टेन माया (पूजा चोपड़ा) सबसे विश्वसनीय होते हैं.

इस ख़ुफ़िये दस्ते की जानकारी आर्मी चीफ प्रताप (विक्रम गोखले) को होती बस. एक मीटिंग के दौरान एक्स आर्मी ऑफ़सर गुरिंदर (कुमुद मिश्रा), प्रताप के सामने हथियारों की खरीद फरोख्त में गड़बड़ करने का ऑफर देता है जिसे प्रताप द्वारा नकारने पर गुरिंदर उसे आर्मी के ख़ुफ़िये डेटा हैकर्स को एक्सपोज़ करने की धमकी देता है.

कॉल ट्रैकिंग के समय ये सारी बात जय सुन लेता है अचानक जय का व्यवहार बदल जाता है और वो डेटा हैकिंग सीखने वाली सोनिया (राकुल प्रीत ) के साथ गुप्त तरीके से uk भाग जाता.

जय के इस व्यवहार और धोखे से अभय और आर्मी पर उंगली उठने लगती है. अभय, जय को पकड़ने uk जाते हैं जहां वो हथियारों के अवैध तस्कर पर बहुत बड़े नामपूर्व भारतीय सेना अधिकारी मुकेश कपूर (आदिल हुसैन ) से मिलते हैं.

नाटकीय तरीके से आदिल तक पहुंचते-पहुँचते जय भारत में हो रहे आदर्श सोसाइटी घोटाले तक भी पहुंचता है. अंत में सब गद्दारों को अपनी अय्यारी से अभय और जय अंत देते और आर्मी की साख बचाते हैं.

कहानी इतनी अच्छी बनानी है, इतनी अच्छी बनानी है कि कहानी ही गुम  गयी. ढेर से कलाकार, ढेर सारे ट्विस्ट और ढेर सारे कंफ्यूज़न. अंत तो क्या था? अंत में नसरूद्दीनशाह को जोड़ना, अभय के अकेले ऑफिस में भूत की तरह जय का आ मुस्कुराना क्या था?

उफ्फ. जब फ़िल्म शुरू हुई और इंटरवल तक आयी तो फ़िल्म में पकड़ थी फिर… फिर क्या हुआ ये नीरज भी न जानते होंगे.

कलाकार खूब हैं, जिसमें मनोज सबसे सशक्त लगे. सिद्धार्थ हैंडसम मेजर लगे. राकुल सामान्य बल्कि उससे ज्यादा पूजा चोपड़ा सही लगी. बाकी सभी सामान्य.

संवाद प्रभावी, गीत संगीत बेकार, छायांकन अच्छा.

जो रिव्यु अय्यारी को मिला था मैं उससे सहमत हूँ कि इसे नीरज पांडे की फ़िल्म समझ कर न देखें.

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