जहां मौका मिले, प्रकट हो ही जाता है उनके भीतर का पशु

कल मुंबई में एक भाषण था. गोवा में इसाइयत ने क्या क्रूरता बरती उस का तत्थ्यात्मक विवरण था. जैसे जैसे मैं सुनता गया, मुझे इस्लाम की भी याद आती गयी.

वैसे बाइबल, और खास कर गोस्पेल या ईसा चरित्र, कुर’आन जितनी क्रूरता की सीख नहीं देता. और ईसाई भी ओल्ड टेस्टमेंट से उसी तरह कन्नी काट लेते हैं जैसे मुसलमान corner होने पर हदीस से दूरी बनाने की कोशिश करते हैं.

लेकिन क्रूरता में ईसाई, मुसलमानों से कम नहीं रहे. और समय समय पर अलग अलग पोपों ने अलग अलग देशों से इसाइयत के किए अपराधों की माफी मांगी है, लेकिन भारत की जनता से नहीं.

शायद जिनसे माफी मांगी है वहाँ माफी मांगने से इसाइयत का कोई नुकसान नहीं होने वाला क्योंकि वे देश ईसाई हो चुके हैं.

इसी तरह, भारत के मुसलमानों से 100% मुस्लिम देशों के मुसलमान अधिक मॉडर्न प्रतीत हुए तो अचरज नहीं. वहाँ इस्लाम सत्ता में है, अब मॉडर्न होने से क्या फर्क पड़ेगा?

दोनों में समानता यह है कि दोनों सत्तापिपासु हैं और अपनी क्रूरता का समर्थन मज़हब के नाम या ईश्वरीय आदेश के नाम पर बेशर्मी से करते हैं.

चलिये, यह तो उनका स्वभाव हुआ, लेकिन उससे भी व्यथित करनेवाली बात यह है कि हमारे लोग ही इनके जुल्मों की चर्चा करने से इन्कार कर देते हैं.

उनको भी इनके पाप दबे रहने में ही रस है, जिससे बड़ी मूर्खता हो नहीं सकती क्योंकि ईसाई और मुसलमान आज भी वही मानसिकता पाले हुए हैं और जहां मौका मिले, उनके भीतर का पशु अपना स्वरूप प्रकट करने से नहीं चूकता.

रोग को दबाये रखेंगे तो वो लाइलाज हो जाता है और आप जाते जाते अपनों को ही वो रोग देकर जाते हो. इससे बड़ा पाप क्या हो सकता है?

इसाइयत का इलाज असंभव नहीं है लेकिन इसलिए इनके कुकर्मों की चर्चा भी आवश्यक है. जहां भी ईसाई हिंदुओं पर झूठे आरोप थोपते मिले वहाँ उन्हें इसाइयत के इतिहास की याद दिलानी आवश्यक है.

दु:खद है कि वे भी मुसलमानों जैसे ही victim खेलते हैं और अपने ही हिन्दू उससे असहज हो जाते हैं कि सौहार्द्र बिगड़ रहा है. हमें ऐसा कोई अपराधबोध पालना नहीं चाहिए बल्कि उसे घरवापसी का निमंत्रण देना चाहिए.

उसे यही बताना चाहिए कि वो बाहरियों का कुत्ता भर है, हमारे बीच वो मनुष्य बनकर रहे. इसमें कोई हर्ज़ भी नहीं क्योंकि जहां मौका मिले वहाँ वे हमको कुतरने से चूकते नहीं. दो प्रसंग बता रहा हूँ.

तब मैं पच्चीस का था, और सेक्युलर था. बस से प्रवास कर रहा था तो अगली सीट पर दो महिलाएं थी. एक हिन्दू थी दूसरी ईसाई. ईसाई महिला उम्र में हिन्दू महिला से बड़ी दिख़ रही थी.

ईसाई महिला ने बातचीत शुरू की. हो सकता है हिन्दू महिला के चेहरे पर कुछ व्यग्रता दिखाई देती रही हो. अगले सीट पर थी तो मेरे लिए यह देखना असंभव था. लेकिन कुछ दुख से गुजर रही होगी क्योंकि झट से अपनी समस्याओं को बयान कर लिया.

तुरंत ईसाई महिला ने कहा – प्रे. प्रे टू जीजस. ही विल हेल्प यू. और उसे अपनी पर्स से छोटी सी प्रार्थनापुस्तिका निकाल कर दी.

यहाँ ये बताना भूल गया था कि हिन्दू महिला भी सुशिक्षित थी और उनका वार्तालाप इंग्लिश में ही हो रहा था. हिन्दू महिला ने आभार माना और इस पुस्तिका को रख लिया.

दूसरा प्रसंग 2010 का है जब मेरे छोटे भाई का ऑपरेशन हो रहा था. मैं और मेरी छोटी बहन बाहर बैठे थे. एक युवती सामने बैठी थी. उसके चेहरे पर पीड़ा साफ दिख रही थी, शायद उसका भी कोई ऑपरेशन थिएटर में था.

किसी की प्रतीक्षा में भी थी और जिस तरह होंठ भींच कर रोना रोक रही थी, पीड़ा उसके लिए असह्य हुई जा रही थी. मैंने बहन का ध्यान उसकी ओर आकर्षित किया और कहा जा कर बात करें. उसको किसी सहारे की जरूरत है.

बहन ने जाकर बात की. कुछ ही समय में वो युवती उसे लिपट कर सिसक रही थी. उसके पिता अंदर थे और हालत गंभीर थी. डॉक्टर जवाब दे चुके थे और मामला बिलकुल भगवान भरोसे था. वो अपनी बड़ी बहन की प्रतीक्षा कर रही थी.

थोड़े समय में उसकी बहन आ गई अपने पति के साथ. तब तक मेरी बहन उसके साथ रही. उन दोनों ने मेरे बहन का आभार माना. बाद में उसके पिता का क्या हुआ पता नहीं. भाई की भी सर्जरी चल रही थी. वैसे उसका भी कैंसर बढ़ चुका था और दो महिनों बाद वो नहीं रहा.

यह प्रसंग इसलिए बताया कि मेरी बहन की जगह कोई ईसाई महिला होती तो वहीं प्रेयर करवाती और बाद में तब तक पीछे पड़ी रहती जब तक उसे कन्वर्ट न करवा लेती या भगाई न जाती.

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