‘छीन के लेंगे आज़ादी’ के समर्थक राजकुमार, सच में ही ना छीन लें हमारी आज़ादी

दो दिन पहले मैंने लिखा था…

जब 46 सांसदों के कारण पिता प्रधानमंत्री बन सकते हैं, तो 37 विधायकों के साथ बेटा मुख्यमंत्री क्यों नहीं बन सकता. जय हो प्रजातंत्र मैय्या की.

इसे यहां फिर से लिखने का मतलब यह कदापि नहीं है कि मुझे कोई अपनी भविष्यवाणी को सही सिद्ध करके अपनी टी आर पी बढ़ाना है.

असल में चुनाव नतीजे के बाद किसी भी बड़े भाजपा नेता की सक्रियता कर्नाटक मामले में दिखायी ना देने से शंका हुई थी.

अब जब ऊपर लिखी पोस्ट सही सिद्ध हो ही गई तो इससे जुड़ा सवाल उठता है कि जो दुर्गति पिता की की गई थी, क्या वही बेटे की नहीं की जाएगी?

की जाएगी… ज़रूर की जाएगी, राजपरिवार का सत्तर साल का इतिहास गवाह है, इन्होंने सत्ता के खेल में अनेक कारनामें कर रखें हैं.

मगर कर्नाटक में समर्थन 2019 के लोकसभा चुनाव के बाद वापस लिया जाएगा. तब तक कर्नाटक के बाप-बेटे दोनों हाथ से लूट सकते हैं. बस दिल्ली के राजपरिवार को उनका हिस्सा पहुचाते रहना होगा.

असल में कर्नाटक की हार, राजकुमार की हार थी उसे बड़ी चतुराई से जीत में बदला गया और इस जीत के जोश और अनुभव से आगे दिल्ली का किला फतह करने का प्रयास किया जाएगा. जिसमें दीदी, बुआ, भतीजा आदि आदि साथ देंगे.

सवाल यह है कि भाजपा कर्नाटक के चुनाव में जीत कर भी हारी हुई बाज़ी (जो दुर्भाग्य से थोड़ी दूर रह गई थी), उसे जीतने का एक और मौका था, जब राज्यपाल भी अपना, स्पीकर भी अपना, फिर सदन में विश्वास मत प्राप्त करना बेहद आसान होता है, फिर भी यह इस्तीफ़ा क्यों?

क्या नैतिकता का सर्टिफिकेट लेने का खेल खेला गया? क्या कर्नाटक हार कर दिल्ली जीतने का मार्ग आसान होगा? क्या यह कूटनीति है? क्या जनता भावनात्मक रूप से येदियुरप्पा-भाजपा के पक्ष में हो जाएगी? देश के बारे में तो नहीं कह सकते मगर हो सकता है कर्नाटक में इसका थोड़ा बहुत फायदा हो.

तो क्या भाजपा ने सिर्फ नैतिकता के परसेप्शन के लिए कर्नाटक की जीती हुई बाज़ी हारी?

अगर यह सच है तो मुझे यह कहना है कि इस देश की जनता की याददाश्त बड़ी कमजोर है. उसे 2014 के पहले की भ्रष्टाचार, आतंक, अराजकता कुछ भी तो याद नहीं.

इसमें कोई शक नहीं कि मोदी का चार साल का शासन पूर्व के सत्तर साल के शासन से हर तरह से और हर मामले में बीस ही बैठेगा. फिर भी हिन्दुस्तान का एक ऐसा वर्ग है जिसके मन में नकारत्मकता सेकण्ड के हिसाब से पनपने लगती है.

और फिर आप यह क्यों भूल जाते हैं कि सब कुछ जानते हुए भी देश का एक बड़ा वर्ग है जो बहन जी, दीदी, भतीजे और जनता दल के (ए बी सी से लेकर यू) गिरोह को अब भी वोट करता है.

इस देश में आज भी सेक्युलर बीमारी से ग्रसित जनता की संख्या बहुत बड़ी है. जिस देश को सत्तर साल में अनेक रोग से बीमार कर दिया गया हो उसके लिए नैतिकता का अमृत क्या साल भर ज़िंदा रख पायेगा? मुश्किल लगता है.

जिन लोगों को कश्मीर का भयानक सच, जो मात्र तीस साल पुराना है, याद नहीं, जिन्हे उसी राह पर चलता हुआ केरल दिखाई नहीं देता, जिन्हे जलता हुआ बंगाल नहीं दिख रहा, उनसे हम क्या उम्मीद कर सकते हैं.

असल में कर्नाटक की जनता की ज़रा सी नादानी (मात्र आठ सीट की कमी) के कारण उन्हें वो सब देखना और झेलना पडेगा जिसे आम कर्नाटक का नागरिक नहीं चाहता.

मगर कुछ की वोट ना देने की उदासीनता, कुछ की नोटा का बटन दबाने की मूर्खता और कुछ की भाजपा से बिना वजह नफरत, उनका वो हश्र करेगी जिसके लिए वे तैयार नहीं.

क्या वे टीपू सुलतान की जयंती, अलग झंडे की मान्यता और हिन्दुओं के बांटने जैसे षड्यंत्र से भविष्य में होने वाली भयावहता से अनजान हैं? अगर वे इस को नहीं समझ रहे तो यह उनकी समस्या है मगर कटु सत्य यही है कि कर्नाटक का तेजी से इस्लामीकरण होगा. अब रोम के एजेंट की सक्रियता यहां बढ़ेगी.

अर्थात कर्नाटक में असली हार हर तरह से एक आम हिन्दू की हुई है, एक राष्ट्रवादी की हुई है, एक आम नागरिक की हुई है. क्या कोई भी इस सच से इंकार कर सकता है कि भाजपा आज भी हर तरह से हर दूसरी राजनैतिक पार्टी से लाख गुना अच्छी है. ऐसे में उसका फिलहाल हर राज्य और केंद्र में बार बार सत्ता में आना देश समाज के लिए आवश्यक है. यह हर हाल में हिन्दू के हित में होगा.

इस तथ्य को जितना जल्दी हम समझ लें उतना यह हमारे हित में होगा. हम हिन्दू पूरी दुनिया के निशाने पर हैं. रोम और अरब की निग़ाहें हम पर हैं.

आखिरकार क्यों संघ को सबसे ज्यादा टारगेट किया जाता है. क्योंकि यही एकमात्र संगठन है जो हिन्दू को संगठित कर रहा है. यह रोम और अरब बिलकुल नहीं चाहते.

उनके हिन्दुस्तान में बैठे हर एजेंट स्लीपर सेल की हर संभव कोशिश होती हैं कि किसी तरह से संघ को हमसे दूर रखा जाए. और हर हिन्दू को सेक्युलर का घोल पिलाते रहा जाए. जिसके नशे में चूर हो कर हिन्दू इस सेक्युलर गिरोह को सत्ता सौंपते रहें और दूसरी तरफ धर्म परिवर्तन का खुला खेल चलता रहे.

तो फिर कर्नाटक आगे कहीं और फिर से ना रिपीट हो, क्या यह अब हम सब का संकल्प नहीं होना चाहिए? कर्नाटक से हमने क्या सबक लिया?

ध्यान रहे, 2019 तक दुनिया की सारी ताकत अब हर तरह का षड्यंत्र देश में करेंगी. कुछ शायद हम समझ पाए, कुछ नहीं भी. ऐसे में भाजपा को शायद सत्ता की जितनी ज़रूरत है, उससे कहीं अधिक ज़रूरी है सत्ता पर भाजपा का होना.

जब तक भाजपा से बेहतर विकल्प हमें नहीं मिलता या जब तक हम उसका विकल्प तैयार नहीं कर लेते, यह कटु सत्य है. इसलिए बात बात पर ‘हाय मोदी हाय मोदी’ करने वाले मित्रों से भी निवेदन है कि एकजुट होकर अधिक सक्रियता से मैदान में डट जाएँ, वरना राजपरिवार की चौथी पीढ़ी हम पर राज करने के लिए तैयार बैठी है.

और ध्यान रहे, ‘छीन के लेंगे आज़ादी’ का समर्थन करने वाले राजकुमार इस बार हमारी आज़ादी सच में ही ना छीन ले.

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