समाधान है, ‘आर्य बाहरी थे’ जैसे सेक्युलर बीज को ज़मीन में ही नष्ट कर देना

– आर्य बाहरी नहीं थे, ना ही आक्रमणकारी थे.

“आप के पास इसके लिए क्या प्रमाण है?”

– आर्यों को बाहरी घोषित कर देने के आप के पास क्या प्रमाण है?

“हमें स्कूल से लेकर कॉलेज तक यही पढ़ाया गया है.”

– यह ठीक है कि यह पढ़ाया जाता रहा है, मगर क्या आपने यह जानने का प्रयास किया कि ऐसा लिखने वाले आज तक कोई प्रमाण नहीं दे पाए, जबकि आर्य यहीं के हमारे पूर्वज थे इसके समर्थन में अनेक प्रमाण हैं और सामान्य तर्क से मैं इसे यहीं प्रमाणित कर सकता हूँ.

दक्षिण भारत के अति सुन्दर और ठन्डे स्थान ऊटी में यह गरमागरम बहस छिड़ गई थी.

एक तरफ मैं अकेला था जबकि सामने अनेक मित्र थे, जिनमें एक दक्षिण भारतीय और एक उत्तर प्रदेश का मित्र प्रमुख था जो आर्यों को बाहरी डिक्लेअर करने में ही अपनी बौद्धिकता समझे हुए थे.

मैंने उनके सामने अपने सामान्य तर्क देने शुरू किये,

– अगर आर्य बाहर से आये थे तो आज की तारीख में आर्यों के वंशज कौन हैं? क्या आप उतर भारतीय को आर्य मानते हैं? क्या उनमें भी सिर्फ सवर्णो को आर्य मानते हैं?

मैंने दक्षिण भारतीय मित्र की तरफ मुँह करके यह सवाल पूछा था और फिर अपने उत्तर प्रदेश के सवर्ण मित्र की और देखा था. दोनों ने हाँ में मुँह तो हिलाया मगर वे इस सवाल पर थोड़ा सतर्क हुए थे. मै उनकी दुविधा पकड़ चुका था.

– अगर आप उत्तर भारतीय को आर्य मानते हैं तो यह उत्तर प्रदेश का हमारा स्वर्ण मित्र बाहरी हुआ. मगर इसकी शक्ल रंग रूप शरीर की बनावट तो आप से अधिक मिलती जुलती है. आप दोनों में उतनी ही असमानता है जितनी दक्षिण भारतीय एक तेलगु और कन्नड़ में व तमिल और मलयाली के बीच में हो सकती है.

और फिर ये असमानता तो उत्तर भारत में एक बिहारी और मध्य प्रदेश व उत्तर प्रदेश के निवासी के बीच में भी है. और ये असमानता एक गुजराती व महाराष्ट्रीयन और बंगाली उड़िया आदि के बीच और बढ़ जाती है. तो फिर इनमें से किसे आप बाहरी आर्य मानेगे और किसे देशी?

असल में हम सब में उतनी असमानता नहीं है जितनी समानता है. जो हमारी थोड़ी बहुत असमानता है भी, वो भी भौगोलिक और प्राकृतिक कारणों से है. मगर हमारे संस्कार और संस्कृति के मूल एक ही है.

इसका एक उदाहरण शिव हो सकते हैं जिसकी आप सभी दक्षिण भारतीय उपासना करते हैं मगर उनका स्थान उत्तर में कैलाश माना जाता है और वे उत्तर भारतीयों के भी प्रमुख आदिदेव हैं. बस्तर के आदिवासियों के भी वे पूज्य हैं.

अब शिव को भी आप द्रविड़ घोषित मत कर दीजियेगा जैसा कि कुछ एक लोग करने का प्रयास करते हैं क्योंकि शिव का विस्तृत वर्णन आर्यों के वेदों और उपनिषदों में आया है.

और फिर मथुरा वृंदावन के श्रीकृष्ण पुरी में क्या कर रहे हैं? द्वारका में क्या कर रहे हैं? तिरुपति के बालाजी क्या हैं? माँ काली-दुर्गा देश के हर हिस्से में हर वर्ग और वर्ण के बीच किसी ना किसी रूप में कैसे और क्यों पूज्यनीय हैं?

ऐसे अनेक उदाहरण मैंने दिए थे जिनका कोई तार्किक जवाब सामने किसी के पास नहीं था. और वे सभी चुप हो गए थे. यह देख मैंने अंतिम तर्क प्रमाण के रूप में दिया,
– अगर आर्य बाहरी होते तो एक ब्राह्मण चाणक्य भी बाहरी आर्य होते और ऐसा होने पर वे एक ग्रीक राजकुमारी को चंद्रगुप्त की पत्नी के साथ साथ देश की राजमाता होना भी स्वीकार कर लेते. मगर उन्होंने ऐसा नहीं होने दिया. जिसके अनेक कारण थे जिसे आज हम समझ नहीं पा रहे.

क्या हममें से कोई भी स्वयं को चाणक्य से अधिक बुद्धिमान मानता है? शायद आज का भारतीय अपने आप को चाणक्य से भी अधिक चतुर मानता है लेकिन इसी का दुष्परिणाम है कि चाणक्य के जाते ही कुछ समय के बाद ही हम सब उसका भुगतान करने लगे. हम पर अनेक आक्रमण हुए.

अंत में पहले मुग़ल और फिर अंग्रेजों का शासन, अफगानिस्तान और पाकिस्तान का बनना, कश्मीर का हिन्दू विहीन होना, और यह सिलसिला आज भी निरन्तर जारी है. मगर हम इन कड़ियों को जोड़ कर ना देख पा रहे हैं, ना समझ पा रहे हैं. क्योंकि हम सब को एक विशेष चश्मा पहना दिया गया है.

यह तर्क सब पर भारी था और वे सब निरूत्तर थे. वे इसका राजनैतिक इशारा भी समझ रहे थे मगर मान नहीं पा रहे थे. उनकी भी मजबूरी समझनी होगी, इतने लम्बे समय तक जो एक विचारधारा उनकी रग रग में घोल दी गई है वो इतनी आसानी से कैसे दूर हो सकती है.

हमें यह मानना होगा कि सेक्युलर बनाने के बीज, जो अंग्रेज बो गए और फिर काँग्रेस ने इस पौधे को वामपंथियों के द्वारा सिंचित कर एक विशाल वृक्ष बनवाया. इसकी जड़ें बहुत गहरी हो चुकी हैं जिसका नुकसान देश समाज भुगत रहा है.

आज देश में सेक्युलरों की संख्या आम जनता के बीच में बहुत अधिक है. वे गौरी लंकेश से लेकर कठुआ की सेक्युलर कहानी में अधिक विश्वास करते हैं और हम सोशल मीडिया पर सटीक प्रतिक्रिया देकर उनमें से कुछ एक की ही घर वापसी करवा पाते हैं. मगर फिर भी अनेक सेक्युलर बीमारी से ग्रसित रह जाते हैं.

इनकी संख्या आज भी बहुत बड़ी है. ये किसी भी चुनाव में बाजी पलट सकते हैं. इसी कारण से इनके जैसे फ्लोटिंग मतदता के लिए ‘साहेब’ को भी अनेक बार सेक्युलर स्टेटमेंट देने पड़ जाते हैं. मगर साहेब के इस तरह के कथन अनेक राष्ट्रवादियों को क्रोधित कर जाते हैं. जिसके कारण यहां सोशल मीडिया पर अनेक राष्ट्रवादी हिन्दू ‘साहेब’ से नाराज नजर आते हैं. इसका दुष्परिणाम हमे आगे के चुनाव में भुगतना पड़ सकता है.

सवाल है कि इस सेक्युलर समस्या का समाधान क्या है? इसका समाधान है ‘आर्य बाहरी थे’ जैसे सेक्युलर बीज को ज़मीन के भीतर ही नष्ट कर देना. यह एक गलत विचारधारा है जिसे सही तथ्यों के साथ आसानी से ख़त्म किया जा सकता है. और यह काम कोई बौद्धिक करे तब ही ठीक होगा.

मगर सवाल उठता है कि क्या भाजपा और संघ ने अपना बौद्धिक वर्ग बनाने का कभी प्रयास किया? नहीं. चाणक्य के बिना चद्रगुप्त नहीं बना करते. और इससे बड़ी विडंबना यह है कि हम सिर्फ चुनावी राजनीति करने वालों को ही आज का चाणक्य समझ बैठे हैं.

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