काँग्रेस : हज़ारों निर्दोष भारतीयों के अंग्रेज़ हत्यारे की बनाई संस्था

प्रथम स्वतंत्रता संग्राम अर्थात 1857 की आज़ादी की लड़ाई का एक मुख्य स्थल था इटावा.

वहाँ मेरठ से गए सिपाहियों के द्वारा दिल्ली पर कब्ज़ा किए जाने का किस्सा पहुँच चुका था.

लोग एक दूसरे को मेरठ के सैनिकों के बहादुरी की कहानिंयां सुनाते थे… जन जन अंग्रेज़ों के विरुद्ध खड़ा हो रहा था…

ऐसे में देशभक्ति और अंग्रेज़ों को खदेड़ देने के सिपाहियों के कारनामों का गुणगान मंदिर के पुजारी लोगों को सुनाते थे…

अलीगढ में नेटिव सिपाहियों की 9वीं रेजिमेंट तैनात थी जिनकी कुछ टुकड़ियां मैनपुरी, इटावा और बुलंदशहर में तैनात थी… इनको अंग्रेज़ों का विश्वस्त माना जाता था.

इन्होंने फिलहाल कुछ नहीं किया था… लेकिन आम जनता उनको ताना देती थी… इसलिए उनके मन में भी विद्रोह करने का इच्छा जाग उठी थी.

इस बीच मैनपुरी के कलेक्टर के आदेश पर मंदिर के पास 20 मई को अंग्रेज़ों ने ब्राह्मणों को सरेआम फाँसी दे दी… जिससे लोगों और नेटिव सिपाहियों में गुस्सा और भर गया था…

इस बात को मैनपुरी का कलेक्टर भांप गया… उसने सैनिकों को नि:शस्त्र कर दिया… सारे निहत्थे सैनिक उसी मंदिर पर इकठ्ठा हुए जहाँ ब्राह्मणों को फांसी दी गई थी.

पीछे से मैनपुरी के कलेक्टर ने हथियार बंद अंग्रेज़ सिपाही वहां भेज दिए जिससे वो उन सबको ख़त्म कर सकें…

आदेश था कि सबको मार डालो चाहे वहाँ आम नागरिक ही क्यों न मिलें… लेकिन उन अँगरेज़ सैनिकों का मुकाबला जब हुआ तो नेटिव सैनिकों और आम लोगों ने सारे अँगरेज़ सैनिकों को ख़त्म कर दिया…

समाचार मिलते ही मैनपुरी के कलेक्टर ने कुछ सैनिक लिए और मंदिर पर हमला किया… बड़ी लड़ाई हुई लेकिन कलेक्टर के सैनिक मारे गए और कलेक्टर भाग खड़ा हुआ…

अलीगढ के नेटिव सैनिक भी आ गए थे और लड़ाई में शामिल हो गए… कलेक्टर साड़ी पहनकर घूंघट निकाले भारतीय महिला का वेश बनाकर भाग गया…

खैर जब लड़ाई उलटी पड़ी उसके कुछ महीनों बाद तब कलेक्टर लौटा और उसने अलीगढ, मैनपुरी और इटावा में नेटिव सैनिकों के साथ 25 हज़ार से ऊपर आम नागरिक मार डाले…

विद्रोह के ख़त्म होने के बाद अंग्रेज़ों ने कलेक्टर को छुट्टी पर वापस इंग्लैण्ड भेज दिया और सम्मान दिया…

वो कलेक्टर भारत सन 1881 में वापस आया… पूरा भारत घूमा… शिमला में उसने शादी की… और फिर 1882 में मुंबई में उसने एक संगठन की स्थापना की…

इस संगठन को उसने नाम दिया ‘Congress’ जिसको उसने एक मनोरंजनार्थ क्लब (entertainment club) नाम से रजिस्टर किया था…

इस संगठन के स्थापना के समय उसने कहा कि कांग्रेस की स्थापना भारत के पढ़े लिखे संभ्रांत लोगों को इकट्ठा करके ऐसा संगठन बनाया गया है जो भविष्य में भारत में 1857 जैसे किसी उद्वेग को उठने न दें और अंग्रेज़ों से तारतम्य बना के रखें.

अंग्रेज़ों ने इंग्लैंड से कुछ भारतीयों को पढ़ा लिखा के लोगों को भारत भेजा और काँग्रेस का सदस्य बनाया… अगले चार साल तक उसने भारत के कोने कोने से लोगो को सदस्य बनाया और उनको अंग्रेज़ों के लिए काम करने के बदले पैसे और उपाधियाँ दिलवाई…

काँग्रेस को मज़बूत करके उसने इसको अंग्रेज़ों के दलाल भारतीयों के हाथ में दे कर, इसकी कई ब्रांच भारत भर में खोलकर, वर्ष 1885 में इसका नाम बदलकर Indian National Congress (भारतीय राष्ट्रीय काँग्रेस) कर दिया… और इसके बाद वो 1894 में भारत से चला गया.

इस कलेक्टर का नाम था ए ओ ह्यूम (Allan O. Hume)… भारतीय राष्ट्रीय काँग्रेस का संस्थापक.

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  1. भारतीय ज्योतिष-शास्त्र अनुसार 120 वर्ष की पूर्ण-आयु पूर्ण कर चुकी एक विदेशी  द्वारा स्थापित Entertainment संस्था; एक विदेशी द्वारा ही विस्थापित ( त्यागी ) कर पूर्णाहुत की जा चुकी है, जिसके वारिस आज-कल भारतीय जन-मानस का पर्याप्त entertainment कर अपने उत्तरदायित्व का पूर्ण निर्वहन कर रहे हैं।

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