विकास की जीत को हिंदुत्व की हार मत बनाइये

जब भाजपा चुनाव जीतती है, अच्छा लगता है. जब साफ साफ नहीं जीतती, फिर भी काँग्रेस को गर्दनिया के सरकार बना लेती है तो और भी अच्छा लगता है.

मुझे ठेंगा बराबर कुछ नहीं मिल जाता, फिर भी अच्छा लगता है.

मुझे यह भी मालूम है कि जो भाजपाई नेताजी चुन के विधानसभा में जाएंगे उन्हें किसी चीज का अगाड़ा पिछवाड़ा नहीं मालूम है. किसी ढंग के मुद्दे पर सदन के अंदर या बाहर चार लाइन बोल नहीं पाएंगे. अपनी जोड़ तोड़ और जुगाड़ में लगे रहेंगे, फिर भी अच्छा लगता है.

पर जब आप चुनाव जीत कर घोषणा करते हैं कि यह विकास की राजनीति की जीत है तो बहुत बुरा लगता है.

विकास किसे नहीं चाहिए. सबको चाहिए. पर जब आप अलग से कहते हैं कि यह “विकास की राजनीति” की जीत है, तो इसके कुछ और अर्थ हैं.

आपके दो बेटे हों, और आप कहें कि मेरा बड़ा बेटा बहुत होशियार है तो आप अपने बड़े बेटे के बारे में जितना कह रहे हैं उससे ज्यादा अपने छोटे बेटे के बारे में कह रहे हैं.

जब पड़ोस वाली आंटी आपको कहे कि आपकी छोटी बेटी सुंदर है तो वह छोटी की तारीफ नहीं कर रही, बड़ी को बदसूरत कह रही है.

विकास एक बिज़नेस कॉन्ट्रैक्ट है. जनता ने आपको विकास करने के लिए चुना है. अगर आपका काम नहीं पसंद आएगा तो हटा देंगे. यूँ भी हटा सकते हैं. बिज़नेस में नफा नुकसान ही होता है, कोई अपनापन नहीं होता.

कोई दुकानदार आपको नौ बार अच्छी डील देगा कोई बात नहीं. दसवीं बार कोई दूसरा दुकानदार एक नई स्कीम निकालेगा और आप उधर चले जायेंगे. विकास के नाम पर वोटर का आपसे इतना ही रिश्ता है.

पर जिनसे लगाव है, अपनापन है… उनसे आप बिज़नेस भी करेंगे तो एक अलग तरह के विश्वास के साथ करेंगे. यह विश्वास एक गड़बड़ सौदे में नहीं टूटेगा. आप उसी लाला की दुकान पर जाएंगे, शिकायत करेंगे कि इस बार दाल में बहुत कंकड़ थे. लाला आपको चाय के लिए पूछेगा, आप वो भी नहीं पियेंगे. थैला और लिस्ट उसे थमा कर चौराहे पर पान खाने निकल जाएंगे.

अपना दोस्त, रिश्तेदार, परिचित होगा तो चार नुकसान उठा कर भी उसके साथ रहेंगे. दो बातें बुरी लगेंगी तो भी बर्दाश्त करेंगे. पर जिसकी शक्ल पसंद नहीं होगी उसके पास पाँच रुपये सस्ता सौदा भी लेने नहीं जाएंगे.

हिंदुत्व ही वह भावनात्मक मुद्दा है जिससे मैं भाजपा से जुड़ा हूँ. उपेक्षा सह कर, देख और समझ कर भी जुड़ा हूँ. भारत जैसे देश का विकास पाँच साल में इतना नहीं हो सकता कि कोई उस विकास पर फिदा हो ले. कहीं ना कहीं से खोट निकल ही आएगी.

विकास ज़रूरी है, महत्वपूर्ण है… पर विकास की जीत को हिंदुत्व की हार मत बनाइये. माना कि विकास बड़के भइया हैं, पढ़ने में जादे तेज हैं, सब काम में अच्छे… पर ‘मेरा बड़ा बेटा बहुत समझदार है’ कहकर छोटे बेटे को जो बेवक़ूफ़ घोषित करते हैं ना… यह बहुत चुभता है.

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