धर्मसम्मत है, काँग्रेस का उसी के अस्त्रों से वध

कर्नाटक के चुनाव के परिणामों के बाद से लोगों ने दिमाग खराब कर रखा है. नैतिकता, आदर्शों और लोकत्रांतिक शुचिता की बातें सुन सुन कर मेरे कान पक गये है.

आज काँग्रेस को, भारत के लोकतंत्र का वह सब याद आ रहा है जिसका बलात्कार, उसने पिछले 7 दशकों में बार बार किया है.

भारत में सत्ता में आने और सत्ता में बने रहने के लिये हर मर्यादाओं और विधिकाओं का मर्दन करने का संस्कार काँग्रेस का ही दिया हुआ है.

काँग्रेस ने तो इससे भी आगे जाकर, अपने द्वारा पोषित न्यायाधीशों द्वारा, उसके द्वारा लोकतंत्र पर किये गये बलात्कार को, विधि सम्मत हुये विवाह का प्रमाणपत्र दिलवाया है.

आज काँग्रेस चुक गयी है. ‘काँग्रेस में गांधी परिवार का ही राज करने का जन्मसिद्ध अधिकार है’, के भाव से उपजे अहंकार व भ्रष्ट आचरण ने उनकी आंखों में ऐसा चश्मा पहना दिया है जिसने भारत को देखना छोड़ कर, 10 जनपथ को ही भारत मान लिया है.

काँग्रेस ने तो अपना यह सफर जातिवाद की विष्ठा से तिलक लगा कर शुरू किया था. काँग्रेस के जवाहरलाल नेहरू से बने पंडित नेहरू ने कश्मीरी ब्राह्मण की सवारी करते करते आज रोमन कैथोलिक तक की यात्रा पूरी की है, जहां खुद काँग्रेसी निर्लज्ज हो कर अपनी राजमाता और उनके पुत्र को हिन्दू बनाने पर तुले है.

आज लोकतंत्र के युद्धस्थल में काँग्रेसियों और उनकी इकोसिस्टम सेना का वध करने के लिये हमे दिग्भ्रमित अर्जुन नहीं बनना है क्योंकि बहुत पहले कुरुक्षेत्र के मैदान में श्रीकृष्ण, अधर्म का वध धर्मसम्मत होने का ज्ञान दे चुके हैं और काँग्रेस के राजपरिवार की यह धर्म की अधर्मता ही उनके वध का पर्याप्त कारण है.

काँग्रेस के यह इटेलियन मां बेटे, वंशवाद के पैरों को पकड़े उनके गुलामों और दरबारियों द्वारा नित गाये जाने वाले सोहरों, कव्वालियों और कैरल की आवाज में इतने सरूर में थे कि उन्हें यही नहीं पता चल पाया कि उनकी दुनिया में आया दढ़ियल उनसे ज्यादा अच्छा निशानेबाज और ज्यादा शातिर है.

उस दाढ़ी वाले को मालूम है कि यह एक निरंतरता लिये हुये युद्ध है जिसमें नैतिकता, आदर्श और शुचिता के तीर चुक चुके है. इसमें विचारधारा के सुदर्शन चक्र के मान के लिये सिर्फ ज़िंदा बचे रहना महत्वपूर्ण है.

आज मुझे क्लिंट ईस्टवुड की, सर्गियो लीओन की 1964 में बनी पहली स्पैगेटी वेस्टर्न, A Fistful Of Dollors का क्लाइमेक्स याद आ रहा है.

इसमें एक अनाम अजनबी (क्लिंट ईस्टवुड) सन मिगुएल नाम के कस्बे में पहुंचता है जहां रोजोस भाइयों डॉन, एस्टेबन और रामोन का इस कस्बे के शेरिफ बैक्सटर से, कस्बे पर नियंत्रण को लेकर गैंगवार चल रहा है.

वैसे इसके बाद कि कहानी बड़ी जटिल है लेकिन बात समझने के लिये संक्षेप में यही समझिये कि वह अजनबी आदमी, रोजोस भाइयों की कस्बे के लोगों से क्रूरता और अमानवीय व्यवहार को देख कर पहले उनके लिये काम करता है और उनको समझता है.

फिर एक दिन उस पर शक हो जाने पर रोजोस भाई उसको मारते हैं लेकिन वह एक ताबूत में छिप कर बाहर एक खदान में छुप जाता है.

फिर वो एक दिन अपने घावों के ठीक होने पर वापस कस्बे में लौटता है, जहां पर रोजोस भाई अपने विरोधियों का सफाया करके कस्बे के चौक पर खड़े होते हैं.

अजनबी को वापिस आया देख कर रामोन उस पर गोली चलाता है. उसको लगती है लेकिन फिर अजनबी खड़ा हो जाता है. रामोन यह देख आश्चर्यचकित होता है और फिर गोली मारता है. इस बार भी यही होता है.

अब अजनबी रामोन को चिढ़ाता है कि ‘निशाना खराब हो गया है रामोन? मेरे दिल को निशाना बनाओ नहीं तो मैं मरूंगा नही’. अजनबी द्वारा चिढाये जाने पर रामोन आपा खो देता है और अपनी तरफ बढ़ते हुए अजनबी पर अपनी राइफल की सारी गोली झोंक देता है.

जब रामोन इतनी गोली खाने के बाद भी अजनबी को उठता देखता है तो जड़ हो जाता है. तब अजनबी अपना पोंचो ऊपर करता है और जो उसने अंदर लोहे की मोटी प्लेट पहनी हुई थी उसे उतार देता है और सब रोजोस भाई को मार डालता है.

आज भारत में भी एक शख्स आ चुका है जिसे बरसों यहां के रोजोस गैंग, काँग्रेस और उसके इकोसिस्टम ने छलनी किया है. आज वह इस काँग्रेस गैंग के सारे हथकंडों से पारंगत होकर इन आतताइयों से निपटने, सामने आ गया है.

आप समझे कि नहीं समझे, लेकिन वह समझता है कि आज इस कस्बे में, इन अराजक विधर्मियो को मार कर जीवित रहना ही धर्म है.

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