फीनिक्स और गरुड़ का पुनर्जन्म

फीनिक्स के बारे में कहा गया है कि जब उसकी मृत्यु की घड़ी आती है तो वह अग्नि में कूद जाता है और राख़ में से नयी दमकती काया के साथ पुनर्जीवन पाता है.

गरुड़ के बारे में कहा जाता है कि जब वो 40 वर्ष का हो जाता है तब बूढ़ा हो जाता है. उससे अपने पंखों का भार नहीं सहा जाता. उसकी चोंच भी टूट फूट जाती है, उसके नख भी घिस जाते हैं.

वो अपने पर्वत पर ऊंची जगह स्थित नीड़ में चला जाता है. वहाँ वो अपने सभी पर नोंच डालता है, अपने नाखून खींच लेता है और पत्थर पर मार कर अपनी चोंच भो तोड़ देता है.

यह बहुत पीड़ादायक तो होता ही है लेकिन वो यह सब करता है. धीरे धीरे ये सभी पुन: उग आते हैं और वो नई ऊर्जा से उड़ान भरता है और, और तीस साल जी लेता है.

वैसे ये दोनों बस किंवदंतियाँ हैं. फीनिक्स का अस्तित्व केवल माइथोलॉजी में है और गरुड़ के बारे में यह भी केवल एक प्रेरणादायी किंवदंती है, गरुड़ साधारणत: 30 से 38 तक जी सकता है.

तो ये कहानियाँ क्यों लिखी?

क्योंकि दोनों का सूत्र समान है, नयी जिंदगी पानी है तो वेदनाओं से गुजरना होगा.

हमारा यह शरीर तो पुन: जन्मने से रहा, मानसिक पुनर्जन्म की बात कर रहा हूँ.

कभी शांति से सोचिए, आप की सोच में कितने विचार वामियों के आरोपित हैं? कितनी धूर्तता से उन्होने हमारे ही ग्रन्थों का अध्ययन कर के उसमें से वही प्रसंग या वचन उद्धृत किए हैं जो अन्ततोगत्वा उनकी विचारधारा को ही पुष्ट करते हैं?

विरोध इसलिए है क्योंकि ये सब एक दूसरे से जुड़े ही रहते हैं, पृथक पृथक चुन नहीं सकते. आप एक का बचाव करेंगे कि यह तो अच्छा लगता है, पता भी नहीं चलेगा कि उसके साथ दूसरा कब आके खड़ा हो गया. और जब तक आप को पता चलेगा कि आप को इस्तेमाल कर लिया गया है, आप के हाथों उनका काम हो चुका होगा और आप उनके लिए नाकाम भी हो चुके होंगे.

कहाँ से शुरू होती है कहानी उनकी स्वीकृति की?

जागो… जागो! जागो कौन? ग्राहक. याने कौन? आप ही.

ग्राहक… क्या? ग्राहक राजा!

क्या वाकई ग्राहक कभी राजा बना?

कभी नहीं.

कौन सी कंपनी से संतुष्ट है ग्राहक, खरीदने के बाद अगर उत्पादन वाकई दोषपूर्ण निकला तो? बस मल्टीपल चॉइस को ही उसकी सत्ता बताई गयी. ये नहीं तो वो, जिसमें कम्प्लेंट आई उसको उठाकर फेंक दो.

इससे असल में क्या हुआ?

हर बात में ग्राहक के हक़ को लेकर सवाल शुरू हुए. इसके उपयोग से अधिक दुरुपयोग ही अधिक हुए हैं लेकिन फिर भी, अपनी सुनवाई हो रही है इस आभास से इसे जनसमर्थन मिलता रहा. यहाँ हमेशा एक ही आधार रहा था – क्लास कन्फ़्लिक्ट.

यहाँ आप चौकेंगे क्योंकि यह क्लास कन्फ़्लिक्ट जाना पहचाना नहीं है. लेकिन यही तो वामपंथ की खूबी है कि जहां आप की सोच खत्म होती है उससे कहीं आगे उनकी सोच चालू होती है.

यहाँ उपभोक्ता को उन्होने शोषित क्लास बना दिया, बात खत्म. पैसे देनेवाला शोषित, पैसे लेने वाला शोषक बदमाश.

आप अगर काउंटर के बाहरी बाजू पर खड़े हैं तो वामी आप के साथ खड़ा है नारेबाजी के लिए. फिजिकली नहीं तो उसके विचारों से आप को प्रेरणा मिलेगी.

बाद में जो होगा अगर आप के फायदे में होगा तो वो उसका श्रेय लेगा, आप को भी नायक नायिका बनाकर फेमस कराएगा. आप का नुकसान होगा तो वो गायब होगा.

इसी का विकसित स्वरूप है मतदाता का उपभोक्ताकरण, जहां मतदाता एक जिम्मेदार नागरिक बनकर, निर्माण प्रक्रिया में हिस्सा लेकर दायित्व नहीं उठा रहा बल्कि केवल अपना मत देकर महज एक उपभोक्ता की तरह ब्रोशर के साथ टैली कर रहा होता है कि यह हुआ यह नहीं हुआ. मारो सोंटा दबाओ नोटा. एक वैचारिक कन्फ़्यूजन, जिसे अराजकता की ओर धीरे धीरे धकेला जा रहा है.

सिसेरो (Cicero) कह गया है कि राष्ट्र अपने मूर्ख और महत्वाकांक्षी लोगों के बावजूद जिंदा रहेगा, लेकिन भीतरघातियों से बचना कठिन कर्म है.

बाहरी शत्रु तो झण्डा ले कर आता है, ये गद्दार तो अपनों में से ही होते हैं, अपनी ही बोली बोलते हैं और उनकी विषाक्त बातें नालियों से होकर, गलियों से गुजरती है और सत्ता के प्रासादों तक सुनी जाती हैं.

क्योंकि वो गद्दार गद्दार दिखते नहीं, हम जैसे ही दिखते हैं, उनके चेहरे और पहनावा भी हम जैसे ही होते हैं. वे तर्क भी वही देते हैं जिनकी भाषा हमें समझ में आती है और भाती है.

मनुष्य के मनों में गहरे दबा दिये जो भी नीच भाव हैं, इनके शब्द उन्हें ही आवाज़ देकर ऊपर उठाते हैं. देश की आत्मा को ये गद्दार सड़ा देते हैं, उसकी नींव को खोखली कर देते हैं ताकि जब ये अपना अंतिम धक्का दें, वो भरभरा कर गिर जाये.

अगर हम देखें तो मूर्खों और महत्वाकांक्षियों को ही तो गद्दारों ने अपना मोहरा बना लिया है और आराम से दूर बैठकर बैरम खान की तरह बंदूकें तानकर खड़े हैं, जो भी मरेगा आखिर हिन्दू ही मरेगा.

इसी के साथ साथ, वामियों की सभी जगह compliance की प्रक्रिया भी ज़ोरों पर है. यह केवल औद्योगिक उत्पाद के दर्जे तक सीमित नहीं रहती बल्कि सप्लायर कंपनी की विचारधारा द्वारा उनके कर्मचारियों के विचारों पर भी compliance की तरफ बढ़ती है. विश्वास नहीं होता तो किसी कॉर्पोरेट तथा किसी सरकारी कर्मचारी को पूछ लो, क्या वो खुलकर आप का साथ दे सकता है?

और हाँ, आप देख रहे होंगे कि इनका यह सब उकसाव, केवल हिंदुओं में ही अधिक है, खास कर जहां मतदाता के उपभोक्ताकरण (converting the voter into a consumer) की बात है.

इतना सब पढ़ने के बाद बाकी सोचना मैं आप पर ही छोड़ता हूँ. क्योंकि अपने अंदर के गरुड़ या फीनिक्स का पुनरुत्थान आप को ही करना है. हाँ, वो कहानियाँ असत्य हैं, लेकिन उनका भाव सत्य है. पीड़ा असह्य होगी.

फिर भी, उड़ान के लिए हार्दिक शुभेच्छा.

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