ख़ुशी है कि भाजपा ने अब सीख लिया राजनीति का यह खेल

चुनाव साफ साफ जीत कर सरकार बनाने से ज्यादा मजे की बात है इस तरह से जोड़ तोड़ कर सरकार बनाना.

जब भाजपा इस तरह सरकार बनाती है और विपक्षी लोट-लोट कर नैतिकता की दुहाई देते हैं तो बहुत सुख मिलता है.

वर्षों से नैतिकता भाजपा की कमजोर नाड़ी रही है. किसी ने कोई झूठा अनर्गल आरोप लगा दिया और आपने नैतिकता के मारे इस्तीफा दे दिया.

हवाला मामले में किसी की डायरी में LKA लिखा हुआ मिला सुनते हैं… और आडवाणी जी ने इस्तीफा दे दिया.

एक फ़र्ज़ी स्टेज मैनेज्ड स्टिंग आपरेशन हुआ और आपने बंगारू लक्ष्मण को हटा दिया. जब तक तरुण तेजपाल का चरित्र सामने आया, बंगारू लक्ष्मण का राजनीतिक जीवन चौपट हो चुका था.

ऐसे ही झूठे आरोपों में यदुरप्पा जी को पार्टी से बाहर होना पड़ा था. जब तक वे निर्दोष सिद्ध होकर वापस आये, तबतक 5 साल का समय हाथ से चला गया.

सॉल अलिन्सकी के रूल्स फ़ॉर रेडिकल्स का चौथा नियम है – Make the enemy live up to his own set of rules… शत्रु को उसके ही नियमों से बाँध दो.

भाजपा का आग्रह था ‘Party with a difference’. यह आग्रह बहुत महंगा पड़ा. वर्षों विपक्ष ने हमें हमारी ही नैतिकता और शुचिता के आग्रह से जकड़े रखा.

विपक्ष की मर्सिनरी मीडिया कोई भी अनर्गल आरोप लगा देती थी, सफाई देते देते आपको साल निकल जाते थे. हमारी नैतिकता हमारी सबसे बड़ी कमजोरी रही.

आज भाजपा राजनीतिक परिपक्वता के उस दौर से गुजर रही है जहाँ यह बात स्पष्ट है कि आप राष्ट्रद्रोही शक्तियों का मुकाबला अपने दोनों हाथ बाँध कर नहीं कर सकते.

मुझे खुशी है कि भाजपा ने राजनीति का यह खेल अब सीख लिया है. और विरोधी जितना बिलबिलाते हैं, मुझे तो उतनी ही खुशी होती है…

उम्मीद है, जैसे इस नैतिकता और शुचिता के स्वपोषित बंधनों से निकले हैं, एक दिन सेक्युलरिज्म की स्वघोषित विकलांगता के पार भी पाएंगे… सबका साथ लेने की और सबका विकास करने की जो मजबूरी खुद ओढ़ रखी है, उसका खोखलापन भी दिखाई दे पाएगा.

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