नैतिकता की दुहाई देना बंद करो, मां का आंचल फाड़ने जलाने वाले निर्लज्जों

स्पष्ट कर दूं कि मातृभाषा हमारी मां के समान ही होती है. यह लेख उस अहसानफरामोश कांग्रेस के लिए है जिसने हिन्दी मातृभाषा वालों के दम पर लगभग 58 वर्षों तक देश में निर्बाध राज किया है.

थोड़ा और स्पष्ट कर दूं कि राहुल गांधी खुद और राहुल गांधी की मां, राहुल गांधी के पिता, राहुल गांधी की दादी, राहुल गांधी के परनाना को देश में राज करने की शक्ति और समर्थन हिन्दी मातृभाषा वालों ने ही दिया.

लेकिन…

कर्नाटक में कांग्रेस के चुनावी अभियान की शुरूआत उसके मुख्यमंत्री सिद्धारमैया ने कर्नाटक में मेट्रो स्टेशनों से हिंदी के बोर्ड हटवाने का अपना हिन्दी विरोधी राक्षसी अभियान शुरू कर के ही किया था.

सिद्धारमैया ने

”नम्मा कन्नडा, नम्मा बेंगलूरू”
“हिन्दी साम्राज्यवाद नहीं चलेगा”
‘हिंदी थोपी जा रही है”

सरीखे नारों को हथियार बनाकर कर्नाटक की जनता के मन में हिन्दी विरोधी ज़हरीली भावनाएं भड़काने का कुकृत्य शुरू कर दिया था.

सिद्धारमैया के इस अभियान को अंजाम देने के लिए कांग्रेसी फौज सड़कों पर उतर गई थी. बंगलुरू समेत पूरे कर्नाटक में राज्य सरकार के प्रतिष्ठानों और संस्थानों से हिंदी में लगे बोर्ड रातोंरात हटा दिए गए थे.

निजी संस्थानों, प्रतिष्ठानों और दुकानों से भी हिन्दी के बोर्ड हटवा दिए गए थे. जिन निजी संस्थानों, प्रतिष्ठानों और दुकानों ने अपने हिन्दी के बोर्ड और बैनर नहीं हटाए थे उनके बैनर बोर्ड सिद्धारमैया के सियासी गुर्गों ने उखाड़कर जला डाले थे.

आश्चर्यजनक रूप से कन्नड़ अस्मिता के नाम पर हिन्दी के खिलाफ पूरे कर्नाटक में हिंसक ताण्डव करवाते रहे कांग्रेसी मुख्यमंत्री सिद्धारमैया को अंग्रेजी बोर्ड और बैनरों से कोई परहेज नहीं था.

कन्नड़ अस्मिता के नाम पर सरकारी संरक्षण में की जाती रही भाषाई हिंसा के दौरान अंग्रेज़ी के खिलाफ कांग्रेसी मुख्यमंत्री सिद्धारमैया और उसके गुर्गों ने एक शब्द नहीं बोला था. बंगलुरू समेत पूरे कर्नाटक में अंग्रेज़ी के बोर्ड और बैनर यथावत लगे रहे थे.

कांग्रेसी मुख्यमंत्री सिद्धारमैया ने पूरे कर्नाटक में हिन्दी के खिलाफ भय और आतंक का नंगा नाच खुलकर करवाया था. पिछले 6 महीनों से कर्नाटक में हमारी मातृभाषा हिन्दी उसी तरह तरह थर थर कांपती रही जिस तरह बलात्कारी गुण्डों के घेरे में घिरी कोई अबला नारी कांपती है.

सिद्धारमैया के इस हिन्दी विरोधी राक्षसी कुकृत्य का खुला समर्थन शीर्ष कांग्रेसी नेतृत्व ने निर्लज्जता के साथ किया था. महीनों तक कर्नाटक में घूम घूमकर कांग्रेस का प्रचार करते रहे राहुल गांधी ने अपनी छोटी-बड़ी 60 चुनावी सभाओं/रैलियों में सिद्धारमैया के इस हिन्दी विरोधी राक्षसी कुकृत्य के खिलाफ एक शब्द नहीं बोला था. इसके बजाय राहुल गांधी ने उस धूर्त की प्रशंसा के पुल जमकर बांधे थे.

राहुल गांधी, सोनिया गांधी समेत कांग्रेस के किसी भी छोटे-बड़े नेता ने सिद्धारमैया के खिलाफ एक शब्द नहीं बोला था.

यही वह बिंदु है जो शर्मनाक भी है और खतरनाक भी. तमिलनाडु के कुछ क्षेत्रीय दल हिन्दी का ऐसा विरोध करते रहे हैं. अतीत में महाराष्ट्र में शिवसेना सरीखे कुछ क्षेत्रीय दल भी हिन्दी विरोध का हथकण्डा आजमाते रहे.

लेकिन भारतीय राजनीति में किसी राष्ट्रीय दल द्वारा सड़कों पर उतरकर हिन्दी के ऐसे हिंसक विरोध का यह पहला उदाहरण है. हिंदी का यह विरोध उस अहसान फरामोश कांग्रेस ने खुलकर किया है जिसने हिन्दी मातृभाषा वालों के दम पर लगभग 58 वर्षों तक देश में निर्बाध राज किया है.

कांग्रेस को याद दिलाना ज़रूरी है कि हिन्दी उसकी मोहताज़ ना कभी थी, ना है, ना होगी. इसके बजाय कबीर के शब्दों में हिन्दी भाषा कांग्रेस से कहना चाहती है कि…

माटी कहे कुम्हार से तू क्या रौंदे मोये,
एक दिन ऐसा आएगा, मैं रौंदूंगी तोये..

क्योंकि… चीनी भाषा के बाद हिन्दी यदि विश्व में सबसे अधिक बोली जाने वाली दूसरी बड़ी भाषा है तो ऐसा किसी कांग्रेसी कृपा के कारण नहीं है.

भारत में यदि 70 करोड़ से अधिक लोग मातृभाषा हिन्दी में बोलते, पढ़ते और लिखते हैं तो ऐसा किसी कांग्रेसी कृपा के कारण नहीं है.

यदि फिजी, सूरीनाम, गुयाना, त्रिनिदाद जैसे देश हिन्दीभाषियों द्वारा ही बसाए गये हैं और बांग्लादेश, नेपाल, भूटान, तिब्बत, म्यांमार, अफगानिस्तान, समेत पूरी दुनिया में हिन्दीभाषियों की संख्या लगभग सौ करोड़ है तो ऐसा किसी कांग्रेसी कृपा के कारण नहीं है.

लेकिन मातृभाषा हिन्दी बोलने, पढ़ने, लिखने वालों में यह ताक़त अवश्य है कि कांग्रेस को राजनीति के कूड़ेदान में सदा सदा के लिए दफना दे.

अपनी माँ सरीखी अपनी मातृभाषा का आँचल फाड़ने/जलाने वाले किसी भी कुकर्मी गिरोह को कम से इतनी सज़ा तो मिलनी ही चाहिए ताकि भविष्य के लिए एक मिसाल कायम की जा सके.

अंत में यह अत्यन्त आवश्यक है कि कर्नाटक की जनता को कोटि कोटि धन्यवाद दिया जाए क्योंकि 70 करोड़ भारतवासियों की माँ सरीखी उनकी मातृभाषा हिन्दी का आँचल फाड़ने/जलाने वाले सिद्धारमैया की सत्ता से विदाई के साथ ही कर्नाटक की जनता ने सिद्धारमैया के मुँह पर 36 हज़ार से अधिक मतों की हार की गाढ़ी कालिख भी पोत दी.

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