NOTA की असलियत, एक नोटा समर्थक नामचीन हिन्दुत्ववादी की जुबानी

आप में से कई लोग हमारे एक एडवोकेट मित्र D****** S***** जी से परिचित होंगे ही. सुप्रीम कोर्ट में भी वकालत करते हैं और अपनी लीगल कंसल्टंसी की फर्म भी चलाते हैं.

वैसे पुराने भाजपा कार्यकर्ता है और नॉर्थ ईस्ट में उनका अमूल्य योगदान भी रहा है. मुझे इतना पता है, बाकी उनकी अन्य विधाओं से दूसरे लोग भी परिचित होंगे.

आज एक अन्य मित्र की वॉल पर उन्होने जो कहा है वो नोटा का असली सच है जिसे सब को जानना आवश्यक है.

ये रहे उनके शब्द :

“सर्वोच्च न्यायालय के निर्देश के बाद नोटा का अधिकार मिला है, वो भी लंबी कानूनी लड़ाई के बाद, अतः इसका प्रयोग करना चाहिए. मतदाता को अपनी प्रभावी अरुचि प्रकट भी करनी चाहिए. अभी कानूनी लड़ाई चल रही है जिसमें यह मांग अभी भी लंबित है कि कुल डाले गए वोटों का तय प्रतिशत यदि नोटा डाला जाता है तो वहाँ पुनः चुनाव हो तथा पहले वाले प्रत्याशियों को पुनः खड़ा न किया जाए. नोटा की लड़ाई चुनावी शुचिता की लड़ाई का अंग है. हम सभी जानते है चुनाव का खर्च कैसे लोकतंत्र को भ्रष्ट कर रहा है.”

यहाँ कौन से सत्य की बात कर रहा हूँ? लीजिये, इनके ही शब्दों को पुन: पढ़िये –

“अभी कानूनी लड़ाई चल रही है जिसमे यह मांग अभी भी लंबित है कि कुल डाले गए वोटों का तय प्रतिशत यदि नोटा डाला जाता है तो वहाँ पुनः चुनाव हो तथा पहले वाले प्रत्याशियों को पुनः खड़ा न किया जाए.”

– क्या आज की तारीख में नोटा में यह प्रावधान है?

– मतलब, क्या नोटा के कारण पुन: चुनाव होगा?

आज इन दोनों प्रश्नों का उत्तर स्पष्ट नकार में है. वकील साहब भी घुमा फिरा कर स्वीकार कर ही रहे हैं कि यह अधिकार मिला नहीं है, उसके लिए लड़ाई जारी है.

कौन लड़ रहा है, मामला कहाँ तक आया है इसके बारे में कुछ नहीं.

कानूनी लड़ाइयाँ कितनी लंबी चलती हैं कौन नहीं जानता?

और जिस बात के लिए लड़ रहे थे आप – फिर चुनाव और नए प्रत्याशी – वही बात स्वीकृत ही न हुई तो आप ने जीता ही क्या है?

पहले वाले प्रत्याशियों को पुनः खड़ा न किया जाए की बात तो दूर ही रही, पुन: चुनाव भी नहीं हो रहा. जिसको सर्वाधिक वैध वोट्स मिले वो जीता.

याने आप विपक्ष को वोट नहीं दे रहे लेकिन आपका वोट न देना ही विपक्ष की जीत पक्की कर रहा है, क्योंकि उसके समर्थक तो उसे वोट दे ही रहे हैं, वे नहीं चूकते.

तो फिर लंबी कानूनी लड़ाई के बाद आप को क्या अधिकार मिला? यह तो यूं है कि आपने जोरदार खर्चा कर के अपनी बेटी का विवाह करवा दिया और पता चला कि दूल्हा ही बदला हुआ है, यह तो वही बदमाश है जिसको आप की बेटी ने नकार दिया था.

नोटा के नाम से जो कुछ मिला है, क्या यह अधिकार भी है? किस मुंह से ऐसे आत्मघाती कानून का समर्थन किया जा रहा है? स्वीकार भी कैसे किया ऐसे कानून को? और क्या अक्ल है इन हिंदुवादियों की जो यह देखने से इंकार कर देते हैं कि विधर्मी और विपक्षी पूरी मुस्तैदी से अपने वोट पूरे डलवाते हैं?

दावे के साथ कह रहा हूँ कि भाजपा या मोदी से अधिकांश रुष्ट हिन्दू यह नहीं जानते कि नोटा के मूल उद्देश्य को ही नकार कर, उनके हाथों में एक ऐसी पिस्टल पकड़ा गयी है जिसकी नली चलाने वाले की ही ओर है. उनके मनों में बस यह भ्रम फैलाया गया है कि नोटा दबाओ, सबक सिखाओ.

लेनिन ऐसे ही useful idiots की बात करता है जो कम्युनिस्ट सत्ता में आने के सहायक होते हैं और कम्युनिस्ट सत्ता में आते ही सब से पहले साफ किए जाते हैं. दुख की बात तो यह है कि इनकी लफ्फाजी की कीमत देश की प्रजा, जिसमें इनके परिजन भी आते हैं – अपने जानों से चुकाती है.

वकीन साहब के कमेन्ट का स्क्रीन शॉट जोड़ रहा हूँ. वकील हैं, सबूत तो मांगेंगे ही, सो सादर प्रस्तुत है.

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