विज्ञान और वैज्ञानिक – 5 : समकालीनता कुछ नहीं, सब कुछ परिपेक्ष्य है

वेताल उस वृक्ष पर जाकर फिर से उलटा लटक गया है. राजा विक्रमादित्य बड़ी त्वरा से उसकी ओर वापस लौटते हैं और पुनः चपलता से पार पाते हुए अपने कन्धे पर लाद कर वापस राजधानी की ओर चल पड़ते हैं.

“राजन्, बड़ा कुशल-प्रवीण है तू. तेरी गति अपूर्व है, तेरा शत्रु-दमन अप्रतिम. चल तुझे एक कथा सुनाता हूँ. इससे तेरा मार्ग भी कट जाएगा और मेरी भी परीक्षा हो जाएगी. बस मौन रखकर कथा सुननी होगी और बीच में टोकना नहीं होगा. अब मैं शुरू करता हूँ.”

“सुदूर जर्मनी नामक देश में एक सोलह वर्ष का किशोर मन-ही-मन में एक चिन्तन-प्रयोग करता है. चिन्तन-प्रयोग समझता है? एक ऐसा काल्पनिक प्रयोग जिसे कोई मन में करे, सचमुच नहीं.

कारण कि कदाचित् ऐसा प्रयोग कर पाने की स्थितियाँ मिल ही न सकें या उसे किया ही न जा सके. लेकिन फिर तर्क द्वारा उस प्रयोग के निष्कर्षों पर पहुँचा जाए और उससे किसी वैज्ञानिक सिद्धान्त की पुष्टि में सहायता मिले. तो यह किशोर ऐसा ही एक प्रयोग अपने मन में करता है और कुछ अद्भुत नतीजों तक पहुँचता है.”

“राज एक नवयुवक है, सिमरन एक युवती. राज एक रेलगाड़ी में बैठा है. एकदम बीचों-बीच. इस तरह से कि रेलगाड़ी के आरम्भ और अन्त से उसकी दूरी बराबर है. सिमरन उसके इन्तज़ार में प्लेटफ़ॉर्म पर खड़ी है. रेलगाड़ी को प्लेटफ़ॉर्म से गुज़रना है और उसमें बैठे राज और बाहर खड़ी सिमरन को एक-दूसरे के प्रति हाथ हिलाना है. जिस क्षण राज सिमरन से सामने से गुज़रता है, उसी क्षण एक विशिष्ट घटना घटती है.”

“रेलगाड़ी के दोनों सिरों पर बिजली तड़कती है. एक-साथ. इस तरह कि इंजन और गार्ड-डिब्बे, दोनों उसके प्रहार से झुलस जाते हैं. और फिर अचानक उपजा यह प्रकाश राज और सिमरन, दोनों को दिखायी भी देता है.”

“अब मेरा प्रश्न तुझसे यह है कि राज को दोनों सिरों पर तड़की बिजली किस तरह दिखायी देगी? पहले आगे कि पहले पीछे? या दोनों सिरों पर एक-साथ? और फिर सिमरन को? और इस प्रयोग से तू क्या समझ पा रहा है?”

“और फिर यह बता कि वह सोलह वर्ष का चिन्तन-प्रयोग करने वाला जर्मन किशोर कौन है? इन दोनों प्रश्नों के उत्तर सही-सही देने होंगे, नहीं तो तेरे सिर के टुकड़े-टुकड़े हो जाएँगे.”

“सुन वेताल !” राजा विक्रम धीरतापूर्वक उत्तर देते हैं. “सिमरन प्लेटफ़ॉर्म पर खड़ी है. जिस क्षण उसके सामने से रेलगाड़ी और उसमें बैठा राज गुज़रेंगे, उस समय दोनों सिरों पर तड़की बिजली उसे एक-साथ दिखायी देगी. कारण कि वह स्टेशन पर स्थिर है और रेल के सिरों से टकरायी बिजली उसकी आँखों तक एक-साथ पहुँचेगी. लेकिन राज स्वयं रेलगाड़ी के भीतर है. जो एक दिशा में बढ़ रही है. यह दिशा इंजन की दिशा है. ऐसे में राज को इंजन वाले सिरे पर टकरायी बिजली पहले दिखेगी और गार्ड-डिब्बे से टकरायी बिजली बाद में.”

“इस प्रयोग से मैं यह समझ पाया हूँ कि दो अलग-अलग घटनाओं को दो अलग-अलग रेफ़रेंस-फ्रेमों या पृष्ठभूमियों में स्थित लोग अलग-अलग ढंग से देखेंगे. वे एक ही ढंग से देख ही नहीं सकते.

राज और सिमरन, दोनों के लिए दोनों सिरों पर बिजलियों का टकराना अलग-अलग अनुभव पैदा करेगा. एक को दोनों घटनाएँ एक-साथ दिखेंगी और दूसरे को आगे-पीछे. कहने का अर्थ यह है वेताल कि समकालीनता कुछ नहीं है, सब कुछ परिपेक्ष्य है. कि कौन कहाँ से दो घटनाओं को देख रहा है. कि दर्शक की स्थिति कहाँ है. जहाँ से जो देखेगा, वहाँ से दोनों घटनाएँ भिन्न दृश्यमान् हो सकती हैं.”

“तूने मुझे पूछा कि वह सोलह साल का जर्मन लड़का कौन है, जो यह मानस-प्रयोग कर रहा है. वह लड़का एल्बर्ट आइंस्टाइन है. आगे जाकर इसी तरह के कई चिन्तन-प्रयोगों पर वह अपने विशिष्ट सापेक्षता के सिद्धान्त की नींव रखता है. रेलगाड़ी की यह राज-सिमरन-कथा उसी श्रृंखला की अनेक कथाओं में से एक है.”

इतना कहकर राजा विक्रमादित्य चुप हो जाते हैं.

“अरे वाह राजन् , बड़ा ज्ञानवान् है रे तू ! सब कुछ ठीक-ठीक बता दिया ! आइंस्टाइन को पहचान गया, उसके किशोर-काल के चिन्तन-प्रयोग को और उस पर आगे निर्मित हुए विशिष्ट सापेक्षता के सिद्धान्त को भी. लेकिन एक ग़लती कर बैठा तू ! मुँह खोल दिया, मौन न रख सका! तो ले, अब मैं चला! वापस! पुनः उसी वृक्ष पर!” अट्टहास करते हुए वेताल वापस उड़कर अपने पूर्व-स्थान पर पहुँच जाता है.

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