विज्ञान और वैज्ञानिक – 4 : क्या सेब पृथ्वी को अपनी ओर नहीं खींच रहा?

“बाबू मोशाय, हम-सब तो रंगमंच की कठपुतलियाँ हैं, जिनकी डोर उस ऊपर वाले के हाथों में है. कब, कौन, कैसे उठेगा, यह कोई नहीं जानता” — फ़िल्म ‘आनन्द’ में श्री राजेश खन्ना का किरदार कहता है.

गैलीलियो से चलकर हम न्यूटन तक आ पहुँचे हैं और अब हमारे लिए काल ( यानी टाइम ) और अन्तराल ( यानी स्पेस ) के बारे में बात करनी ज़रूरी हो गयी है. न्यूटन ने जिस तरह से काल और अन्तराल को समझा, उसी तरह से ज़्यादातर लोग काल और अन्तराल को समझते हैं. और ऐसा समझना स्वाभाविक भी जान पड़ता है.

वापस श्री खन्ना के संवाद पर आइए. विज्ञान किसी ऊपर वाले या नीचे वाले को नहीं मानता. सिद्ध और सत्यापित हो जाए, तो बात अलग है. तब तक यह वैज्ञानिक सत्य है कि ब्रह्माण्ड भौतिकी के नियमों से सम्पादित और संचालित है. ( और ईश्वर या ख़ुदा के अस्तित्व पर चर्चा इस लेख का उद्देश्य भी नहीं. )

हम सब वाक़ई रंगमंच की कठपुतलियाँ हैं. हमारे सामने लोग सड़कों पर चल रहे हैं, गाड़ियाँ दौड़ रही हैं. बच्चे स्कूल जा रहे हैं, लोग दफ़्तर. रेलगाड़ियाँ पटरियों पर सरक रही हैं, हवाई जहाज़ आसमान में. सूर्य गगन में उगता दिख रहा है, चन्द्रमा भी. अब तनिक पृथ्वी छोड़िए और अन्तरिक्ष में जाकर ठहर जाइए.

अगर किसी आम व्यक्ति से आप अन्तराल ( स्पेस ) की अवधारणा पूछें, तो खाली जगह बताएगा. वह खाली जगह, ‘जिसमें’ सभी छोटी-बड़ी घटनाएँ हो रही हैं. लोग ‘खाली जगह’ पाते हैं, तो चलते हैं. गाड़ियाँ ‘खाली जगह’ में दौड़ती हैं. ट्रेनें और हवाई जहाज़ ‘खाली स्थान’ पाकर ही आगे बढ़ते हैं. और थोड़ा कुरेदने पर कि क्या यह ‘खाली स्थान’ सचमुच खाली है, तो कह देते हैं कि है तो, लेकिन इसमें हवा मौजूद है.

और फिर अन्तरिक्ष में जो ‘खाली स्थान’ है , वह क्या है? वहाँ तो बहुत जगहों पर धूल-गैस है, लेकिन ज़्यादातर जगह वह भी नहीं. तो उसका खालीपन कैसे समझा जाए?

और फिर समय क्या है? क्या सबके लिए समय एक-सा ही है? क्या ब्रह्माण्ड में हर स्थान पर समय एक-सा ही बर्ताव करेगा? ब्रह्माण्ड में कहीं रुके हुए या अलग-अलग गतियों से चलते व्यक्तियों के लिए समय का ‘गुज़रना’ कैसा होगा?

अगर सर आइज़ेक न्यूटन से इन प्रश्नों के उत्तर पूछे जाते, तो वे कुछ-कुछ आनन्द फ़िल्म-सा जवाब देते. उनके अनुसार ब्रह्माण्ड का हर पिण्ड ( मनुष्य-जीवजन्तु-पेड़पौधे-खगोल पिण्ड ) रंगमंच की कठपुतलियाँ ही हैं. और चूंकि वे आस्तिक ईसाई थे, इसलिए रचयिता ईश्वर को भी मान लेते. और रंगमंच? वह एकदम स्थिर और तटस्थ रहता है. सभी पात्रों के लिए समय एक-सा बीतता है और नाटक ख़त्म हो जाता है.

न्यूटन से पूछिए कि रंगमंच की कठपुतलियों के कारण मंच पर कोई प्रभाव पड़ता है? क्या मंच इन कठपुतलियों के कारण फैल या सिकुड़ सकता है? इन प्रश्नों का उत्तर वे ‘न’ में देते. न्यूटन के अनुसार रंगमंच, जो कि नाटक के पात्रों के लिए एक रेफ़रेंस फ़्रेम है, किसी के होने या न होने से ‘बदलता’ या ‘प्रभावित’ नहीं होता. वह यथावत् बना रहता है.

हममें से ज़्यादातर लोग गुरुत्व को और ब्रह्माण्ड को न्यूटनीय दृष्टि से ही समझते हैं. हम सोचते हैं कि सेब पृथ्वी पर गिरता है क्योंकि इनके बीच में कोई अदृश्य बल की डोरी है. ‘कि हम-तुम डोरी से’ की तर्ज़ पर सेब को पृथ्वी अपनी ओर खींच लेती है. फिर लेकिन मैं आपसे पूँछूँ कि क्या सेब पृथ्वी को अपनी ओर नहीं खींच रहा और बहुत से लोग चकराने लगेंगे.

क्योंकि सत्य यह है कि सेब भी पृथ्वी को अपनी ओर खींच रहा है. बल्कि सत्य यह है कि सेब और पृथ्वी दोनों एक-दूसरे को अपनी ओर खींच रहे हैं. सेब पृथ्वी पर गिर रहा है, लेकिन पृथ्वी भी सेब पर गिर रही है. गुरुत्व का यह बल परस्पर है, दोनों पिण्डों को एक-दूसरे के समीप ला रहा है.

लेकिन फिर सेब और पृथ्वी के ‘होने’ से, जहाँ वे स्थिर हैं, वहाँ कोई प्रभाव पड़ रहा है? ‘वहाँ’ यानी अन्तराल या खाली जगह में? अब यह अधिकांश को चकराने वाली बात लगेगी. लेकिन वास्तविकता वह नहीं है, जो न्यूटन हमें बताते हैं.

बल्कि न्यूटन का बताया गुरुत्व-ज्ञान हमारे लौकिक जगत के लिए व्यावहारिक तो है, पर अधूरा और कच्चा है. इसीलिए न्यूटनीय भौतिकी से हम रोज़मर्रा के जीवन में गेंद-सेब-बस-आदमी-जैसी चीज़ों की गति और स्थिति समझ सकते हैं, किन्तु दो तरह के पिण्डों के मामले में न्यूटन हमें गच्चा दे जाते हैं और भौतिकी के उनके नियम असत्य सिद्ध हो जाते हैं.

वे दो तरह के पिण्ड, बहुत छोटे ( एलेक्ट्रॉन-प्रोटॉन-न्यूट्रॉन ) व बहुत बड़े पिण्ड ग्रह-तारे-गैलेक्सी हैं. यहाँ न्यूटन की समझ से बातें नहीं घटतीं, कुछ और ही ढंग-ढर्रा काम करता है.

न्यूटन के जाने के बाद पिछले डेढ़ सौ सालों में भौतिकी ने ऐसी करवट ली कि हमारी आँखें फटी रह गयीं. कुछ ऐसे बदलाव जाने-समझे गये, जिन्होंने हमें बताया कि रंगमंच कोई तटस्थ और स्थिर स्थान नहीं, वह भी फैलता और सिकुड़ता है. समय भी हर पात्र के लिए एक-सा नहीं बीतता, वह अलग-अलग लोगों के लिए अलग-अलग बीत सकता है.

न्यूटन से अगर आइंस्टाइन मिलते तो यही कहते कि आपने सेब का गिरना देखा और समझा, लेकिन सेब के चारों और धँस रहे काल और अन्तराल के समन्वय को न देख पाये. आगे हम आइंस्टाइन पर विस्तार से बात करेंगे लेकिन उसके पहले थोड़ी भूमिका और समझनी होगी.

अब बात मैक्सवेल और लॉरेंट्ज़ पर, ताकि हम आइंस्टाइन तक सुगमता से जा सकें.

विज्ञान और वैज्ञानिक – 3 : न्यूटन के गति के नियम और गैलीलियो

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