विज्ञान और वैज्ञानिक – 6 : समय का फैलाव

वेताल उस वृक्ष पर जाकर फिर से उलटा लटक गया है. राजा विक्रमादित्य बड़ी त्वरा से उसकी ओर वापस लौटते हैं और पुनः चपलता से पार पाते हुए अपने कन्धे पर लाद कर वापस राजधानी की ओर चल पड़ते हैं.

“राजन्, बड़ा कुशल-प्रवीण है तू. तेरी गति अपूर्व है, तेरा शत्रु-दमन अप्रतिम. चल तुझे एक कथा सुनाता हूँ. इससे तेरा मार्ग भी कट जाएगा और मेरी भी परीक्षा हो जाएगी. बस मौन रखकर कथा सुननी होगी और बीच में टोकना नहीं होगा. अब मैं शुरू करता हूँ.”

“चम्पा देश के राजा रतनसेन की एक ही पुत्री थी मालविका. अतिशय सुन्दर. ऐसी कि उसके रूप-लावण्य की ख्याति दूर-दूर तक फैली हुई थी. सही समय पर रतनसेन ने उसके विवाह के लिए अनेक प्रस्तावों पर विचार किया और अन्ततः एक स्वयंवर के आयोजन का निर्णय लिया.

लेकिन मालविका तो फिर मालविका ही थी. उसके मन में बसा था समीप के शत्रु-राज्य शौर्यपुर का राजकुमार सुन्दरसेन. अत्यन्त मनमोहक चेहरा, आकर्षक कद-काठी. हवा से बातें करने वाला अनूठा घुड़सवार था वह और तलवार के कौशल का ऐसा धनी कि आसमान की बिजली लजा जाए.”

“मालविका ही सुन्दरसेन को चाहती हो, ऐसा नहीं था राजन्. उनका परिचय परस्पर शिकार के दौरान अचानक हुआ था और फिर वह प्रगाढ़ प्रेम में बदल गया. ऐसे में स्वयंवर की बात जब चली तो मालविका ने अपने प्रिय को सन्देश पहुँचाया कि वह आकर उसे ले जाए. स्थिति बस उनके हाथ से निकलने को है. आगे फिर कुछ कहते-करते न बनेगा. सुन्दरसेन ने पत्र पाकर सहमति भरी, लेकिन साथ में एक बात और जोड़ दी.”

“उसने प्रियतमा से कहा कि उसे उसी रात दूर, बहुत दूर अन्तरिक्ष में नीहार-राज्य में शत्रुओं से प्रतिशोध लेने निकलना है. उसके एक दूत-मण्डल का वहाँ संहार कर दिया गया है और साथ में उपहासपूर्ण सन्देश भेजा गया है कि शौर्यपुर वाले जो कर सकते हों, कर लें. पृथ्वी से बाहर उनका कोई वश नहीं. नीहार-राज्य यहाँ से कई हज़ारों-हज़ार प्रकाश-वर्ष दूर जो है !”

“राजन् , सुन्दरसेन के पास एक अद्भुत घोड़ा था नीलाक्ष. ऐसा जीव जो जल-थल-वायु, हर जगह गति कर सकता था. और गति क्या ऐसी-वैसी! पलक झपकते ही वह आँखों से ओझल और फिर न जाने कहाँ!

सो सुन्दरसेन ने प्रियतमा से कहा कि नीहार-राज्य को दण्ड देकर वह यों वापस आ जाएगा. बस उसे वह जाने तो दे. वापस आते ही वह मालविका को ले जाएगा और उससे विवाह करेगा. आज की बात है , बस.”

“मालविका क्या करती! भारी मन से उसने प्रेमी को विदा किया और उसकी राह देखने लगी. सुन्दरसेन अपने अश्व नीलाक्ष पर आरूढ़ हुआ और नीले आसमान के मैदान में दौड़ता सरपट कालिख की गहराइयों में लुप्त हो गया. चला गया. गया. गया. गया.”

“फिर वह कुछ समय बाद लौटा. ज़्यादा समय नहीं, केवल कुछ दिन. लेकिन तब वापस आकर उसने एक अद्भुत घटना देखी. चम्पा देश की राजकुमारी, उसकी प्रेमिका मालविका एकदम जर्जर, कृशकाय और बूढ़ी हो चुकी है. इतनी कि वह मृत्यु-शैया पर है.

अपने अद्भुत घोड़े पर सवार सुन्दरसेन ने सीधे उसके अन्तःपुर में प्रवेश किया और ज्यों ही राजकुमारी की उससे आँखें मिलीं, उसने अन्तिम साँस ली.” कहते हुए वेताल ने भी एक लम्बा उछ्वास छोड़ा.

“अब मेरा प्रश्न तुझसे यह है , मेरे प्यारे विक्रम! कि इस अद्भुत प्रेमकथा से तूने कौन सा भौतिकीय सत्य ग्रहण किया? ऐसा कैसे हुआ कि सुन्दरसेन कुछ दिनों के लिए आसमान की गहराइयों में अति-तीव्र गति से क्या गया, मालविका एकदम वृद्ध होकर मृतप्राय हो गयी?

इस प्रेम-कहानी में ऐसी काल-जन्य दुर्घटना का आशय क्या है? इन प्रश्नों के उत्तर तुझे ठीक-ठीक देने होंगे, नहीं तो तेरे सिर के अभी टुकड़े-टुकड़े हो जाएँगे!”

“तो सुन वेताल !” महाराज विक्रम गम्भीर स्वर में कहते हैं.” सुन्दरसेन और मालविका की इस कहानी में एल्बर्ट आइंस्टाइन की विशिष्ट सापेक्षता का सिद्धान्त घट रहा है. आसमान की विस्तृत दूरियों में जब वह राजकुमार अपने घोड़े से चल पड़ा, तो उसके लिए काल-गति धीमी हो गयी. समय उसके लिए शनैः शनैः चलने लगा.

लेकिन यहाँ पृथ्वी पर वह सामान्य गति से बीतता रहा. नतीजन सुन्दरसेन के वापस आने तक समय इतना बीत गया, कि वह बेचारा जान भी न पाया और उसकी प्रेमिका उसके सामने वृद्ध होकर गुज़र गयी.

आइंस्टाइन के सिद्धान्त के अनुरूप घटने वाली इस विचित्र-विस्मयकारिणी घटना को समय का फैलाव कहा जाता है. यह तभी घटता है, जब कोई व्यक्ति लगभग प्रकाश के वेग से गति करे. तब उसके लिए समय धीमा हो जाता है, घड़ियाँ धीरे चलने लगती हैं.”

इतना कहकर राजा विक्रमादित्य चुप हो जाते हैं.

“अरे वाह राजन् , बड़ा ज्ञानवान् है रे तू! सब कुछ ठीक-ठीक बता दिया! आइंस्टाइन की विशिष्ट सापेक्षता में वर्णित समय के फैलाव को भी बूझ गया! वाह! वाह! लेकिन एक ग़लती कर बैठा तू! मुँह खोल दिया, मौन न रख सका! तो ले, अब मैं चला! वापस! पुनः उसी वृक्ष पर!” अट्टहास करते हुए वेताल वापस उड़कर अपने पूर्व-स्थान पर पहुँच जाता है.

विज्ञान और वैज्ञानिक – 5 : समकालीनता कुछ नहीं, सब कुछ परिपेक्ष्य है

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