राज़ी : यह सिर्फ भारत-पाकिस्तान की नहीं, मेघना-आलिया की फिल्म है

फिल्म राज़ी देख कर समझ नहीं आ रहा कि ज़्यादा तारीफ किस की करूं. मेघना गुलज़ार की कि आलिया भट्ट की.

इसलिए भी कि यह दोनों ही अपने-अपने पिता से बीस हैं. असल में यह फिल्म सिर्फ भारत और पाकिस्तान की फिल्म ही नहीं है, मेघना और आलिया की भी साझा फिल्म है.

निर्देशक और अभिनेत्री की साझा फिल्म. सिर्फ़ निर्देशक या सिर्फ़ अभिनेत्री की फ़िल्म नहीं. जासूसी फिल्म वह भी बिना मार धाड़ और फालतू स्टंट के, पारिवारिक रंग लिए मैंने अभी तक कोई और नहीं देखी.

इस फिल्म की खासियत यह भी है कि यह लाऊड नहीं है. पाकिस्तान और कश्मीर के तार में लिपटी सत्तर के दशक के रंग में डूबी हुई. पाकिस्तान में क्रश इंडिया का तेवर भले था तब लेकिन पाकिस्तान तब आतंकवादी देश नहीं था.

तो इन सब से तो मेघना ने फिल्म को बचाया ही है, फिल्म को राजनीतिक चोंचलेबाजी में भी नहीं फंसाया है. पाकिस्तान में भारतीय जासूसी को उसी तरह पकाया है गोया बिरयानी पक रही हो. मद्धिम आंच पर.

मानवीय और पारिवारिक भावनाओं तथा संवेदनाओं में भीगी यह राज़ी इसीलिए एक बेहतरीन फिल्म बन जाती है. मेघना गुलज़ार की फिल्म बन जाती है. मुड़ के न देखो दिलबरों गीत की सी मिठास लिए दुबारा देखने लायक बन जाती है.

रही बात आलिया भट्ट की तो एक बातचीत में मेघना गुलज़ार ने ठीक ही कहा है कि आलिया बिलकुल गिरगिट की तरह है. अभिनय के इतने शेड हैं आलिया के पास इस फिल्म में भी कि बस पूछिए मत.

क्लासिक तो नहीं कहूंगा पर बेहतरीन फ़िल्म कहने में काहे की कंजूसी करना. इस मारधाड़ और हवा-हवाई कहानियों के दौर वाली फिल्मों में एक ताज़ी और ठंडी हवा की तरह है यह फ़िल्म.

सुबह की ओस में डूबी फ़िल्म. एक सच्ची घटना के आधार हरिंदर सिक्का के उपन्यास कालिंग सहमत पर बनी इस फिल्म की पटकथा, संवाद, अभिनय, निर्देशन सब कुछ लाजवाब है.

आलिया भट्ट के साथ ही उन की मां, सोनी राज़दान, रजत कपूर और जयदीप अहलावत का अभिनय लाजवाब है.

गुलज़ार के गाने में सजी मेघना गुलज़ार की यह फिल्म अपने संजीदा ट्रीटमेंट के लिए भी याद की जाएगी. कृपया मुझे यह भी कहने दीजिए कि मेघना निश्चित ही अपने पिता गुलज़ार से बेहतर निर्देशक हैं. यह भी कि गुलज़ार कापियर हैं , मेघना ओरिजिनल हैं.

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