अपने ही संस्थापक का खात्मा चाहते थे भारत के कम्युनिस्ट, क्योंकि वो राष्ट्रवादी निकला

Communist Party of India (CPI) की स्थापना भारत में नहीं हुई थी बल्कि ताशकन्द में हुई थी और इसको बनाने का आशीर्वाद दिया था लेनिन ने…

अगर आप CPI की वेबसाइट देखेंगे या फिर किसी कम्युनिस्ट से बात करेंगे तो वो इसको 1925 बताएगा… बीच के 5 वर्ष गोल कर देने का अनोखा इतिहास है…

इसकी स्थापना की थी नरेंद्र नाथ भट्टाचार्य ने जिन्होंने अपना नाम एम एन रॉय रख लिया था अमेरिका में… कारण बताते है थोड़ा आगे…

एम एन रॉय एक क्रांतिकारी थे जिन्होंने मान लिया था कि अंग्रेज़ों से भारत की आज़ादी सिर्फ हथियार के दम पर मिल सकती है…

इसके लिए उन्होंने कई देशों की यात्रा की… इंडोनेशिया, जापान, चीन, अमेरिका आदि. अमेरिका में अंग्रेज़ों से गिरफ़्तारी से बचने के लिए इन्होने अपना नाम और पहचान बदल कर एम एन रॉय कर लिया था.

एम एन रॉय जब रूस पहुंचे तब लेनिन ने पहले भारत की कम्युनिस्ट पार्टी बनाने को कहा और भारत में कम्युनिज्म का प्रचार करने को कहा.. जिसको उन्होंने माना और CPI की स्थापना की.

वर्ष 1919 – 20 में सोवियत संघ के पक्ष में पठानों को लड़ने के लिए एम एन रॉय ही मॉस्को से ताशकन्द तक एक ट्रेन भर के हथियार लाया था … जबकि बाद में इन हथियारों का उपयोग पठानों ने भारत के पंजाबी हिन्दुओं और सिक्खों का सफाया करने के लिए इस्तेमाल किया था.

1924 में ‘कानपुर कांस्पीरेसी केस’ हुआ… ये भारत में कम्युनिज्म फैलाने का प्रयास था… जिसको अंग्रेज़ों ने अपने शासन के खिलाफ एक साज़िश माना और कम्युनिस्ट नेता एम एन रॉय, शौकत उस्मानी, ग़ुलाम हुसैन, मुज़फ्फर अहमद, चेट्टियार, नलिनी गुप्ता को दोषी माना.

एम एन रॉय तो गायब हो गए बाकी सब पकड़े गए और फिर अधिकतर पकड़े गए ये कम्युनिस्ट नेता सरकारी गवाह बन गए… इन्होने अन्य क्रांतिकारियों के दल में घुसकर अंग्रेज़ों के लिए जासूसी के बदले पैसे और उपाधियाँ पाई.

इसके बाद अधिकतर कम्युनिस्ट नेता अंग्रेज़ों के लिए काम करते हुए, मुस्लिम तुष्टिकरण करते हुए हिन्दू – मुसलमान लड़ाई कराने का काम करने लगे… इन लोगों ने मुस्लिम लीग के साथ मिलकर भारत के बंटवारे का पूरी ताकत से समर्थन किया.

उधर एम एन रॉय भारत में कम्युनिज्म के प्रचार को लेकर कई देशों में सभाएं और गोष्ठियाँ आयोजित करते रहे और भाग लेते रहे.

Communist Party of India भारत में Communist International की एक शाखा थी और इसका सारा कण्ट्रोल रूस में था. जैसा रूसी कहते उनको वैसा ही करना होता था.

एक थे Heinrich Brandler जो कि जर्मनी के कम्युनिस्ट ट्रेड यूनियन से सम्बद्ध थे. वो कम्युनिस्ट थे लेकिन कम्युनिज्म के एक ग्रुप और नेता के ढर्रे पर चलने की जगह सबके साथ पर विश्वास करते थे.

इसके चलते Communist International ने उनको बाहर कर दिया था… एम एन रॉय उन्ही Heinrich Brandler से प्रभावित हो चले थे…

1927 में एम एन रॉय को रूस के Communist International ने चीन में होने वाले सम्मलेन में अपना प्रतिनिधि बना के भेजा था… वहां उन्होंने कम्युनिस्ट प्रोपेगंडा चलाने वाले प्रेस को बंद करके लोगों की आवाज़ उठाने की वकालत की… उन्होंने अपने बोलने के हक़ की आवाज़ उठाई.

उन्होंने भारत में ब्रिटिश राज के खिलाफ आम आदमी के राज और सहभागिता की वकालत की… इसका नतीजा ये रहा कि Communist International ने तुरंत ही एम एन रॉय को अपने कम्युनिस्ट बिरादरी से अलग कर के रूस से भगा दिया.

इसके बाद एम एन रॉय वापस भारत आये और ब्रिटिश सरकार ने कानपुर conspiracy वाला वारंट जारी करके गिरफ्तार कर लिया… फिर भी वो अभी भी मार्क्सवादी विचारों की हिमायत करते थे.

1936 में ख़राब सेहत के कारण जेल से रिहा हुए और कांग्रेस जॉइन करने के लिए नेहरू से मिले. नेहरू ने फ़िरोज़पुर अधिवेशन में उनका स्वागत किया जबकि उस समय की भारत की कम्युनिस्ट पार्टियों ने कांग्रेस के अधिवेशन और एम एन रॉय का बहिष्कार किया.

कुछ वर्षों के बाद उनका कांग्रेस से मोहभंग हुआ क्योंकि उनको लगा कि कांग्रेस भारत की आज़ादी के लिए नहीं लड़ रही है… इसलिए उन्होंने Radical Democratic Party का स्थापना की जो कि एक राष्ट्रवादी, गैर कम्युनिस्ट और गैर कांग्रेसी पार्टी थी.

वो स्वामी विवेकानन्द, और श्री औरोबिन्दो के आदर्शों के नज़दीक होते गए… उन्होंने द्वितीय विश्व युद्ध के समय कांग्रेस और गाँधी द्वारा अंग्रेज़ों की मदद और भारतीय सैनिक भेजे जाने का विरोध किया…

भारत के कम्युनिस्टों ने 1927 के बाद उनकी हर बात का विरोध किया… 1925 के बाद से ही जब वो रूसी छत्रछाया से निकलकर Heinrich Brandler के करीब आना चालू हुए तबसे ही भारत के कम्युनिस्ट उनके धुर विरोधी हो गए…

भारत के कम्युनिस्ट अपने ही संस्थापक को ख़त्म कर देना चाहते थे क्योंकि वो राष्ट्रवादी निकला, वो लेनिन के खिलाफ गया, उसको भारत से मतलब था, वो कांग्रेस के तरीकों से सहमत नहीं था, वो अंग्रेज़ों के खिलाफ उग्र राष्ट्रवाद और सत्ता में कांग्रेस की पूर्ण अधिकार के जगह भारत के जनता की भागेदारी की तरफ था…

आज़ादी के बाद उसने कांग्रेस के फेंके टुकड़ों पर पलने से इंकार कर दिया… उसको भारत के कम्युनिस्ट नहीं मानते… CPI से लेकर फुदकुए कम्युनिस्ट उसका नाम नहीं लेना चाहते, न ही कभी लेते हैं…

समय आ गया है कि नेहरू के पाले इन पामेरियन और इंदिरा गाँधी के टुकड़खोरों के ऊपर टूट पड़ा जाए और इनको बेनकाब किया जाए…

ये कम्युनिस्ट नेहरू के पालतू कूकुर कैसे बने और राहुल गाँधी तक ‘पीडी’ बने हुए है इस पर विस्तार से बात होगी आगे…

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