मुंबई हमला : नवाज़ शरीफ की स्वीकारोक्ति और उसके निहितार्थ

पाकिस्तान की राजनीति व मीडिया में एक ऐसा भूचाल आया है जिसके कारण भारत की मीडिया व सोशल मीडिया में सुनामी आ गयी है.

भारत में, कर्नाटक में चुनाव और उसके साथ मोदी जी की धार्मिक व राजनैतिक नेपाल यात्रा जैसी बड़ी घटनाओं के बाद भी पाकिस्तान के भूतपूर्व प्रधानमंत्री नवाज़ शरीफ के मुम्बई हमले को लेकर दिये गये वक्तव्यों ने भारतीय उपमहाद्वीप से लेकर शेष विश्व मे कोलाहल मचा दिया है.

मैंने जिस तरह से पाकिस्तान व उसकी राजनीति को समझा व वहां हो रही घटनाओं पर अपनी दृष्टि रखी है उससे मुझ को यही समझ में आ रहा है कि नवाज़ शरीफ ने जो कहा है वह तो महत्वपूर्ण है लेकिन उनके कहने के जो परिणाम सामने आयेंगे वो पाकिस्तान के साथ, भारत के लिये बहुत महत्वपूर्ण होंगे.

इस संदर्भ में मैंने जो यहां पढ़ा है उससे लगता है कि लोगों ने नवाज़ शरीफ ने जो कहा है उसको बहुत संकीर्णता से देखा है और शायद इसी लिये लोगों की बात पाकिस्तान के आतंकी देश होने की और कांग्रेस द्वारा आरएसएस को मुम्बई हमले का जिम्मेदार बताने के प्रयास की भर्त्सना तक रह गया है.

पाकिस्तान में आये भूचाल और उसके परिणामों को सही अर्थों में समझने के लिये, हम लोगों को पहले यह समझना होगा कि आखिर नवाज़ शरीफ ने वाकई कहा क्या है?

कल पाकिस्तान के मशहूर समाचार पत्र ‘डॉन’ में नवाज़ शरीफ का एक साक्षात्कार छपा है जिसमें उन्होंने एक प्रश्न के उत्तर में यह कहा कि ‘(पाकिस्तान में) मिलिटेंट ऑर्गेनाइजेशन एक्टिव है, उन्हें नॉन स्टेट एक्टर्स कहिये. क्या हमें उन्हें सीमा रेखा पार करने की और मुम्बई में 150 लोगो को मारने की इजाज़त देनी चाहिये? इसको आप मुझे समझायें, हम क्यों (पाकिस्तानियों का मुम्बई ब्लास्ट में शामिल होने को लेकर रावलपिंडी के एन्टी टेररिज्म कोर्ट में चल रहा) मुकदमा पूरा नही कर पा रहे हैं?’

नवाज़ शरीफ के इन दो वाक्यों ने पाकिस्तान को हिला कर रख दिया है और लोग इससे निकल कर आने वाले परिणामों से भयातुर है.

पाकिस्तान में तो बहुत कड़ी प्रतिक्रिया आ रही है. लोग, नवाज़ शरीफ को गिरफ्तार करने की मांग कर रहे है. उन्हें राष्ट्रद्रोही, भारत का जासूस और मोदी का यार कह रहे है.

नवाज़ शरीफ की बात को यदि एक लाइन में समझना है तो यह पाकिस्तान के तीन बार रहे प्रधानमंत्री का ‘पाकिस्तान से आये आतंकियों का मुम्बई में धमाका करने की स्वीकारोक्ति है’. यह पाकिस्तान के आधिकारिक कथानक से ठीक उल्टा और भारत के कथानक व पाकिस्तान पर आरोप लगाने का समर्थन है.

निश्चित रूप से नवाज़ शरीफ ने पाकिस्तान को एक बड़ी मुसीबत में डाल दिया है और हो सकता है इसकी कीमत नवाज़ शरीफ को अपनी जान दे कर चुकाना पड़े, लेकिन सवाल यह है कि नवाज़ शरीफ ने ऐसा क्यों किया? इसको समझने के लिये अभी आपको भारत को छोड़ना होगा और सिर्फ पाकिस्तान पर केंद्रित होना होगा.

पाकिस्तान की सर्वोच्च न्यायलय के आदेश से पदस्थ और नेशनल एकाउंटेबिलिटी ब्यूरो के चेयरमैन जावेद इकबाल द्वारा उन पर भ्रष्टाचार के आरोपों की जांच के चलते, आज नवाज़ शरीफ अपने अस्तित्व की लड़ाई लड़ रहे है और उनका मुम्बई ब्लास्ट को लेकर खुलासा करना उसी अस्तित्व की रक्षा करने के लिये इस्तेमाल किया गया उनका अस्त्र है.

वे यह कहेंगे इसका अंदाजा तब भी नही हुआ था जब अदालत से बाहर निकलते हुये उन्होंने यह धमकी के लहजे में पत्रकारों से कहा था कि जिन लोगों के इशारे पर मुझको फंसाया जा रहा है, उनके कई राज़ मेरे अंदर दफन है.

उनका यह इशारा पाकिस्तान के इस्टैब्लिशमेंट यानी सेना की ओर था जिसके बारे में यह पिछले तीन साल से कहा जा रहा है कि वह उनको हटाना चाहती थी और अब सीधे तौर से न कर के, दुनिया की नज़र में बचते हुए अदालत के रास्ते सेना उनको हटाने में कामयाब हो गई है.

सेना और नवाज़ शरीफ़ के बीच 36 का आंकड़ा उसी दिन से हो गया था जिस दिन से नवाज़ शरीफ ने पठानकोट पर आतंकी हमला होने के बाद, अपनी श्रीलंका यात्रा के बीच सीधे मोदी जी को फोन कर के इस पर संवेदना प्रगट की थी और इसके पीछे कौन है, इसका पता लगाने का आश्वासन दिया था.

नवाज़ शरीफ की इसी गलती ने उनको पाकिस्तान के सैन्य नेतृत्व के विरुद्ध खड़ा कर दिया था और उसी दिन से पाकिस्तान की मीडिया व समाज में यह बात घूमने लगी थी कि नवाज़ शरीफ ने कश्मीर मुद्दे से लेकर हर पाकिस्तानी नरेटिव को बेच खाया है.

फिर पनामा लीक के खुलासे व दुबई में अपने बेटे की फर्म से तनख्वाह उठाने को मुद्दा बना कर उनको इसी सेना जिसे इस्टैब्लिशमेंट कहा जाता है, ने इनको निपटा कर, अपनी कठपुतली इमरान खान को स्थापित करने में जी तोड़ मेहनत की है.

कल रात करांची में इमरान खान ने अपने भाषण में यह कहा भी है कि नवाज़ शरीफ ने पाकिस्तान की आर्मी के खिलाफ बात की है.

आज पाकिस्तान एक ऐसे मोड़ पर खड़ा हो गया है जहां उसकी लोकतांत्रिक व्यवस्था खुद को बिना सैन्य इस्टेबलिशमेंट के अपने को नपुंसक समझ रही है. आज पाकिस्तान एक राष्ट्र की बात न हो कर, जमींदार मानसिकता से ग्रसित, एक वर्ग की संप्रभुता का हो गया है.

पाकिस्तान की राजनीति पूरी तरह से दो समुदाय से जकड़ी हुई है जिसमें एक वह है जो जमींदार, धनाढ्य और नौकरशाह है और दूसरी तरह सेना है जो पाकिस्तान की विदेश नीति, सुरक्षा नीति से लेकर आर्थिक नीति तक को दिशा देती है.

इसके अलावा सेना, न्यायालय को भी कंट्रोल करती है. आप इससे समझ लीजिये कि पाकिस्तान की सेना का इकोसिस्टम और भारत में कांग्रेस का इकोसिस्टम एक ही बराबर है.

अब आते है कि नवाज़ शरीफ ने पाकिस्तान की सेना के नेतृत्व के खिलाफ क्यों तीर छोड़ा है? यदि लोगो ने मेरे पिछले 3 साल में लिखे लेखों को पढा है तो यह समझ जायेंगे कि मैं यह लिखता रहा हूँ कि पाकिस्तान में सिर्फ दो वर्ग है, एक धनी और दूसरा गरीब. वहां मध्यम वर्ग बहुत सीमित है.

पाकिस्तान के शासकीय तन्त्र, वह चाहे राजनीति हो, चाहे सेना हो और चाहे नौकरशाही हो, उसपर वहां के जमींदारों और बड़े खानदानों का पूरी तरह कब्ज़ा है. यह वर्ग, वह वर्ग है जिसने पाकिस्तान पर भरोसा करना बंद कर दिया है.

यह बात इससे समझ में आ जाती है कि पिछले एक दशक में जो पाकिस्तान में आर्थिक संकट मुंह बा रहा था वह वहां से बाहर धन जाने के कारण हो रहा था.

पहले इसकी गति धीमी थी लेकिन पिछले 5 वर्षों में यह बड़े पैमाने पर हुआ है और उसमें इस पूरे अभिजात्य वर्ग की सहभागिता है. वह चाहे उसके समाज का हो या राजनीति का हो या फिर सेना का हो.

पाकिस्तान में इतनी विचित्र स्थिति है कि उनके यहां 4 वर्ष से ज्यादा समय तक रहने वाले वित्त मंत्री, कनाडा के नागरिक हैं. यही नहीं, जहां उनके मंत्रियों से लेकर व्यापारी तक विदेशी नागरिकता ले चुके हैं वहीं पर यह मामला सामने आया है कि कुछ मंत्री, सांसद व सीनेटर संवैधानिक पद पर रहते हुए भी विदेश में नौकरी भी कर रहे है.

यही बात उनके नौकरशाहों को लेकर भी बात सामने आई है. इतना ही नहीं उनके नौकरशाह से लेकर सेना के जनरल तक, पाकिस्तान का कोई भविष्य न देख कर, अपने बच्चों को विदेशी नागरिक बना चुके हैं.

अब इसी पृष्ठभूमि में हमको समझना होगा नवाज़ शरीफ ने खुद पाकिस्तान को कटघरे में क्यों खड़ा किया है. कल नवाज़ शरीफ ने जो कहा है वह पाकिस्तान के आंतरिक विघटन व अराजकता को हवा देने के लिये किया है.

मैं समझता हूँ कि नवाज़ शरीफ ठीक वही कर रहे है जो भारत मे सोनिया गांधी कुटुंब और उनके गुलाम कर रहे है. भारत के यह लोग दुबई के रास्ते हवाला का रुपये भेजने के कारण पाकिस्तान की आईएसआई से ब्लैकमेल हो रहे हैं, वहीं नवाज़ शरीफ़, जिंदल समूह के साथ हर तरीके के धंधे को लेकर ब्लैकमेल हो रहे हैं.

शरीफ परिवार के सारे बड़े उद्योग पाकिस्तान से बाहर है और जिंदल समूह उनके स्टील के उद्योग में सबसे बड़ा सहयोगी है. जितने दस्तावेज पनामा लीक के माध्यम से सामने आये है वह इसी बात की तरफ इशारा कर रहे है कि शरीफ परिवार अपना ज्यादातर धन पाकिस्तान से बाहर निकाल रहा है.

यही कारण है कि जब एक बार नवाज़ शरीफ ने यह समझ लिया कि बिना पाकिस्तान की सेना के नेतृत्व की इच्छा के वे भारत से सम्बन्ध नहीं बना सकते है और पाकिस्तान की सेना आतंकियों को समर्थन देना बन्द नहीं करेगी तब उन्होंने पाकिस्तान के भविष्य की चिंता छोड़ कर अपने और परिवार की चिंता को प्रथमिकता देनी शुरू की.

उन्होंने अपने पास विदेश मंत्रालय रखा और अपने सीए को वित्तमंत्री बनाया जो बाद में पता चला कि कनाडा का नागरिक है. इन वित्तमंत्री के विरुद्ध वहां की कोर्ट ने एक केस के सिलसिले में जब वारंट निकाला तो वे इंग्लैंड निकल कर अस्पताल में भरती हो गये और वही से 6-7 महीने तक वित्त मंत्रालय चलाते रहे.

उन्होंने महंगी दरों पर बांड बेचे और चीन की कम्पनियों से अव्यवहारिक रूप से महंगे सौदे किये. इस सबका परिणाम यह हुआ कि पाकिस्तान बहुत कम समय में खोखला हो गया.

अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर नवाज़ शरीफ ने पाकिस्तान की सेना के दबाव के बाद भी भारत के विरुद्ध कोई कूटनैतिक युद्ध नहीं किया. यहां तक कि कुलभूषण जाधव मामले को लेकर अंतर्राष्ट्रीय मंच पर, भारत के विरुद्ध एक बार भी इल्जाम नही लगाया.

हद तो तब हो गयी जब अंतर्राष्ट्रीय कोर्ट में कुलभूषण जाधव का केस गया था तब भी नवाज़ शरीफ ने अंतिम समय तक पाकिस्तान की ओर से किये गये वकील व उसकी फीस स्वीकृत नहीं की थी.

यदि बहुत साफ शब्दों में कहूँ तो नवाज़ शरीफ ने वह सब किया जिसमें पाकिस्तान का अहित था. यदि आज पाकिस्तान में नवाज़ शरीफ को देशद्रोही, मोदी का यार और भारत का जासूस कहा जा रहा है तो यह कोई आश्चर्य वाली बात नहीं है.

आज जब उनके अस्तित्व के संघर्ष की आखरी पारी चल रही है तब उन्होंने, पाकिस्तान की रीढ़ की हड्डी बनी उसके पाकिस्तान के सैन्य नेतृत्व पर चोट करनी शुरू कर दी है. उनको इस बात की आशा है कि पाकिस्तान की सेना को कटघरे में खड़ा कर के वे पाकिस्तान की सेना पर अंतर्राष्ट्रीय (अमेरिकी) दबाव बनवा कर, अपने धन व अस्तित्व को बचा लेंगे.

भारत को पाकिस्तान की घटनाओं पर गिद्ध दृष्टि बनाये रखने की आवश्यकता है क्योंकि आश्चर्यजनक घटनाएं, आश्चर्यजनक परिणामों को जन्म देने के लिये होती है.

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