नमक हराम की ड्योढ़ी

सन् 2000 की बात है हम कार्तिकी पूर्णिमा के लिये दतिया गये थे. वहां हमारे बड़े गुरूभाई भारद्वाज जी भी आये हुये थे. वे उम्र मे हमसे भी बहुत बड़े थे लगभग पिताजी की उम्र के.

यूपी सरकार का कोई निगम है हैंडिक्राफ्ट और हैंडलूम्स को लेकर, उसमें वे बड़े पद पर थे सरकार की ओर से. उस समय उनका पद डिप्टी कलेक्टर के समकक्ष था.

वो तब पश्चिम बंगाल घूम कर आये थे. उन्होंने बड़ी अनोखी बात बताई वहां की. वे मुर्शिदाबाद घूमने गये थे जो बंगाल की राजधानी रह चुका है नवाबों के समय. वहां पर नवाबों के समय के खंडहर हैं.

वहीं पर एक पुराने टूटे हुये महल का नाम बड़ा अटपटा बताया था गाईड ने उनको. उसने कहा कि ये “नमक हराम की ड्योढ़ी” है.

नाम का लॉजिक पूछने पर बताया गया कि यह महल बंगाल के तत्कालीन नवाब सिराजुद्दौला के वजीर और कमांडर मीर जाफर का है, जो 23 जून सन् 1757 में हुये प्लासी के युद्ध में सिराजुद्दौला को धोखा देकर ईस्ट इंडिया कंपनी के रॉबर्ट क्लाइव से मिल गया था.

उसी धोखे के कारण सिराजुद्दौला कंपनी से हार गया और भारत में अंग्रेजी शासन की नींव पड़ी. यद्यपि मीरजाफर को बंगाल का नवाब घोषित कर दिया कंपनी ने, परंतु लोक समाज उसे स्वीकार नहीं कर पाया कभी और वह उपेक्षित ही रहा.

यहां तक कि उसके जीते जी ही उसके महल को “नमक हराम की ड्योढ़ी” कहा जाने लगा जो उसके मरने के साढ़े तीन सौ वर्षो बाद भी अद्यतन है.

हमको बहुत विस्मित करा इस कहानी ने और सीख भी दी कि जो मिट्टी का ना हुआ अपनी वो कहीं का नहीं रहता.

ऐसा ही प्रसंग करीब पंद्रह सोलह साल पहले का रहा जब अखबार मे आया कि मुंबई के मलाबार हिल स्थित मोहम्मद अली जिन्नाह के बंगले के बाहर कोई सरफिरा लिख गया था “दगाबाज च्या बंगला”.

हालांकि ये खबर बहुत नहीं चली पर मन में घर कर गई और उस सरफिरे को बहुत आभार दिया मन में.

ये सब बातें फिर याद आईं, कारण था अलीगढ़ विश्वविद्यालय के सेन्ट्रल हॉल में जिन्ना के पोर्ट्रेट लगे होने पर. वहां के सांसद ने इसका विरोध किया पत्र लिख कर. बस फिर क्या था, सपाई और बसपाई के साथ कांग्रेस तक खुलकर जिन्नाह के पक्ष में आ गई.

यहां तक कि किसी कांग्रेसी ने कहा कि वहां से जिन्नाह का चित्र हटाने से पहले बीजेपी को संसद के सेन्ट्रल हॉल से “वीर विनायक दामोदर सावरकर “का चित्र भी हटाना चाहिये.

मुसलमान नेताओं के साथ अनेकों राजनेताओं को जिन्ना में अपना जैविक पिता दृष्टिगत होने लगा. कौमी एकता, सेक्यूलर, उदारवाद का विग्रह बन गया जिन्ना. खैर छीछालेदरी से बचने के लिये विद्यालय प्रशासन ने चित्र को कचरे मे फेंक दिया.

ये सब नया नही हैं, कांग्रेस में जो थोड़ा बहुत भलापन था वह भी सब समाप्त हो चुका, सो उसका मूल चरित्र अब खुलकर सबके सामने आ रहा है.

लेकिन इन सब नंगई भरे वक्तव्यों और क्रियाकलापों से जो सबसे भला काम हुआ वह यह कि इनके कारण वह विष भरा मवाद फूटकर ऊपर आने लगा जो व्यवस्था औऱ समाज के अंदर 1947 के बाद से लगातार पक रहा था फोड़ो के रूप में.

आप देख ही रहें हैं और देखते रहिये कहां कहां से यह जहरीले फव्वारे बाहर आ रहे हैं.
जेएनयू के क्रांतिकारी नारे…
जादवपुर यूनिवर्सिटी के नारे…
डीयू में हुये हल्ले…
भीमआर्मी के तमाशे…

कन्हैया, खालिद, जिग्नेश, हार्दिक, प्रकाशराज, कमल हासन सरीखे विषाणु उस मवाद के साथ निकल रहे हैं औऱ निकलते ही जा रहे हैं. जिनके बारे में सोचा ही नहीं जा सकता था.

मुर्शिदाबाद की और मुंबई की नमकहराम की ड्योढ़ियां तो केवल प्रतीकात्मक रह गईं हैं क्योंकि उनके नमकहराम और दगाबाज़ तो अब मर चुके. पर ये जेएनयू, जादवपुर और एएमयू नवीन और जागृत नमक हराम की ड्योढ़ियां हैं. जो चेतन हैं और रानी चींटी की तरह दनादन नमक हरामों की नई नई पीढियां जनती जा रही हैं.

ध्यान दीजिये हम आपके आसपास लगभग हर शहर में मानवाधिकार एनजीओज़, वामपंथी संगठनों के रूप मे नमकहराम की ड्यौढ़ियां विराजमान हैं जहां बैठ कर इनका नमकहराम नेतृत्व रणनीति रचता है औऱ जेबीमगेबीम मोहल्लो, तकिया मोहल्ले अरू बांग्लादेशी झुग्गियों मे बैठा इनकी स्लीपर सेल उसे क्रियान्वित करती है.

(इसके साथ उन सो कॉल्डएजूकेटेड वर्ग को प्रणाम जो मानसिक शीघ्रपतन के इतने शिकार हैं की निमिष मात्र मे उनका मानध्वज झुक जाता है बार बार शरम से.

इसी वर्ग ने पहले कठुआ कांड पर छाती पीटी और शर्मिंदगी में अपने धर्म पर ही लांछन लगा दिये और अब कलकत्ता के मेट्रो में एक तथाकथित प्रेमी जोड़े की बुर्जुआवादी बुजुर्गो द्वारा की जा रही शारीरीक अत्याचार पर टेसुएँ बहाए.

हैशटैग देखिये ज़रा,
“वो बेचारे आलिंगन ही तो कर रहे थे
प्यार तो सबसे पवित्र चीज है
भारत मे सड़क पर मूता जा सकता है पर प्रेम नही किया जासकता है”

जबकि दिल्ली कलकत्ता दोनों मेट्रोज़ में जिन्होंने सफर किया है उन सबको पता है कि ये नवयुगीन प्रेमी युगल भरी मेट्रो में किस तरह के व्यवहार पर उतारू हो जाते हैं. चाहे कंपार्टमेंट मे भारी जनसम्मर्द हो.

तुलसी बाबा के दोहे, “मूंदो नयन कतहूं कुछ नाही” से प्रेरणा लेकर सरेआम एक दूसरे के चुंबन औऱ अँगमर्दन करते हुये परस्पर अंत:वस्त्रों में अपने करकमलों से खोये प्रेम को टटोलते और संधान करते पाये जाते हैं, मानो कामसूत्र और अनंगरंग का समस्त क्रियाविधि लाइव ही होकर रहेगी यहीं. बैक ग्राउँड मे बजता गाना दर्शको के कानो मे बजने लगता है
“जब प्यार किया तो डरना क्या ……..”

दिल्ली की मेट्रो में हम भी दो चार हुये हैं इस दृश्य से. उस समय हम तो चुप रह गये परंतु वो कोलकाता के बुजुर्ग अगर भड़के होंगे तो सोचिये क्या विलक्षण दृश्य उपस्थित करा होगा प्रेमी युगल ने.

अनेकानेक प्रगतिवादी प्रेम के पंछी उऩ बुजुर्गो के खिलाफ गाली गलौज करते पाये गए. पर हमें अपने पर शर्मिंदगी के साथ उन वृद्धों के प्रति सम्मान उमड़ रहा है कि जिस दृश्य पर हम चुप रह गये वे उस बेहूदगी के खिलाफ उठ खड़े हुये.

और पढ़ा लिखा मूर्ख वर्ग अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता में खलल बताकर यूं रो रहा है जैसे वह स्वयं इस धरा पर इसी तरह की सार्वजनिक कामकेली से आया हो.

सो हे अनपढ़ों जो कुछ दारोमदार है सो तुम पर ही देश औऱ धर्म का, नैतिकता का, क्योंकि पढ़ाकू वर्ग तो नमकहराम की ड्यौढ़ियों के निर्देश पर या कहें कठपुतलियां बनकर कौमी एकता और मानवाधिकार, सार्वजनिक प्रेम प्रदर्शन, किस ऑफ लव ऑन रोड – मेट्रो – बस – ट्रेन मे लगा हुआ है.

(चित्र में मुर्शिदाबाद स्थित मीरजाफर का महल नमकहराम की ड्यौढ़ी )

– अविनाश शर्मा

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