राज़ी : एक मासूम के जासूस बनने की देशभक्ति से लबरेज़ फिल्म

“तारीखें गवाह हैं जंग मुल्कों में होती है जीतते मुल्क हैं पर कई बार हार जाते है अपनी भावनाओं से उसे जीताने वाले नायक”.

राज़ी, सहमत, प्रस्तुत, समर्पित, तैयार ये सब एक ही शब्द है देश प्रेम के लिए. देश जो धर्म से न मिलता है ना ही धर्म के नाम पर छिना जा सकता है यही संदेश राज़ी फ़िल्म का मूल संदेश है.

मेघना, गुलज़ार जी का अक्स है. गुलज़ार ने उन्हें उंगली पकड़ कर चलना ज़रूर सिखाया है पर उंगली पकड़ कर शब्दों को बांधना नहीं सिखाया है. ये गुण पिता की छाया बनते बनते मिला है. फिलहाल से शुरू हुआ सफर मेघना का अपनी ख़ूबसूरती पर है और सफर में मील का पत्थर है राज़ी.

राज़ी किसी लड़की का नाम नहीं, राज़ी कहानी है श्रीनगर की एक खूबसूरत लड़की सीधी साधी लड़की सेहमत खान (आलिया भट्ट) की. कहानी 1971 की भारत पाक युद्ध से पहले की है जहां सेहमत दो मुल्कों की कूटनीति से दूर दिल्ली में अपनी पढ़ाई पूरी कर रही है.

हिदायत खान (रजत कपूर), सेहमत के पिता हैं और भारत के जासूस, जो पाक के लिए सिर्फ एक कश्मीरी है जो पाक के लिए खबरें लाता है. हिदायत छुपे रूप में मुक्ति आंदोलन से भी जुड़ा है जो भारत के लिए है पाक के खिलाफ, और ये एक जासूसों का संगठन भी है जिसका मुखिया है खालिद मीर (जयदीप अहलावत).

हिदायत खान को laungs में ट्यूमर के साथ अपनी मौत, उम्र और भारत के खिलाफ पाक की साज़िश का पता चलता है. हिदायत मामले की गंभीरता और अपनी कम उम्र के चलते देश के लिए जासूसी करने को अपनी बेटी सेहमत को राज़ी करते है.

सेहमत को पाक आर्मी के ब्रिगेडियर सैयद (शिशिर शर्मा) की छोटी बहू बनके जाना है. सेहमत मानसिक और शारीरिक तौर पर एक जासूस की ट्रैनिंग ले पाक आर्मी के मेजर इकबाल सैयद (विकी कौशल ) की पत्नी बन जाती है.

सेहमत देश को समर्पित जासूस की तरह हर दिक्कतों को पार कर देश के खिलाफ होने वाली साज़िश की सूचना मुक्ति आंदोलन को दे देती और दूसरी तरफ अपने शौहर की बीवी भी सही मायने में बन जाती.

सेहमत रोज़ लड़ती है एक दूसरे मुल्क की जासूस और गैर मुल्क के घर में बहू होने की. सेहमत का राज़ घर के नौकर पर खुल जाता है खुद को बचाने के लिए सेहमत को अपने ज़मीर को मार कर एक के बाद एक कई खून भी करने पड़ते हैं और अंत में खुद राज़ को बचाने के लिए वो बंदूक अपने शौहर इकबाल पर उठाती है तो बस इकबाल यही सवाल पूछता है कि क्या हमारे बीच एक पल भी कुछ था? सच बोलना……

सेहमत रोते हुए यही जवाब देती है कि गर मैं ये बोलूं कि मुल्क से पहले कुछ नहीं तो……. सेहमत एक रहस्यमय तरीके (ये आप फ़िल्म में देखें तो बेहतर है, इसलिए रहस्यमय कहा ) से बचके श्रीनगर आ जाती है.

सीमा पार करते ही वो बेहोश गिर जाती यहां उसे पता चलता है कि वो माँ बनने वाली है. सेहमत अपनी माँ से यही बोलती है कि बस अब एक और खून मुझसे न होगा. मैं अपने बच्चे को जन्म दूँगी. सेहमत की ही जासूसी से देश पाकिस्तान के PNS गाज़ी तक पहुंच पाता है जो 1971 के युद्ध में एक बड़ी उपलब्धि थी. सेहमत देश को जीतते जीतते भावनाओं के खेल में खुद को हार जाती है.

फ़िल्म देश भक्ति के उस जज़्बे को दिखाती है जो धर्म और संकीर्ण सोच से परे है. फ़िल्म युद्ध के उन unseen hidden heroes को दिखाती है जो या तो मारे गये, या जेल में है या गुमशुदा हो गए. जिनकी उपलब्धि कहीं लिखी नहीं है. उनकी शहादत पर कोई इनाम नहीं, कोई बटालियन का नाम नहीं.

कहानी भवानी अय्यर और मेघना की है जोकि “calling sehmat” एक नॉवेल पर आधारित है. सम्वाद मेघना के स्पष्ट और प्रभावपूर्ण हैं. तीन गीत, तीनो के बोल उफ्फ …..”dilbaro” एक विवाह विदाई गीत है जो रुला देता है. ज़ाहिर सी बात है गुलज़ार लिखे और शब्द गहरे न हों, हो ही नहीं सकता. दूसरा गीत राज़ी है अरिजीत की आवाज़ में. फ़िल्म में संगीत दिया है शंकर अहसान लोय ने.

हर कलाकार उम्दा, आलिया एक मासूम लड़की जिसे हालात एक जासूस बना देता है. सेहमत रोज़ देश के लिए जीती है रोज़ देश के लिए ज़मीर को मारती है, पर वो मज़बूत है, दूरदर्शी है और बहुत मासूम भी.

वो जो करती वो देश के लिए क्योंकि देश के लिए अब्बू को बचपन से जीते लड़ते देखा है. विकी कौशल, आलिया के शौहर के रूप जंचे है. सबसे ज़्यादा जिसने प्रभावित किया वो हैं जयदीप अहलावत. जयदीप की आप गब्बर इज़ बैक, chitagong, खट्टा मीठा आदि मूवी देख चुके हैं.

छोटी सी भूमिका में संजय सूरी दिखे, मेघना का संजय प्रेम दिखा. सोनी राजदान, आरिफ ज़कारिया, रजत कपूर, शिशिर शर्मा थियटर के सब गूढ़ कलाकार हैं. ये फ़िल्म की कहानी सौ करोड़ का व्यवसाय नही. मेरी नाम राशि अमृता खानविलकर सुंदर लगी है.

फ़िल्म के कई दृश्य आपको धक कर जाते, क्या होगा आगे! फ़िल्म में रहस्य नहीं रोमांच है और ऐसी फिल्मों में गति होना ज़रूरी है और वही इस फ़िल्म की एडिटिंग और स्क्रिप्ट ने बनाये रखा. एक दृश्य है जहां सेहमत एक गिलहरी को बचाते हुए खुद घायल हो जाती पर सुई और खून देख घबराती. सोचिये यही सेहमत खुद को बदल के कैसे खून करती है देश के लिए.

जासूसों के जीवन का दूसरा पहलू दिखाया है मेघना ने जबकि वो औरत हो और जिसे जासूसी भी ससुराल की करनी थी. हर किरदार मुस्लिम देशभक्ति से ओत प्रोत तो क्या ये संदेश नहीं मिलता कि धर्म देश प्रेम सीखता है ना कि गद्दारी.

अब मेरा सवाल ये फ़िल्म भी पाकिस्तान को क्यों न भायी जबकि कोई गाली नहीं दी पाकिस्तान को.. फिर क्यों?

शिकस्त, एक मुस्लिम का देश प्रेम जज़्बा और गाज़ी अटैक का थोड़ा सच बहुत था पाकिस्तान की जलन के लिए जबकि सेहमत का ससुराल यानी पाकिस्तान का मुसलमान उसको भी मेघना ने एक सामान्य मुस्लिम ही दिखाया तब भी जलन तो होनी है.

सलाह इस फ़िल्म के बाद गाज़ी अटैक जरूर देखें. देशप्रेम लहलहा उठेगा.

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