मईयो कल्ल कू तू चली जावैगी तौ…

हमारी मईयो का एक बागवाँ हुआ करता था… तीन बहू दस पोते पोतियों वाले पेड़ पौधों वाला बागवाँ…

भाईयों की एकता के लिए दूर दूर तक मशहूर और रिश्तेदारों की ईर्ष्या का कारण बने हमारे घर को मानो किसी की नज़र लगी और एक पल में घर में एक चूल्हे के दो चूल्हे हो गये…

वो बात अलग है जिस शाम ये हादसा हुआ उस शाम दोनों ही चूल्हों पर बने भोजन का एक कौर तक किसी ने नहीं तोड़ा था…

इससे पहले ऐसा कभी नहीं हुअ था… घर में कभी क्लेश होता था तो मईयो सबकी झिड़की फटकार या लताड़ खा खा कर सबको खिला कर ही सोने देती थी… लेकिन उस दिन तो मानो उसकी भी ताकत शायद जवाब दे गयी थी.

खैर मईयो ने अगले दिन डरते डरते एक एक करके सबको खाना खिलवाया… आज मईयो को किसी ने लताड़ फटकारना तो दूर कुछ मनाही भी नहीं करी थी… लेकिन मईयो भैयाओं के अहम भरे संकोच की दीवार को नहीं तोड़ पायी सो पहले दिन बने दो चूल्हों को एक नहीं कर पायी…

और फिर समय को पहचान कर मईयो ने बहुत जल्दी ही तीसरी बहू को भी संयुक्त चूल्हे के बंधन से मुक्त कर दिया…

मईयो की भजन पूजा और भोजन की चिड़िया जैसी ही खुराक के लिए छुआ छूत वाले नियम किसी घोर परम्परावादी ब्राह्मण को भी कहीं पीछे छोड़ने वाले थे…

[गिरधारी लाल गोयल की मदर्स डे पर एक और अनुपम रचनाजे आधी रोटी दही बूरे सै और खा लै…]

और उधर बड़े भईया के बच्चे बड़े थे और मेरे बच्चे बहुत छोटे, सो इन दो बहुओं के साथ उसका गुज़ारा मुश्किल था… यहाँ मईयों के पूजा पाठ और भोजन की पवित्रता वाले नियम चलना मुश्किल था और उधर बीच वाले भईया के हिस्से में मईयो का पूजाघर पड़ रहा था, सो वो बीच वाले बेटे के साथ ही रह गयीं…

तीसरा चूल्हा उसकी सबसे छोटी बहू यानी मेरा था… पहले दिन भोजन मईयो ने ही बनाया… अपने सामने ही बिठा कर मुझे गर्म खाना खिलाया… मेरे पसंद की उड़द की दाल और गुठेन्वा रोटी बनायीं…

मईयो का पता नहीं कि वो कितना खिलाना चाहती थी मुझे… और उधर यहाँ एक कौर तक हलक में नहीं उतर पा रहा था… हालत ऐसी थी मानो चूल्हा अलग नहीं हुआ घर से बेटी विदा हो रही हो…

मईयो रह तो बीच वाली बहू के साथ थी… लेकिन सुबह की पूजा कर तीनों बहुओं के पास जा जा कर तीनों रसोइयों में एक ही तरह का भोजन बनवाना फिक्स करती….

यदि एक बहू दाल-चावल बना रही होती तो शेष दोनों रसोईयों में दाल चावल… या दालबाटी… कचौड़ी… छोले भटूरे… समौसे भल्ले कुछ भी बनें लेकिन मईयो सहम कर, डर उपेक्षा झेल कर, तीनों रसोईयों में एक जैसा ही भोजन बनवाने में सफल रहती…

वो बात अलग है कि इस कोशिश में उसको तीनों रसोइओं में खटना पड़ जाता था… और उधर सबसे बड़ी आफत ये बढ़ी कि सबको खाना सुनिश्चित करके अपना भोजन लेती, सो देर होने पर बीच वाली बहू भुनभुना ही जाती थी…

इधर हम भाईयों को इस बात की शर्म थी कि बाहर किसी को मालूम ना पड़ जाए कि हमारे यहाँ भी आग लग चुकी है सो सब्जी एक जगह आती रही… साथ ही फल फलारी मिठाई से लेकर जो भी सामान थे वे एक ही साथ आते रहे… उनका वितरण तीन जगह करना मईयों के ऊपर, हमारे अहम के कारण पड़ा हुआ अतिरिक्त भार था…

अब एक एक करके दोनों बड़े भईया डायबिटिक हो गये और मेरे तेज मिर्च मसालों वाली स्वाद वाले भोजन के कारण मईयों को उसके तीनों रसोईयों में एक जैसा भोजन बनने वाले प्रयास में होने वाली थकान से तो मुक्ति दे दी थी… लेकिन जब भी किसी रसोई में कोई स्पेशल डिश बनती तो वर्षों की आदत के कारण किसी के हलक में आसानी से उतर ही नहीं पाती थी…

इसी हालत में सबसे ज्यादा विषम स्थिति बनी बीच वाली रसोई में… मईयो तो सिवाय सादा रोटी परांठे के खुद कभी ऐसी कोई चीज खाती नहीं थी लेकिन रसोई की खुशबू से उसका दिमाग भटक कर शेष कुनबे में जाकर अटक जाता… हम बेटे, मईयो को उसका मोह त्यागने को खूब समझाते… झिड़कते…

‘मईयो देख जे तेरौ मोह भौत बड़े कलेश कौ कारण बन जायगौ… तू कछु करवे लायक है नाएं, तौ चौं इतनौ मोह दिखावे… कल्ल कू तू चली जावैगी तौ…‘

और यहीं तक आकर बात रुक जाती….. ‘कल्ल कू तू चली जावैगी तौ…’ के बाद तो कोई शब्द हमारे गले से भी नहीं निकल पाता… और अपना रुंधा हुआ स्वर मईयो से छुपाना भी होता था.

लेकिन मईयो का मोह कहाँ छूटता था… मैं जब भी किसी दूर जगह जा रहा होता था तो बिल्कुल चलते समय मईयो के कमरे की तरफ जाता… मेरी बाजार की चीजें न खाने या भोजन न करने की आदत के मारे मईयो पागल सी हो जाती… लिलहाते से कातर स्वर में पूछती –

‘कछु खावे कू बनवा कै रख लौ कै नाएँ…’

“हाँ परांठे हैं”
‘खा किसम मेरी!’

और मेरे विश्वास दिलाते दिलाते भी बहू को आवाज मार कर उलाहना खा ही लेती – ‘बस तुमें यी अपने बेटा की चिंता ए… इतनी चिंता बारी औ तौ मापै चों पड़ी औ… हियाँ का तुमारे खवावे कू हम पे कछु है नाएं…’

मईयो का अपना सा लिया हुया मुंह, थूक सा निगलता हुया गला देख एक बार तो मालकिन के प्रति गुस्से से तिलमिला जाता, बाद के क्लेश झेलने की कल्पना कर चुपके से निकल लेता… लेकिन मईयो का वो उदास चेहरा घंटों… फिर लौटते समय आँखों में ही तैरता रहता…

और जब लौटने में देर अबेर हो जाती तो सबसे पहले मईयो को ही आवाज लगानी पड़ती क्यों कि खूब पता था कि बिना खाए बैठी होगी इस नालायक औलाद के लिए.

मईयो की यही हालत कमोबेश बड़े भईया के लिए भी होती… लेकिन उनका रहने वाला घर का हिस्सा मईयो के कमरे से कुछ दूर पड़ता… सो चलने से परेशान मईयो से मिलने, भईया ही उसके कमरे में चले जाते… यहाँ उनको मईयो की थाली में से मईयो द्वारा निकली कोई चीज अक्सर खाने को जरूर मिलती थी

और एक दिन भईया बीमार पड़े… मात्र 59 साल की अवस्था में… हमको तो किसी अनहोनी का कोई अहसास ही नहीं था लेकिन वे सपना सुनाते ‘चाचा (पिताजी) रात कू कह रये, आजा… अकेलौ मन ना लगै…’

और आठ दिन बाद सुबह भतीजे ने मुझे आवाज लगायी… मैं पहुंचा… कमजोर हो चले भईया को इधर गोदी में भर कर बिठाने की कोशिश कर रहा था और साथ ही भईया के सुनाये सपने को याद कर बिना सोचे समझे वहीँ से चीख तो पड़ा ‘मईयो जल्दी अइयो’

लेकिन जो हडबडाहट मची उसमें किसी ने भी मईयो को वहां तक जल्दी से लाने की जरूरत ही नहीं समझी…

भईया चाचा का अकेलापन दूर करने चले गये थे… वे भईया जो कि मईयो की सबसे पहली संतान थे… प्राण बसते थे उनमें मईयो के…

और फिर एक साल के अन्दर मईयो भी उन दोनों के पास चली गयी थी…

और इधर जब भी अपनी या बीच के भाई की रसोई में कोई विशेष डिश बनती है या कहीं दूर के लिए घर से बाहर निकलता हूँ तो अनायास ही मईयो के कमरे की ओर पाँव मुड़ते हैं… लेकिन अगले ही पल यथार्थ का अहसास हो जाता है… लेकिन मईयो के वो लिलहाते से कातर स्वर जरुर याद आ जाते हैं –

‘कछु खावे कू बनवा कै रख लौ कै नाएँ…’

और साथ ही वो मईयो को झिड़कना –

‘कल्ल कू तू चली जावैगी तौ…‘

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