Cognitive Dissonance का प्रैशर कुकर और भारतीय मुसलमान : किसी को सुनाई दे भी रही है सीटियां

यह एक अनदेखा पहलू है जो अभी तक कहीं भी चर्चा में दिख नहीं रहा है. इसलिए थोड़ी background आवश्यक है, कृपया धैर्य से अंत तक पढ़ें, निराशा नहीं होगी.

सब से पहले Cognitive Dissonance का अर्थ समझ लें.

अगर मनुष्य का किसी ऎसी जानकारी से सामना हो जाये या जान बूझकर उसे कोई ऐसी जानकारी दी जाये जो उसकी कोई दृढ़ मान्यता – विश्वास – श्रद्धा को ध्वस्त कर दे तो जो मानसिक स्थिति पैदा होती है उसे cognitive dissonance कहते हैं.

अचानक वो मानसिक रूप से खुद को एक शून्य अवकाश में लटकता पाता है और आधार के लिए हाथ पैर मारता है.

Dissonance याने विसंगति, या अगर संगीत के परिभाषा में देखें तो बेसुरापन. मानव का स्वाभाविक आकर्षण सुसंगति या सुर (harmony) में रहने के लिए होता है और उसका मन वही प्रयास करता है कि cognitive harmony पुनर्स्थापित हो.

उसके लिए वो आधार खोजता है. सबूत खोजता है जो harmony पुनर्स्थापित करने हेतु योग्य लगे. लेकिन यहाँ एक खतरा है जिसमें वो अक्सर फंस ही जाता है.

क्या है वो खतरा?

उससे तर्कनिष्ठ नहीं रहा जाता. वो निष्पक्ष नहीं रहता. वो यह नहीं देखता कि मिलने वाला तर्क या सबूत सत्यता की कसौटी पर कितना खरा उतरता है. उसके लिए यह काफी है अगर वो उसकी मान्यता जो थी, उसको फिर से मज़बूत कर सके. वो यह नहीं देखता कि जहां से ये आधार लिया जा रहा है वो कितना विश्वसनीय है. उस वक़्त तिनका भी जहाज़ हो जाता है उसके लिए.

ऐसे क्यूँ होता है?

सब से बड़ी बात है कि आदमी मूर्ख नहीं दिखना चाहता. यह नहीं चाहता कि कोई उस पर हँसे या उसे मूर्ख कहे कि झूठ पर कैसे विश्वास करता रहा. इसलिए वो अपने जैसों को ढूंढते रहता है.

कोई महंगी चीज़ खरीदता है तो उसके और दस खरीददार ढूँढता है कि कल वो चीज़ फेल हो जाये तो उन दस का हवाला अपने पत्नी और बाकी फैमिली को दे सके. उस वस्तु का मुफ्त का प्रचारक भी बन जाता है. अपने निर्णय के समर्थन में संख्या का उसे बड़ा आधार महसूस होता है. जितनी बड़ी संख्या, उतना बड़ा सत्य!

धर्म के बारे में भी वही बात होती है. अगर उसका मन उसे सवाल करता भी है तो अपने मन को यही कर के चुप कराता है – इतने सारे लोग मूर्ख हैं क्या? घर के बड़े, समाज के बड़े और देश और विश्व में इतने लोग अगर इसमें मानते हैं तो क्या वे मूर्ख हैं? मेरे से बड़े बड़े तीसमारखां हैं तो सत्य ही होगा.

यहाँ एक बात और भी दिखती है. संख्या से जुड़कर न केवल खुद को आश्वस्त किया जाता है बल्कि संख्या को अपने साथ जोड़कर विरोधी विचारकों को परास्त भी किया जाता है. जहां तक बात चर्चा, संवाद और विवाद तक सीमित है, ठीक है, लेकिन यह अक्सर हिंसा पर भी उतर आती है.

अगर फिर भी उसको कोई टोके या उसके प्रचार को ही नहीं बल्कि उसके विश्वास को ही बेबुनियाद साबित करें तो उसको बड़ा धक्का पहुंचता है. लेकिन इस वक़्त भी वो तिनके ही पहले ढूँढता है और खोखले तिनकों के देने वालों को अपना तारणहार मानता है.

तर्क से नहीं लेकिन तर्क के परिणति से अधिक डरता है क्योंकि अंत में जब सत्य का सामना होगा तो तेज:पुंज सामर्थ्यशाली कवचधारी योद्धा, बिजूका–कागभगोड़ा दिखाई देगा. उसकी पूरी प्रतिमा ध्वस्त होगी जिसके रक्षण के लिए वो जरूर पड़े तो हिंसक भी हो जाता है.

प्रश्नकर्ता की विश्वसनीयता पर पहला वार करता है – तुम झूठ बोल रहे हो.

दूसरा वार उसकी बनिस्बत अपनी योग्यता पर होता है – तुम्हारी औकात क्या है जो हमें सिखाने चले आए हो ?

तीसरा वार प्रश्नकर्ता की निजता पर होता है जो यूं देखें तो उसको भगाने के लिए होता है – तुम अपने गिरेबान में झाँको ज़रा!

यहाँ कुछ आरोप लगाकर निकल लेने की कवायद होती है कि सामने वाला भी नंगा हो जाये तो चुप हो जाएगा. सत्य का सामना नहीं करना पड़ेगा.

चौथा और सब से हिंसक वार यह होता है कि तुम्हें हम से शत्रुता है इसलिए ऐसे कह रहे हो, तुम्हारे साथ कठोर से कठोर व्यवहार होना चाहिए.

अब यहाँ कुछ भी हो सकता है, और होता भी है.

इसी बात के तहत ये कहानी भी फिट बैठती है : एक मनुष्य की टांग टूटी तो बैसाखी लेनी पड़ी. बाद में वो तो नॉर्मल लोगों से भी अधिक चपल हो गया तो लोगों में जिज्ञासा जागी और उन्होने भी बैसाखी अपनाई, जरूरत न होते भी. बाद में तो वही प्रथा हो गयी और बगैर बैसाखी चलने पर रोक लगा दी गयी. अगर किसी ने बगैर बैसाखी चलने की जुर्रत की तो या तो उसकी टांग तोड़ी गयी या वो गाँव छोड़ गए – और कर ही क्या सकते थे?

इंटरनेट के चलते हिंदुस्तान में Cognitive Dissonance का सब से बड़ा मारा कोई है तो युवा मुसलमान है. वो जानता है कि अब सब जानते हैं कि जब उसके पुरखों ने इस्लाम कुबूल किया होगा वो कोई बहुत गौरवशाली घटना नहीं होगी.

वो जिनसे अपना संबंध बता रहा है उनकी नज़र में तो उसकी औकात धूल बराबर भी नहीं है यह भी सब जानते हैं. समाज के तथाकथित रहनुमाओं ने समाज को मज़हब के नाम पर पिछड़ा रखा है यह भी उसे पता है.

और जिस मज़हब की वो बड़ाई करता है उसकी भी जानकारी सब को हासिल होने लगी है, यहाँ तक कि काफिर भी इस्लाम के बारे में उस से ज्यादा जानने लगे हैं और उनके सवाल, मन में सवाल पैदा कर रहे हैं कि क्या उसकी श्रद्धा सही है?

उसकी हालत उस बाप की तरह है जो अपनी बेटी की मासूमियत को चिल्ला कर साबित करने की कोशिश कर रहा हो और बेटी को उसी वक़्त आई मिचली सब को सच्चाई बता दे.

अब सवाल यह है कि भारत का मुसलमान क्या करेगा? सोशल मीडिया में आजकल वो पहले जैसा आक्रामक नहीं दिखता – बुरी तरह एक्सपोज़ हो चुका है और जानता है कि गंदी गालियां देना अपनी जीत नहीं है.

भला कहाँ तक कह सकता है कि आप लोग कुछ जानते नहीं तो कुछ बोलना मत, जब सामने रखी आयत बस काला अक्षर भैंस बराबर है? कहाँ तक जाति प्रथा को ले कर टोकेगा जब पास्मांदा बनिस्बत अशरफ के बारे में सवाल पूछे जाएंगे?

और कहाँ तक काफिर देवताओं के नाम से गालियां देगा जब हजरत के चरित्र के प्रसंग सही सबूतों के साथ उजागर किए जाते हैं?

कहीं तो मन के आईने में वो सच्चाई की बदसूरत शक्ल देख ही रहा है. Cognitive Dissonance अपना काम कर ही रही है. समझ आ रहा है कि आज तक उसे सिर्फ इस्तेमाल किया गया है और अभी भी किया जा रहा है. कहीं तो वो वैचारिक खालीपन में सहारा ढूंढ रहा है.

और यहीं पर उसे सहारा देने के लिए तिनकों के दुकानदार दौड़े आ रहे हैं. मेमन को शहीद कहने वाली यही जमात है. गोद में उठाई जाने वाली छोटी बच्ची को भी हिजाब पहनाने वाले यही हैं. मदरसे में साइन्स लाज़मी कर देने पर हल्ला मचाने वाले यही लोग हैं. अपनी दुकानों को ही उन्होने मज़हब का नाम दे रखा है और दूकानदारी खतरे में दिखती है तो मज़हब खतरे में होने की आवाज़ उठाई जाती है.

हिंदुस्तान का युवा मुसलमान वाकई एक प्रैशर कुकर में है. Cognitive Dissonance का अभूतपूर्व प्रैशर है इक्कीसवीं सदी में. देखना यह है कि यह प्रेशर का निपटारा कैसे होगा. दुकानदार आंच तो इस तरह दे रहे हैं कि कुकर का विस्फोट ही हो.

भाँप अंदर जम रही है, सीटी तो रह रह कर बज रही है. किसी को सुनाई दे भी रही है?

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