विचारधारा की सत्ता रहेगी तो विचारधारा की आयु बढ़ेगी

यह वाकई चिंतनीय है कि हम लोग अभी भी हिंदूवाद, राष्ट्रवाद और मोदी व राजनीति में उलझे हैं.

यह सही है कि 1000 वर्ष की गुलामी के बाद भी सनातन बचा रहा लेकिन हमें यह तो सोचना ही होगा कि आखिर में कितना बचा रहा?

यह चाहे विचारधारा के स्तर पर हो या भौगोलिक उपस्थिति का लेकर हो या उसकी जनसँख्या का प्रतिशत का हो, हम कम हुये हैं, हमारा ह्रास ही हुआ है.

पहले शताब्दी के आधार पर ह्रास होता था और अब 20वीं शताब्दी के आते आते यह दशकों में सिमट गया है.

इसका कारण सिर्फ एक है कि जहां हमारे मनीषियों और विचारकों ने शुद्धता की अलख जगाई रखी और निर्बल होते समाज में समय समय पर दिव्यात्माओं का प्रवेश होता रहा, लेकिन वहीं पर उसके राजनैतिक सत्ता में भी अविरल बने रहने की अनिवार्यता को आवश्यकता नहीं माना गया.

कतिपय कुछ अपवादों ने भारत की धरा को पवित्र किया है और बाहर से आये शासकों को एक सीमा तक रोका भी लेकिन आपसी ईर्ष्या और स्वार्थ में, अपनों के ही द्वारा छल कर, वे और उनकी पीढ़ी अविरल धारा नहीं बन सके.

इस विश्व में, खास तौर से 19वीं शताब्दी से, जब से लोकतांत्रिक शासन व्यवस्था का आरंभ हुआ है तब से तो यही देखा गया है कि किसी राष्ट्र के नरेटिव (कथानक) में रातों रात बदलाव कभी नहीं आया है और जहां इसका प्रयास किया भी गया है वहां एक ही दशक में उस राष्ट्र के साथ उसका समाज भी छिन्न भिन्न हो गया है.

यह अफ्रीका के राष्ट्रों, मध्य एशिया, दक्षिण अमेरिका और यूगोस्लाविया व सोवियत रूस के टूटने के बाद उनसे निकले राष्ट्रों में प्रचुर मात्रा में देखा गया है.

वैश्विक अनुभव बताता है कि किसी भी राष्ट्र की विचारधारा या उसका कथानक सिर्फ तीन सूरतों में बदलता है.

पहला जब वो गुलामी से निकल कर स्वतंत्र होता है, तब उसके पास मौका होता है. दूसरा जब खूनी क्रांति कर के सत्ता हासिल होती है तब होता है और तीसरा जब एक ही विचारधारा का सत्ता पर तीन पीढ़ियों तक कब्ज़ा होता है तब होता है.

हम भारत में पहले दोनों उपलब्ध रास्तों को पीछे छोड़ चुके है और अब हमारे पास विकल्प सिर्फ तीसरा है.

मेरा यह दृढ़ विश्वास है कि यह आशा पालना कि बिना सत्ता के हिंदुत्व और राष्ट्रवाद को अमरत्व मिलता रहेगा, घातक है.

हमें इतिहास बताता है कि विश्व से एक से एक सभ्यता और संस्कृतियां उजड़ चुकी हैं जिनका मानव के उत्थान में बड़ा हाथ रहा है लेकिन उनके नष्ट होने का सिर्फ एक ही कारण था, कि वे पराजित हुई थी.

पहले समय धीरे धीरे चलता था और उनके ह्रास और समाप्त होने की अनुभूति भी शेष विश्व को देर से होती थी. आज समय तेजी से चल रहा है. जहां सर्जन के परिणाम जल्दी आते है वही विसर्जन के भी परिणाम जल्दी आते है.

पिछले दो दशकों में हम यही सब देख चुके हैं लेकिन अभी भी हम बाहर नहीं देख रहे हैं. मेरे सामने अफगानिस्तान, ईरान, पाकिस्तान, लेबनान बदला है और अब योरप बदलता दिख रहा है.

हमारी विचारधारा की सत्ता रहेगी तो विचारधारा की आयु बढ़ेगी, नहीं तो यह तय मानिये कि आगामी हिन्दू पीढ़ी की आयु कम होने की ओर जा रही है. खुद भारत में 2004 से 2014 के बीच में, सिर्फ 10 वर्षो में ही हिंदुत्व विरोधी हिन्दुओं की एक नई शक्तिशाली, धनी प्रजाति स्थापित हो चुकी है जो भारत के हर तन्त्र में चप्पे चप्पे पर स्थापित है.

इस लोकतांत्रिक व्यवस्था में सिर्फ 5 वर्ष के अल्प काल में यह सब हट जायेंगे, यह कल्पना करना भी अपने आप से बेईमानी है. हां, यह हट सकती है यदि हम सत्ता में कम से कम 2 दशक तक बने रहे ताकि हमारी दूसरी पीढ़ी पूर्व के बौद्धिक व्यसनों से मुक्त हो कर नए विचारों को आगे ले जाने में सशक्त हो.

अगर हमें जल्दी में परिणाम चाहिये है तो फिर बिना सत्ता के प्रश्रय के, मृत्यु के भय से मुक्त, हमें अपनी सेना बनानी होगी, शस्त्र उठाना पड़ेगा और यहां गृहयुद्ध कर के, बीजेपी के हिंदूवादी ठगों को गले से उतार कर, शुद्ध हिंदूवादी सनातन धर्म के किसी प्रतीक को सत्ता पर बैठाना होगा.

यदि आप यह नहीं कर सकते हैं तो फिर लोकतंत्र की कमियों से समझौता करते हुये सत्ता में बने रहिये क्योंकि ये ही आपकी विशुद्ध हिंदूवादी राष्ट्रवादी विचारधारा को अंत में जय मिलने की गारंटी है.

इसका ताजा उदाहरण समझना है तो हाल ही में भारत के पूर्वोत्तर राज्यों की विजय से समझिये. वहां विशुद्ध हिंदूवादी विचार की जय नहीं है.

वहां विचारधारा ने तीन दशकों से काम किया था लेकिन अंत में परिणाम राजनैतिक विजय से ही आया है. अब वहां सत्ता है तो निश्चित रूप से वहां ईसाई धर्मावलंबियों के बीच विचारधारा का प्रसार व उसकी परिपक्वता में तेजी से प्रगति होगी.

मैं जो यह आज कह रहा हूँ, वह न मेरा है और न तेरा है, यह सिर्फ भविष्य का सत्य है जिसके परिणामों का चयन हम आज ही कर सकते हैं.

 

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