मुझे और मुझ जैसों को, हिंदुओं ने हमेशा दिया धोखा और रुसवाई

अंग्रेज़ी का एक शब्द है ‘सैडिस्ट’, मतलब वह शख्स जो दुख को सेलिब्रेट करता है… दुःख ढूंढता है… दुखी होने के बहाने ढूँढता है… दूसरों को दुखी करने के मौके तलाशता है!

मुझे लगता है अक़्सर मेरा लिखा आपको यही अनुभूति प्रदान करता होगा!

जबकि हकीकत यह है कि मैं एक निहायत हँसोड़, मसखरा, चुटकुलेबाज़ और क़िस्सागो टाइप का शख्स हूँ… मगर दूसरों को कृत्रिम रूप से खुश करने के लिए मेरे पास सदैव शब्दों का अकाल रहा है… अधिकांश वहीं लिखता हूँ जो जिया है, भोगा है, या जिससे आह्लादित हुआ हूँ मैं…

2002-2004 में कश्मीर में हिंदुओं के हत्याकांड हो रहे थे… केंद्र में अटल सरकार थी… कश्मीरी आतंक पर अटल सरकार भी काफी सॉफ्ट थी…

इसी किसी समय बरेली में सुधांशु जी महाराज प्रवचन हेतु आये हुए थे… सायं प्रवचन के बाद प्रश्न-उत्तर का सेशन चल रहा था…

मैंने सुधांशु जी के समक्ष प्रश्न उठाया कि “आपके शिष्य सभी हिन्दू हैं… आपको कश्मीरी हिंदुओं के हत्याकांडों से कोई दुःख नहीं पहुचता? क्या आपकी आत्मा उद्वेलित नहीं होती… आपकी आवाज अटल जी भी सुनते हैं… क्यों नहीं सख्त कदमों हेतु आप अटल जी को प्रेरित करते?”…

सुधांशु जी महाराज का तत्कालीन उत्तर सुनकर उसी शाम, सुधांशु जी के प्रति मेरा सम्पूर्ण सम्मान खत्म हो गया था…

सुधांशु जी का उत्तर था…”यह लॉ एंड आर्डर का मामला है… कश्मीर समस्या से हम संतों-सन्यासियों क्या लेना देना”…

यह चरित्र उस सन्यासी/ संत का था… जिसे लाखोँ हिन्दू पूजते आये हैं…

2010 में हाईकोर्ट का निर्णय आया… कोर्ट ने रामजन्मभूमि की दो तिहाई ज़मीन को हिंदुओं को देने का आदेश दिया.

हम लोग खुशी से नाचने लगे… बरेली में सबसे पुराने संघी, श्री के के गुप्ता ने तुरंत कुछ बधाई पत्र जैसे पर्चे तैयार किये…

नज़दीकी मंदिर में जहां रामकथा आयोजन था… हमने बधाई के पर्चे बंटवाए… गुप्ता जी ने माइक पकड़ा… मंदिर के पंडित जी कूद पड़े…”आप लोग मंदिर को राजनीति का अखाड़ा बना रहे हैं… मंदिर कोई हिंदुओं की राजनीति का अड्डा नहीं है”…

हम लोग मंदिर से खदेड़े गए… भक्तों ने भी हमारा विरोध किया… विडम्बना देखिए… मंदिर में ही बैठे भक्तों और पुजारी ने अयोध्या के श्रीराममंदिर के दीवानों का अपमान किया…

हमारी कॉलोनी में यकायक एक हिन्दू समाधि, मज़ार में तब्दील हो गई… तहसील से कागज़ निकलवाए… रिकॉर्ड में कोई मज़ार नहीं मिली…

जिला मजिस्ट्रेट के पास पहुचे… जिला मजिस्ट्रेट ने हमारी बात शांति से सुनी… शाम तक हम लोगों के पास सम्मन पहुंच गए… अगले दिन कोर्ट में जाकर मुचलका भरा… ज़मानते ढूँढी… गिरफ्तारी होते-होते बची…

कॉलोनी के हिंदुओं ने हम लोगों पर खुराफाती और साम्प्रदयिक होने का लांछन चिपका दिया… 6 महीने तक कोर्ट के चक्कर लगाए…

सच कहूं… तो मुझे शिकायत हिंदुओं से है… मुस्लिमों से नहीं… मुस्लिमों ने सदैव मुझे इज़्ज़त बख्शी है… हिंदुओं ने धोखा और रुसवाई दी है… मुझे और मेरे जैसों को…

मगर इस धर्म को कैसे प्यार और सम्मान न दूँ… आखिर मेरे पूर्वजों… मेरी जननी और पिता ने सनातन/ हिन्दू धर्म और इस देश से प्यार करने के भाव मुझे घुट्टी में जो पिलाए हैं… बिल्कुल आपकी तरह…

जय श्रीराम… जय हिन्दुराष्ट्र!

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