जय श्री राम : फर्क तो पड़ता है अपनी प्रतिबद्धताओं को यूँ ही अकारण परिवर्तित करने से

वर्ष 1987 में दूरदर्शन पर आया ‘रामायण’ सीरियल रामभक्ति और रामचरित को जन जन तक पहुंचाने में ‘श्री रामचरित मानस’ से कतई कम नहीं था.

भले कहने-सुनने में अतिश्योक्ति लगे, लेकिन इस मामले में रामानंद सागर का महत्व तुलसीदास जी से कतई कम नहीं माना जा सकता.

जल्द ही उस सीरियल में हनुमान जी के मुख से होने वाला ‘जय श्री राम’ का उच्चारण प्रेम… भक्ति… वीर… और रौद्र रस का प्रतीक बन कर जन जन की जिह्वा पर विराजमान हो चुका था.

और ‘राम जी की सेना चली…’ तो तमाम मुस्लिम बच्चों के मुंह से सुनाई पड़ता तो उस रोमांच की स्मृति अभी भी मेरे रोंगटे खड़े कर भाव विह्वल कर रही है.

यही वो दौर था जब राम मंदिर आन्दोलन छोटी छोटी धाराओं से बड़ी विशालकाय नदी का रूप ले रहा था… विश्व हिन्दू परिषद (VHP) और पूरे संघ परिवार के हर कार्यक्रम में ‘जय श्री राम’ का घोष कार्यकर्ता और भाग लेने वाले लोगों की रग रग में उत्साह भर देता था.

उधर अयोध्या में शिलान्यास हेतु गाँव गाँव, गली गली, मोहल्ले बस्तियों के घर घर में होने वाले शिला पूजन कार्यक्रम के जलूसों में ‘रामजी की सेना चली…’ के स्वर सोते हुओं को भी ‘जय श्री राम’ का घोष करते हुए उठा देते थे.

‘जय श्री राम’ का घोष संघ परिवार को अद्भुत शक्ति दे रहा था… बिलकुल किसी बीज मन्त्र या पंचाक्षरी मन्त्र की भांति…

निश्चित रूप से ये वो दौर था तबकि भाजपाई और संघ परिवार के किसी भी दूसरे अनुषांगिक संगठन के सदस्यों की पृथक पहिचान मुश्किल थी… हर व्यक्ति पूरे संघ परिवार के किसी भी कार्यक्रम का पीर बावर्ची भिश्ती खर था…

‘जय श्री राम’ के बीज मन्त्र का चमत्कार ही था कि 1986 में जन्म भूमि के ताले खुले और 1989 में मन्दिर का शिलान्यास हो 1990 में पूरे भारत वर्ष के करोड़ों लोगों में कारसेवा का भाव पैदा हो चुका था…

‘जय श्री राम’ के नारे के चमत्कार से ही मुल्लायम का ‘अयोध्या में परिंदा भी पर नहीं मार सकता’ वाला दर्प तोड़ हजारों कार सेवक अयोध्या में प्रवेश कर बाबरी पर चढ़ गये थे.

‘जय श्री राम’ के उद्घोष ने बालक राजेन्द्र यादव वासुदेव गुप्त और कोठारी बंधु और सरयू को लाल करने वाले पचासियों अज्ञात कारसेवकों में श्री राम मंदिर के लिए बलिदान होने का जोश पैदा किया था…

हर मकान पर लगीं ‘जय श्री राम’ अंकित पताकाओं और पागलों की तरह बच्चे बड़ों के मुंह से बात बात पर निकलने वाले ‘जय श्री राम’ मन्त्र के कारण ही… तमाम तटस्थ तो दूर, हिन्दू विरोधी पत्रकार और समीक्षकों को भी इसमें हिन्दू चरम पंथ के साथ साथ हिन्दू पुनर्जागरण, हिन्दूवाद या कहिये भाजपा की लहर दिखाई दी और वे ‘भारत में नये परिवर्तनकारी युग के आने की भविष्यवाणी खुल कर स्वीकारने लगे…

और उधर लालू यादव, शरद यादव जैसे लोग ‘जय श्री राम’ का नारा सुन सुन कर खीजते हुए इस नारे को लगाने वालों को खुले मंच से सभाओं में से उठा उठा कर बंगाल की खाड़ी तक फैंकने का आव्हान करते नजर आने लगे…

तब तत्कालीन हिन्दू हृदय सम्राट अडवानी जी अपनी सभाओं में आह्वान करते थे –

“बिना किसी एक मन्त्र के कोई भी आंदोलन सफल नहीं हो सकता…
यहूदी ‘येरुशलम में मिलेंगे…’ के नारे के साथ अपने लक्ष्य को प्राप्त कर पाए…
वहीँ भारत की आजादी के आन्दोलन में ‘वन्दे मातरम् और इन्कलाब ज़िंदाबाद’ नारों ने बीज मन्त्र का काम किया
इसी प्रकार हिन्दू पुनर्जागरण का कार्य हमारा ‘जय श्री राम’ का मन्त्र करेगा.”

और यही वो मन्त्र था जिसके जोश पूर्ण उच्चारण से भाजपा ने 1991 में उत्तर प्रदेश जैसे राज्य में पूर्ण बहुमत के साथ भाजपा अकल्पनीय सत्ता प्राप्त की…

1992 में भी ‘जय श्री राम’ के गगन भेदी घोष ने गुलामी का ढांचा मिनटों में तहस नहस करने की प्रेरणा और शक्ति कारसेवकों को दी…

और तब से भाजपा ने इसी मन्त्र के साथ अपनी सारी लडाईयाँ लड़ीं… लेकिन यकायक 2013 के दिसंबर से ‘जय श्री राम’ को ‘हर हर मोदी’ के नारे से दबाया जाना लगा… भाजपा के नेताओं के लिए मंच से ‘हर हर मोदी’ का नारा लगाना एक अघोषित अनिवार्य धार्मिक क्रिया बना दी गयी थी…

तब मेरे जैसे जरैले और व्यक्तिपूजा के विरोधी इस सम्बन्ध में अपना विरोध दर्ज कराते तो फेसबुक पर न जाने कितने कमेंट मूर्ख और आपिया सिद्ध कर देते थे.

खैर 2014 की जीत से हमारा वर्ग भी ‘हर हर मोदी’ को झेल गया…

लेकिन हम पुनः उद्वेलित तो जब हुए कि हम हमारे 1200 वर्ष के हिन्दू राजा के मुंह से ‘जय श्री राम’ का घोष सुनने को तरस गए.

खैर 2016 का दशहरा हमारे लिए बहुत भाग्यशाली दिन था जो कि हमको हमारा चिर प्रतीक्षित क्षण आया… लखनऊ के रावण दहन में प्रधानमंत्री मोदी के मुंह से जीवन में पहली बार जब ‘जय श्री राम’ का नारा सुना तो हम मारे ख़ुशी के पगला गये थे…

बिलकुल भूल गये कि इन्होने टाउन हाल में गौ रक्षकों के लिए कितना कठोर आरोप लगाया था… बिलकुल भूल गए थे कि ये हिन्दू राजन अभी तक अयोध्या नहीं पहुंचे हैं…

और जब नोटबंदी से बिगड़े माहौल में भाजपा के लिए नारे लगाने वाले पैदा नहीं हो रहे थे… तब ‘एक ही नारा एक ही नाम, जय श्री राम जय श्री राम’ की लाचारी चुनाव प्रबंधकों के सामने आई और यूपी की भाजपाई चुनावी सभाओं पर ‘जय श्री राम’ जैसा जोशपूर्ण नारा छा गया…

और चमत्कार ‘जय श्री राम’ का जो कि 325 सीटों से मोदी जी का झोला भर दिया

और अब श्रद्धालुगण ज्ञान देते हैं ‘सिया राम में ही भक्ति है… सिया के बिना राम कहाँ… हर गांव और मोहल्ले में सिया राम का उच्चारण होता है… हर भक्त सीता राम कह कर ही भजन करता है…

अरे भाई जी! ये ज्ञान तो हमको 1990 के दशक में नामधारी हिन्दू काँग्रेसी और विपक्षियों की तो छोडिये, तमाम मुसलमान और कम्युनिस्ट तक दे चुके हैं.

इस ज्ञान को पा पा कर हमारे कान पक चुके हैं… और उसी ज्ञान को आज के स्पेशल हिंदूवादी और भाजपा ही हमको बांटेंगे? क्या ये दिन भी हमको देखना था…

ध्यान रखिये, ना मन्दिर बनने या ना बनने का कोई फर्क हम लोगों पर पड़ता है… और ना ही माता सीता को भगवान राम जी के साथ जोड़ कर याद करने से…

फर्क तो पड़ता है अपनी प्रतिबद्धताओं को यूँ ही अकारण परिवर्तित करने से…

मोदी जी के लिए लिखने वाले तमाम विद्व लेखकों के पास मोदी जी के अयोध्या ना जाने लिए तो एक मरियल सा लॉजिक है ‘शायद मोदी जी ने कोई प्रण लिया है…’

तो क्या ‘जय श्री राम’ ना बोलना भी उसी प्रण का हिस्सा है?

क्या अपने परिवार के लाखों बूढ़े हो चले लाचार और कमजोर रामभक्तों की भावनाओं को दुखाने वाले इस प्रकार के प्रणों से ही भाजपा का राजनितिक कल्याण होगा?

Comments

comments

loading...

LEAVE A REPLY