अकेले कुछ शुरू करने लायक हिम्मत है क्या?

दिसम्बर 1955 की एक भीगी सी सुबह मोंटगोमरी के लिए एक नया आन्दोलन लेकर आई थी.

करीब 40,000 अफ़्रीकी-अमेरिकी (अश्वेत) सार्वजनिक बस सेवा का बहिष्कार कर बैठे थे. वो एक महिला रोजा पार्क्स की गिरफ़्तारी का विरोध कर रहे थे.

उस वक्त तक कानून गोरे इसाईयों के पक्ष में था और रोजा पार्क्स ने बस में अपनी सीट एक गोरे इसाई के लिए खाली करने से मना कर दिया था. इसलिए उसे गिरफ्तार किया गया था!

ये कोई एक दो दिन, हफ्ते या महीने का आन्दोलन नहीं था. ये बहिष्कार पूरे 381 दिन जारी रहा, यानी एक साल से भी ज्यादा.

इस आन्दोलन का नतीजा ये हुआ कि बसों में गोरे इसाईयों को ख़ास और अश्वेतों के लिए एक दूसरा ही, निकृष्ट बर्ताव, बंद हो गया. सिर्फ एक इंसान के शुरू किये आन्दोलन की कामयाबी का ये हाल के दौर का सबसे बड़ा उदाहरण है.

रोजा पार्क्स (अन्ना टाइप) कोई बड़ी राजनैतिक आन्दोलनकारी, या पुरस्कृत समाजसेवी (सत्यार्थी जैसी) नहीं थी! लेकिन “मैं अकेला ही चला था”, कहते समय जानकार लोग रोजा पार्क्स को भी याद करते हैं.

ये सिर्फ सामाजिक आंदोलनों में होता है, आर्थिक जगत में नहीं होता, ऐसा कहना भी झूठ होगा.

अपने निजी स्वार्थ में पूंजीवाद में कमियां ढूंढते कुछ लोग ऐसा करते तो हैं, लेकिन उनके कमजोर तर्क, लेखन, प्रकाशन, और दूर संचार की विधाओं के सबके लिए खुलने पर ध्वस्त होने लगे हैं.

थोड़े समय पहले तक जब संचार स्रोतों पर उन्होंने अपने 1931 के दौर के मित्र नाज़ी गोएब्बेल्स से सीखकर कब्ज़ा जमा रखा था, तब सिर्फ उनके तर्क ही सुनाई देते थे (तब वही सही भी लगते थे).

आज लेस मिल्स इंटरनेशनल के सी.ई.ओ. फिलिप मिल्स हैं. उन्होंने 1990 के दौर में न्यूज़ीलैण्ड के एक अनजान से स्थान ऑकलैंड में कसरत के लिए बारबेल वर्कआउट की शुरुआत की थी.

आज दुनिया भर में उनके सिखाये हुए 1 लाख 30 हज़ार से ज्यादा इंस्ट्रक्टर हैं. कंपनी बहुत सफल है और वो लोग साठ लाख के करीब लोगों को सौ से ज्यादा देशों में हर साल सिखाते हैं. अंदाजे से देखना हो कि ये गिनती क्यों बड़ी है तो बताते चलें कि 60 लाख की तुलना में न्यूज़ीलैण्ड की आबादी 45 लाख है.

छोटी शुरुआत उतनी डरावनी नहीं होती जितना लोग बताते हैं. भारत में नौकरियां भी अब सरकारी के बदले निजी उपक्रमों में बढ़ने लगी हैं. स्टार्ट-अप इंडिया और स्किल इंडिया जैसे अभियानों की वजह से बहुत सी और भी छोटी कंपनियों का उदय हो रहा होगा.

फ्लिप्कार्ट जैसी छोटी सी कंपनी में एक अलग समस्या भी होती है. उसे जॉइन करने की सोचने वालों को माँ-बाप भी मना करते हैं. वो सोचते हैं कल को कंपनी रहे ना रहे, नौकरी ना छूट जाए, बरसों से टिके नहीं देखा तो कैसा भरोसा?

ये एक सरकारी नौकरी में जिन्दगी शुरू करके वहीँ से रिटायर होने की मानसिकता होती है.

2009 के आस पास जिन लोगों ने डरते-डरते फ्लिप्कार्ट में नौकरी शुरू की होगी वो अब वालमार्ट नाम के अंतर्राष्ट्रीय कंपनी के मुलाजिम होंगे. अब जब अगली बार वो नौकरी बदलेंगे, तो उनकी तनख्वाह में कितनी बढ़ोत्तरी हो रही होगी ये अंदाजा लगाना मुश्किल नहीं. उनके दोस्त भी अब समझ रहे होंगे कि ये फैसला उतना भी गलत नहीं था.

बाकी जवानी में जो सभी ‘अच्छी बातें’ मान ले, कोई चुनौतियाँ ना झेले, रिस्क ना ले, ऐसे लोगों को जवान कहना चाहिए या नहीं कहना चाहिए ये भी सोचने लायक बात है. समय मिले तो ये भी सोचिये कि अकेले कुछ शुरू करने लायक हिम्मत है क्या?

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