विज्ञान और वैज्ञानिक – 2 : गैलीलियो गैलीली से मुलाक़ात से पहले

शाम के साढ़े छह बजे हैं, सूरज ढल रहा है. पार्क में आप बैठे हैं. सामने बच्चे खेल रहे हैं. दो कुत्ते भी वहीं इधर-उधर चलते दिख रहे हैं और कुछ उड़ती तितलियाँ भी. वहीं एक किनारे एक छोटा तालाब है, जिसमें कुछ मछलियाँ तैर रही हैं. तभी बहुत ऊँचाई पर एक हवाई जहाज़ गुज़रता है, उसका शोर यहाँ आपके कानों में प्रवेश कर जाता है.

ये वे गतिमत्ता के दृश्य हैं, जो हमारे जीवन में आम हैं. हम रोज़ चलते हैं, रोज़ आसपास लोगों-जीवों-मशीनों की चाल देखते हैं. आसमान में खगोलीय पिण्ड हमें स्थान बदलते नज़र आते हैं. सूर्य कहीं से उगता है, कहीं और डूबता है. चन्द्रमा कहीं से उदित होता है, कहीं और डूब जाता है. सितारे भी एक ही स्थान पर स्थिर नहीं, स्थान बदलते हैं.

तो प्रश्न उठता है कि स्थिरता क्या है? और क्या सचमुच संसार में कुछ भी स्थिर है? पार्क में बैठे आप क्या सचमुच स्थिर हैं? क्या आप जिस पार्क में, जिस शहर में, जिस देश में, जिस महाद्वीप में और जिस पृथ्वी पर हैं, वह घूम नहीं रही? तो क्या पार्क-शहर-देश-महाद्वीप-पृथ्वी संग आप घूम नहीं रहे?

पृथ्वी अपने अक्ष पर घूम रही है. वह सूर्य की भी परिक्रमा कर रही है. सो आप-पार्क-शहर-महाद्वीप-पृथ्वी भी अक्ष पर घूम रहे हैं, सूर्य की परिक्रमा भी कर रहे हैं.

और वे बच्चे? वे कुत्ते? वे तितलियाँ? वे मछलियाँ? और वह हवाई जहाज़? मैं जानता हूँ कि इन प्रश्नों के उत्तर आप सरलता से दे देंगे. आप कहेंगे कि वे चल रहे हैं. यक़ीनन वे चल रहे हैं. यक़ीनन आप सही हैं.

अब आगे बढ़िए. वह सूर्य जिसकी परिक्रमा पृथ्वी कर रही है, क्या वह स्थिर है? क्या जिस आकाशगंगा का वह एक मामूली साधारण तारा है, वह स्थिर है? और क्या अन्त में अनेकानेक नीहारिकाओं-गैलेक्सियों से बना यह ब्रह्माण्ड स्थिर है?

हम जानते हैं कि सूर्य, नीहारिका, आकाशगंगा व उस-सी अन्य गैलेक्सियाँ गतिमान् हैं. संसार में कुछ भी वस्तुतः स्थिर है ही नहीं. लेकिन फिर गति के इस सत्य को जान लेने के बाद प्रश्न उठता है कि हमें इतनी सारी गतियों का आभास क्यों नहीं होता है? इस बात का कारण भी दरअसल हमारी लघुता में छिपा है. किसी बड़े जहाज़ पर बैठी मक्खी के लिए जहाज़ की गति का अनुभव सरल-सहज नहीं. हम पृथ्वी की सतह पर चिपकी सात अरब मक्खियाँ ही तो हैं.

आप किसी बस में बैठकर जा रहे हैं. आप उसकी किसी सीट पर बैठे हैं. बस के सापेक्ष आप स्थिर हैं. लेकिन पृथ्वी के सापेक्ष आप अब भी स्थिर नहीं हैं. बस में बैठने से बस के सन्दर्भ में आपको रुका माना जा सकता है. लेकिन पृथ्वी के सन्दर्भ में क्या कोई व्यक्ति यह कह सकता है कि वह निरपेक्ष रूप से एकदम रुका हुआ ही है?

अब इसी बस में आपका एक मित्र भी है. लेकिन वह बैठा नहीं है, वह बस के भीतर एक स्थिर निश्चित गति से चल रहा है. अपनी तुलना उसकी स्थिति से कीजिए. वह बस के सापेक्ष भी गतिमान् है और पृथ्वी के सापेक्ष वह और बस दोनों गतिमान् तो हैं ही.

अब एक बात जिसका भौतिकी और उसकी इस शाखा यान्त्रिकी में ज़िक्र बहुत होता है. वह है गति का फ़्रेम ऑफ़ रेफ़रेंस यानी गति की पृष्ठभूमि. कोई चल रहा है तो किस फ़्रेम ऑफ़ रेफ़रेंस के सन्दर्भ में चल रहा है? आपकी बस-यात्रा के दौरान अगर बस को फ़्रेम ऑफ़ रेफ़रेंस या गति-पृष्ठभूमि मानें, तो आप स्थिर हैं. लेकिन अगर पृथ्वी को गति-पृष्ठभूमि मानें, तो आप अब भी स्थिर नहीं, आप चल रहे हैं.

किसी का रुका होना या किसी का चलना, उसकी पृष्ठभूमि पर निर्भर है. कि आप किसके सापेक्ष उसे देखते हैं. कि आप का सन्दर्भ क्या है. कि आप उसकी गति को किस तरह समझना चाहते हैं.

फिर जिसे आप फ़्रेम ऑफ़ रेफ़रेंस मान रहे हैं, वह भी स्थिर नहीं है. बस में चाहे आपका मित्र चले या आप बैठे रहें, बस चल रही है. अगर बस रुक भी गयी, तो पृथ्वी चल रही है. तो ऐसे में भौतिकी में समझ के लिए हम फ़्रेम ऑफ़ रेफ़रेंसों यानी गति-पृष्ठभूमियों को तीन प्रकारों में बाँट लेते हैं :

पहले वे फ़्रेम, जो स्थिर हैं. (यद्यपि स्थिरता भ्रम है, लेकिन फिर भी. पार्क में बेंच पर आप बैठे हों या फिर बस में, यह स्थिरता वस्तुतः तो भ्रम ही है. लेकिन छोटे स्तर पर हम इसे स्थिरता मान लेते हैं. हम मान लेते हैं कि पार्क स्थिर है.)

दूसरे वे फ़्रेम, जो एक निश्चित गति से चल रहे हैं. (यानी उनकी गति समय के साथ घट-बढ़ नहीं रही. जैसे 100 किलोमीटर / घण्टे की गति से चलती कोई बस, जिसका ड्राइवर न एक्सेलेरेटर दबाता है और न ब्रेक. सड़क एकदम स्निग्ध है और उसपर घर्षण है ही नहीं. इसलिए बस की गति कम हो ही नहीं रही.)

तीसरे वे फ़्रेम, जिनकी गति घट-बढ़ रही है. गति का घटने-बढ़ने की दर त्वरण कहलाती है. व्यावहारिक जीवन में कोई भी वस्तु एक निश्चित गति से चल नहीं सकती. उस पर त्वरण का प्रभाव होता ही है. चलती बस की गति बढ़ायी जाती है, घटायी जाती है. वह रुकती भी है.

प्रश्न उठता है कि क्या पृथ्वी एक निश्चित गति से सूर्य की परिक्रमा कर रही है? या अपने अक्ष पर निश्चित गति से घूम रही है? या सूर्य आकाशगंगा की परिक्रमा निश्चित गति से कर रहा है? या क्या आकाशगंगा अन्य आकाशगंगाओं से दूर किसी निश्चित गति से जा रही है?

इन सभी प्रश्नों के उत्तर ‘न’ हैं. पृथ्वी-सूर्य-आकाशगंगा की गतियाँ हमें व्यावहारिक तौर पर एक मान ली हैं, लेकिन ये घटती-बढ़ती रहती हैं. एकदम एक-सी ये कभी नहीं रहती, इनमें बदलाव होते रहते हैं.

इतनी बातें गैलीलियो से मित्रता के लिए ज़रूरी थीं. नहीं तो आप समझ नहीं पाएँगे कि उस आदमी ने कहा क्या था. कि गैलीलियन सापेक्षता दरअसल है क्या. अब हम आगे बढ़ते हैं और गैलीलियो गैलीली से मिलते हैं, जो सदियों से चले आ रहे अरस्तू के भ्रमों को झुठला रहे हैं.

ओवर टू गैलीलियो गैलीली…

क्रमश:

विज्ञान और वैज्ञानिक -1 : आइंस्टाइन का व्यक्तित्व मन को लुभाता, कृतित्व लेकिन समझ में नहीं आता

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