सालगिरह मुबारक़ मेरे मंटो

जब भी सोचती हूँ
तुम्हारे बारे में…..
आ जाते हो सामने
गोल चश्मे के अन्दर से
अपनी बड़ी आँखों से झाँकते
और बैठ जाते हो
मुझे घूरते हुए…..
मैं सहम के सिकुड़ते हुए
देखती हूँ तुमको…..

झाँकने लगती हूँ
तुम्हारे बचपन में
जब वालिद के खौफ से
छुप जाते थे
माँ के आँचल में…..

हो गए बागी
और लिखने लगे
‘अश्लील’ अफ़साने…..
लोग कोसते हुए
तुमको पढ़ते और
चटकारे लेकर फिर कोसते…..
तुम मौके देते
उनको फिर से कोसने का
एक और नया अफ़साना लिख…..

अपने ‘गलीज़’ ख़यालों को
आकार देते
पहुँच गए लाहौर …..
रखने लगे अपनी जेब में
हर रोज़ एक नया अफ़साना…..
बेच देते बीस रुपये में
ख़रीद लेते
साढ़े सत्रह रुपये की व्हिस्की
एक रुपये की सिगरेट
आठ आने का चखना
और थमा देते बची अठन्नी
ताँगेवाले को…..

मंटो…..!
तुम मर गए
अपने आखिरी वक़्त में भी
अपनी पसन्दीदा व्हिस्की से
अपना हलक तर करते…..
अपनी ज़िन्दगी
अपने तौर से जीते…..

तुम जानते हो?
मैं अक्सर गले लग जाती हूँ
ख़यालों में
जामा मस्ज़िद की गली के
उस दर्ज़ी के
जिसने माफ़ कर दी थी
तुम्हारी सिलाई…..
सिर्फ़ ये जानकर
‘हतक’ तुमने लिखी है…..

चूम लेती हूँ हाथ
उस ताँगेवाले का…..
जो नहीं हाँक पाया
अपना ताँगा
तुम्हारी मौत की ख़बर
सुनने के बाद…..

सकीना, सुल्ताना, कुलवन्त,
सुगन्धी, घाटन लड़की
बन गई हैं मेरी सहेलियाँ
गलबहियाँ डाल करते हैं
हम तुम्हारी बातें
और उनके छेड़ने पर
मैं शरमा जाती हूँ…..

बोलने लगती हूँ
‘हिपटुल्ला’…..
जब खुश होती हूँ
आख़िरकार तुम्हारी कलम ने
जन्मा जो है उसे…..

खींच लाती हूँ
तुमको तुम्हारी कब्र से…..
तुम बड़बड़ाते हो…..
”चैन से रहने नहीं देती”
और मैं रीझती हूँ
तुम्हारे बड़बड़ाने पर…..
पर उतना ही यकीं है
तुम्हारी बेचैनी पर…..
जो पा जाती है सुकून
मेरे साथ होने पर…..

बढ़ जाते हैं
सिगरेट के कुछ कश
और कुछ घूँट गिलास के…..
मैं थाम लेती हूँ
तुम्हारा ठंडा, दुबला हाथ…..
जिसकी उँगलियाँ
भिंच जाती हैं
मेरी उँगलियों में कस…..
बस यही है तेरा-मेरा साथ
तेरा मुझमें होने तक….

– अनीता सिंह

मंटो मेरा दोस्त मेरा दुश्मन

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