धर्म आचरण का विषय है, पूजा-पद्धतियों तक सीमित नहीं

धर्म आचरण का विषय है. अक्सर इसे पूजा-पद्धतियों तक सीमित मान लिया जाता है. इसकी एक और परिभाषा जीवन पद्धति होने की दी जाती है. सनातन के विषय में अक्सर लोग आपको सुप्रीम कोर्ट के इस टिप्पणी का हवाला देते हुए दिख जाएंगे. बाकी ‘धारयति इति धर्मः’ वाली परिभाषा भी आपने सुन ही रखी होगी. ‘धर्म अफीम है’ वाली आधी-अधूरी बात भी आपको बताई गई होगी.

मेरा मानना है कि धर्म जीवन पद्धति भर नहीं है. ये उससे भी गहरे अस्तित्व-मात्र से जुड़ा हुआ है. ये अनन्त यात्रा का प्रमाण है, निर्धारक है.

आस्था व श्रद्धा धर्म के छोटे अंश मात्र हैं. इसलिए जो सम्प्रदाय इन्हीं तक सीमित हैं वो धर्म नहीं कहे जा सकते. वो धर्म के अंश भी नहीं कहे जा सकते क्योंकि उनकी अपनी सीमाएं हैं, समस्याएं हैं.

धर्म विस्तृत दर्शन है, इसलिए सर्वव्यापक है. जबकि आस्था नितांत ही व्यक्ति के निजी जीवन का विषय है. किसी की आस्था में समाज की रुचि नहीं होनी चाहिए. रेस्टोरेंट के टेबल, सिनेमा हॉल के अलावा मंदिर जाने के तस्वीरों को शेयर करते हुए लोग भी मुझे इसीलिए पसंद नहीं आते.

आस्था-पूजा जैसे तमाम माध्यम उस परम-सत्ता से जुड़ने के लिए होते हैं. ये आप किस तरह करते हैं उससे आपके साक्षात्कार का स्तर तय होता है. श्रीमद्भगवद्गीता में उसे प्राप्त करने के तीन आधार बताए गए हैं.

भक्तियोग, ज्ञानयोग व कर्मयोग. श्रीमद्भागवत महापुराण में इन तीन मार्गों की विस्तृत व्याख्या है. ध्यान रहे मैंने ‘उसे प्राप्त करना लिखा’ है. भगवान, ईश्वर जैसा कोई शब्द प्रयोग नही किया है, इसलिए समस्या नहीं होनी चाहिए. उसे का आशय उस परम सत्ता से है, जो इस तमाम संसार का संचालन करता है, साकार-निराकार आपको तय करना है. क्योंकि हर रूप में वो एक है. ये आपके ऊपर है कि आप उसका साक्षात्कार किस रूप में करते हैं, क्योंकि वो तो आपके भीतर भी है, मेरे भी. ईश्वर उसी सत्ता का प्रतीक है.

भक्ति योग में ही प्रेम मार्ग भी है. प्रेम शुद्ध चित्त की परम अवस्था है. जहाँ स्वार्थ खत्म हो जाता है. प्रेम में आप किसे किस भाव से देखेंगे ये भी तय करना होता है. मैं उस परम-सत्ता को मित्र रूप में देखता हूँ. इसलिए उसके सामने मैं कभी कोई मांग नही रखता. मंदिर जाने पर बस ध्यान लगाने की, संवाद की कोशिश करता हूँ, बाकी सब तो उसे पता ही है. मेरा अच्छा-बुरा उससे बेहतर कौन जानेगा भला.

प्रेम मार्ग में एक सहजता है. ये सुसाध्य तो है ही, आपको संसार में यश भी दिलाता है. फिर उसे प्राप्त करना ही तो जीवन का लक्ष्य भी है ना! आप जब इस मार्ग से चलेंगे तो सबसे प्रेम करेंगे. हाँ, सबके प्रति भाव अलग होगा. कोई सखा, कोई माता, कोई बहन, कोई पिता, तो कोई प्रेयसी होगी. जो आपका कुछ नहीं है उसे भी आप इंसान स्वरूप में प्रेम करेंगे, प्रेम हर जगह होगा. जरा कल्पना करिए ऐसी दुनिया कैसी होगी!

ये चीजें आपको किसी एक दर्शन से प्रभावित लग सकती हैं. ऐसे में आस्तिकता को परे रखकर स्थूल रूप में इसकी कितनी प्रमाणिकता होगी?

पीयूष मिश्रा का नाम आपने सुना होगा. अपनी बातों से ईश्वर में विश्वास न करने वाले लगते हैं. उनकी एक वीडियो है यूट्यूब पर, उसमें उन्होंने ऐसी ही चीजें समझाई हैं. किसी ने उनकी कविता को अश्लील कह दिया था. उन्होंने अपने कविता का अर्थ बताया है. जरा खोजने की कोशिश करिएगा. उन्होंने बताया है कि कविता कैसे परम आनन्द के प्राप्ति को ही जीवन का उद्देश्य मानती है. बाकी जिसकी जैसी सोच होगी, चीजों के प्रति उसका नजरिया भी वैसा ही होगा न?

अभी हाल में एक राज्य के मुख्यमंत्री का बयान आया था सड़क पर होने वाले नमाजों के सम्बंध में. मैं मानता हूं कि आस्था निजी विषय है. बाकी नमाज के चलते होने वाली असुविधा को आप सबने देखा होगा. हमारी आदत है बाइनरी बनाने की. एक के सामने दूसरे को खड़े कर देने की. ऐसे अन्य भी उदाहरण है. मसलन कांवरियों का ही. लेकिन एक के आड़ में दूसरे का बचाव तो नहीं किया जा सकता है न.

फिर यहाँ पहली समस्या तो कहीं अधिक व्यापक है. विकल्पों को इज-इक्वल-टू के आड़ में खारिज नहीं कर दिया जाना चाहिए. समस्याएं अलग है तो समाधान भी जाहिर है, अलग होंगे. पहले शुरुआत तो हो! आखिर धर्म हमें प्रेम और सह-अस्तित्व ही तो सिखाता है. जो न सिखाए, उस धर्म की क्या आवश्यकता?

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