आप तैयार : गठबंधन मर गया!

बीते दिनों कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी ने कहा कि वह 2019 में भारत के प्रधानमंत्री बनने के लिए तैयार हैं.

2004 के आम चुनावों में तत्कालीन कांग्रेस अध्यक्षा सोनिया जी के पीएम पद से महान त्याग और यूपीए-दो के समय श्री राहुल जी द्वारा प्रधानमंत्री पद को अस्वीकार्य करने की भारतीय राजनीतिक की दो राजवंशीय महान घटनाओं के बाद तीसरी बड़ी घटना है.

जिस देश ने आज़ादी के बाद से ही लोकतांत्रिक राजवंश की गुलामियत देखी हो, जिस देश ने घरानों में पैदा लेते ही देश के भावी प्रधानमंत्री के नाम तय हो जाने का लोकतंत्रीय कलंक झेला हो… वहां राजवंश के सामंत का चिल्ला कर पद मांगना ही शायद भारतीय लोकतंत्र के अच्छे दिन हैं.

पिछले दो दशक से राहुल गांधी ने कांग्रेस पार्टी में अपने परोक्ष और अपरोक्ष नेतृत्व में चुनावी असफलताओं का एक इतिहास रचा है. देश लगातार उन्हें लेकर कांग्रेस पार्टी के प्रयोगों को देखता और नकारता आया है. ऐसे में कांग्रेस अध्यक्ष ने 2019 की चुनावी तैयारियों को एक बार फिर खुद ही पलीता लगाने का काम कर दिया है.

जब राहुल गांधी खुद के प्रधानमंत्री बनने की तैयारी की बड़ी बात कहते हैं… तो उसी के साथ उनका यह कहना कि.. ‘यदि यूपीए (कांग्रेस) बड़ी पार्टी बनके आती है तो’… यह साबित करता है कि श्री राहुल को 2019 में यूपीए (कांग्रेस) की अकेली वापसी का दूर-दूर तक भरोसा नहीं है.

उनका यह कहना साथ ही इस बात की भी पुष्टि करता है कि… कांग्रेस सहित शेष विपक्ष यदि अपने ‘भाजपा हराओ एजेंडे’ के तहत 2019 की कोई बात सोच भी रहा है… तो ऐसा एक तथाकथित काल्पनिक महा गठबंधन के आकार लेने पर ही निर्भर करेगा.

ऐसे में कांग्रेस अध्यक्ष ने खुद को पीएम पद का दावेदार घोषित कर 2019 के चुनाव से पहले विपक्ष के किसी गठबंधन की संभावना को कमजोर ही नहीं बल्कि समाप्त करने का काम किया है. राहुल के इस बयान ने 2019 में कांग्रेसी सदारत में किसी गठबंघन की संभावनाओं को खत्म कर दिया है.

तीसरे-चौथे-पांचवें अवसरवादी मोर्चों के लिजलिजे, निराशावादी और असफल दौर को यह देश बखूबी देख चुका है. सत्ता के लिए कभी साथ आये क्षेत्रीय क्षत्रपों ने कैसे-कैसे रीढ़विहीन नेतृत्व दिये देश को. देश की समस्याओं, जनता के हितों को लेकर संघर्ष करने के तेवर की जगह… अपनी सत्ता, अपना पद बचाने के संघर्षों की एक लंबी श्रृंखला झेल चुका है देश.

ऐसे में यह विश्वास करना कोई मुश्किल और कठिन नहीं कि 2019 में मौजूदा केंद्र सरकार के खिलाफ अगर कोई हटाओ-हटाओ का अभियान खड़ा हो भी सकता था… तो वह सत्ता के अवसरवादियों का एक बेमेल और दर्जनों चेहरे वाले भानुमती के कुनबे जैसा ही कुछ हो सकता था.

जहां दौड़ा दौड़ा कौन दौड़ा… देवगौड़ा-देवगौड़ा के चमत्कारिक फार्मूलों से नेतृत्व मिलने का इतिहास हो. खरीद-फ़रोख़्त से लेकर मंत्रालय, मंत्री पद अपहरण की संस्कृति रही हो : वहां किसी काल्पनिक संभावना में भी… प्रधानमंत्री पद को अपने नाम हड़पने की राहुल गांधी जी की घोषणा ने 2019 में कांग्रेसी नेतृत्व में किसी संभावित गठबंधन के विचार की जन्म से पहले ही मारने की हरकत कर के अपने चुनावी कैरियर की असफलताओं में 2019 का नाम भी दर्ज करवाने की तैयारी का आगाज़ कर दिया है.

संभवतः राहुल जी यह बहुत बेहतर ढंग से जानते हैं कि उन्हें और उनकी राजनीति को देश गंभीरता से नहीं लेता.

यह तो अभी देखना होगा कि शेष विपक्ष राहुल जी और कांग्रेस के इस तैयारी पर कैसी प्रतिक्रियाएं देता है जो देर-सबेर मुखर होंगी ही.

रही बात कांग्रेसी सत्ताओं के साथ लिव इन रिलेशनशिप में रहते आये वामदलों की… तो उनसे कांग्रेस के सत्ताई छायावाद की किसी आसमानी आस में… कांग्रेस समर्थन के नाम के सिंदूर से सजे रहने के अलावा कोई उम्मीद की भी नहीं जानी चाहिए. भारतीय लोकतंत्र के निर्वाचन इतिहास में उनकी बिसात उन्हें इसके लिए मजबूर भी करती है.

लेकिन इस सबके बीच भारतीय जनता पार्टी, एनडीए और उसके समर्थकों को 2019 में संभावित किसी गठबंधन के आकार लेने से पहले ही उसे मिटाने की पहल करते… राहुल जी की इस राष्ट्र-सेवा पर उन्हें धन्यवाद जरूर देना चाहिए.

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