बोली… बहत्तर छेद वाली छलनी भी बोली

कर्नाटक विधानसभा चुनाव में कांग्रेस के ‘मोदी पर आरोप लगाओ अभियान’ में पूर्व प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह भी शामिल हुए.

मनमोहन सिंह ने बाकायदा प्रेस कॉन्फ्रेंस कर के राग अलापा कि मोदी सरकार ने देश की अर्थव्यवस्था का सत्यानाश कर दिया है.

उन्होंने कहा, देश की अर्थव्यवस्था पूरी तरह ध्वस्त हो चुकी है. देश भयानक आर्थिक अराजकता के दौर से गुजर रहा है.

मनमोहन सिंह के उपरोक्त आरोप कितने सच्चे कितने झूठे हैं? यह जानने के लिए केवल कुछ तथ्य.

वित्तीय वर्ष 2013-14 में देश को 4.5% राजकोषीय घाटे की जो सौगात सौंपकर मनमोहन सिंह सत्ता से विदा हुए थे.

उस राजकोषीय घाटे को वित्तीय वर्ष 2017-18 में मोदी सरकार ने घटा कर 3.3% तक पहुंचा दिया है.

मार्च 2004 में अटल सरकार से विरासत में मिले 105 अरब डॉलर के जिस विदेशी मुद्रा कोष में अपने 10 वर्ष के कार्यकाल में 199 अरब डॉलर की वृद्धि कर मई 2014 में सत्ता से अपनी विदाई के समय मनमोहन सिंह 304.2 अरब डॉलर का जो विदेशी मुद्रा भंडार मोदी सरकार को सौंप गए थे उस विदेशी मुद्रा भंडार में पिछले केवल 4 वर्ष के मोदी सरकार के कार्यकाल में 122 अरब डॉलर की वृद्धि हुई और वह बढ़कर 426 अरब डॉलर हो चुका है.

यह करिश्मा ऐसे ही नहीं हुआ है.

ज्ञात रहे कि अटल सरकार के कार्यकाल के अंतिम पूर्ण वर्ष 2003 में कुल आयात निर्यात 109.9 अरब डॉलर का हुआ था जिसमें भारत का व्यापार घाटा 13.30 अरब डॉलर का था.

प्रधानमंत्री के रूप में प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह के प्रथम कार्यकाल के पांचवे पूर्ण वर्ष 2008 में कुल आयात निर्यात 481.90 अरब डॉलर का हुआ था जिसमें भारत का व्यापार घाटा 129.10 अरब डॉलर का था.

अर्थात बहुप्रचारित महान अर्थशास्त्री मनमोहन सिंह के 5 वर्ष के प्रथम कार्यकाल में देश के आयात निर्यात में 4.3 गुना की वृद्धि हुई थी लेकिन व्यापार घाटे में लगभग 9.70 गुना वृद्धि हुई थी.

मनमोहन सिंह के कार्यकाल के दसवें और अंतिम पूर्ण वर्ष 2013 में भारत का आयात निर्यात 780.7 अरब डॉलर का हुआ था जिसमें भारत का व्यापार घाटा 154.30 अरब डॉलर का था.

अर्थात भारत के महान अर्थशास्त्री प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह के दस वर्ष के कार्यकाल में भारत के आयात निर्यात व्यापार में लगभग 7 गुना वृद्धि हुई थी लेकिन व्यापार घाटे में लगभग 11 गुना वृद्धि हुई थी.

जबकि मई 2014 में देश की सत्ता एक चायवाले प्रधानमंत्री के सम्भालने के बाद उसके लगातार 4 वर्षों के कार्यकाल के दौरान देश का आयात निर्यात व्यापार 2014 में 781.1 और व्यापार घाटा 144 अरब डॉलर था.

2015 में आयात निर्यात व्यापार 758.2 अरब डॉलर और व्यापार घाटा 137.6 अरब डॉलर था. 2016 में आयात निर्यात व्यापार 643.3 अरब डॉलर और व्यापार घाटा 118.7 अरब डॉलर था.

2017 में आयात निर्यात व्यापार 660.1 अरब डॉलर तथा व्यापार घाटा 108.5 अरब डॉलर था.

यह फर्क है अर्थशास्त्री प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह और चायवाले प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी में कि देश के निर्यात बिल में 11.9% की कमी को, आयात बिल में लगभग 17.8% की कमी कर मोदी सरकार ने देश का जो व्यापार घाटा 2013 में 154.3 अरब डॉलर था उसे केवल साढ़े तीन वर्ष में घटाकर 108.5 डॉलर कर दिया है.

यानि लगभग 45.8 अरब डॉलर की बचत.

उल्लेखनीय यह है कि आयात बिल में लगभग 84 अरब डॉलर की कटौती के बावजूद देश में किसी वस्तु की कोई कमी अनुभव नहीं की गई है. अर्थात 84 अरब डॉलर की जो वस्तुएं आयात की जा रहीं थीं वो या तो गैर जरूरी थीं या फिर उन वस्तुओं में देश आत्मनिर्भर हुआ है.

[आयात-निर्यात व व्यापार घाटे के आंकड़ों की पुष्टि इस लिंक पर की जा सकती है – Foreign trade of India]

इसीलिए मनमोहन सिंह को जब मोदी सरकार की आर्थिक नीतियों के खिलाफ गरजते बरसते आगबबूला होते हुए और देश की अर्थव्यवस्था पर विधवा विलाप करते हुए देखा तो वह कहावत याद आ गयी कि… ‘सूप बोले तो बोले, पर छलनी क्या बोले जिसमें बहत्तर छेद’.

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