भले सुअर खाता हो, शराब पीता हो, पर हिन्दुओं का हन्ता है तो सब माफ़ है

मुसलमान भाई लोगों की ख़ास बात है कि वो हर उस चीज़ का स्वागत करते हैं जो उनके हिसाब से है.

हर उस चीज़ का विरोध हद तक करते हैं जो उनके हिसाब से ख़राब हो… भले ही वो किसी और के हिसाब से कितनी भी गलत-सही हो.

आसान भाषा में… मीठा मीठा गप गप और कड़वा कड़वा थू थू के साथ दूसरे के मीठे में कड़वा डाल…

वो उस जिन्नाह के समर्थन में नहीं हैं जिसकी फोटो सूट बूट में दिखती है… वो उस जिन्नाह के समर्थन में हैं जिसकी फोटो अचकन और मुसलमानी टोपी में है.

अभी आप सोचेंगे की फोटो से क्या फर्क पड़ता है… फर्क पड़ता है… खूब फर्क पड़ता है…

सूट बूट फोटो वाला जिन्नाह जिसको सुअर का मांस पसंद था और पोर्क खाना बचपन से ही शौक रहा हो, जिसका पहनावा पूरी तरह से विलायती हो – न कि शेरवानी और बड़े भाई का पजामा हो, जिसको दारू पसंद हो…

मतलब कि वो हर गैर इस्लामिक काम को करता हो… ये वाला जिन्नाह भारत की आज़ादी के लिए कांग्रेस का सदस्य बना था… ये जिन्नाह क्रांतिकारियों का केस लड़ता था…

ये वाला जिन्नाह जब भारत आया तो वो पहले कांग्रेस का ही प्रमुख नेता था… उसने अलग अलग मंचों पर भारत की आज़ादी, उस समय हिन्दू-मुसलमान एकता आदि के बारे में बात की.

1913 में वो मुस्लिम लीग में शामिल हुआ और प्रमुख नेता रहते हुए उसने 1916 दिसम्बर में कॉग्रेस तथा मुस्लिम लीग के बीच लखनऊ का समझौता कराया… ये समझौता सबको मान्य था और इस समझौते के अंतर्गत अगले चुनाव होने थे, जिससे कांग्रेस को मुस्लिम लीग का साथ मिलता और साझा सरकार बनती…

आगे के चुनावों में मुस्लिम लीग के समर्थन से कांग्रेस को बहुत फायदा हुआ और उसने इतनी सीट जीत लीं कि उसने लीग को किनारे करना चालू कर दिया… उसको मुस्लिम लीग की ज़रूरत ही नहीं पड़ी किसी भी प्रोविंस में सरकार बनाने में…

अतः कांग्रेस ने मुस्लिम लीग को सरकार से बाहर का रास्ता दिखा दिया… इस कारण लखनऊ समझौते से जिन्नाह का मोह भंग हो गया.

जिन्ना भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस का समर्थक था, परन्तु उसने गांधी के असहयोग आंदोलन का तीव्र विरोध किया और उसने इसी को कांग्रेस से अलग होने का आधार बनाया.

लखनऊ समझौते को कांग्रेस द्वारा फेल कराने के बाद जिन्नाह ने लखनऊ में ही अंग्रेजी लिबास उतारकर शेरवानी और मुसलमानी टोपी पहनी थी… अंग्रेजी लिबास उतारकर शेरवानी और मुसलमानी टोपी पहनने वाले जिन्नाह ने उसी लखनऊ में कहा कि हिंदुस्तान में मुसलमानों को प्रतिनिधित्व कभी नहीं मिलेगा…

सो वह एक नए राष्ट्र पाकिस्तान की स्थापना का प्रचारक बन गया… उसका कहना था कि अंग्रेज़ लोग जब भी सत्ता का हस्तांतरण करें, उन्हें उसे हिन्दुओं के हाथ में न सौंपें, हालाँकि वह बहुमत में हैं… ऐसा करने से भारतीय मुसलमानों को हिन्दुओं की अधीनता में रहना पड़ेगा…

जिन्नाह अब भारतीयों की स्वतंत्रता के अधिकार के बजाए मुसलमानों के अधिकारों पर अधिक ज़ोर देने लगा… जिन्नाह को अंग्रेज़ों का कूटनीतिक समर्थन मिलता रहा और इसके फलस्वरूप वो भारतीय मुसलमानों के नेता के रूप में देश की राजनीति में उभरा…

मोहम्मद अली जिन्नाह ने मुस्लिम लीग का पुनर्गठन किया और ‘क़ायद ए आज़म’ (महान नेता) का खिताब मिला… साल 1940 में उसने धार्मिक आधार पर भारत के विभाजन तथा मुस्लिम बहुसंख्यक प्रान्तों को मिलाकर पाकिस्तान बनाने की मांग की… इस वजह से 1947 में भारत का विभाजन और पाकिस्तान की स्थापना हुई.

AMU में उसी शेरवानी और मुसलमानी टोपी पहने जिन्नाह पर बवाल है… उस जिन्नाह की तस्वीर पर हल्ला है जिसने भारत के विभाजन को सफलतापूर्वक अंजाम दिया…

वही जिन्नाह जिसने खिलाफत आंदोलन का समर्थन किया… वो जिन्नाह जिसने गाँधी के असहयोग आंदोलन को बेकार साबित किया…

वो जिन्नाह जिसने मोपला विद्रोह, जिसमें लाखों हिन्दू बेघर हुए और हज़ारों काट डाले गए, का समर्थन किया… वो जिन्नाह जो direct action day का असल director था …

मुसलमान सूट बूट वाले जिन्नाह को भूल चूका है… ऐसी तस्वीर पर वो थूकता भी नहीं लेकिन वो शेरवानी और मुसलमानी टोपी वाली तस्वीर को चाटता है…

वो 1919 के पहले वाले जिन्नाह पर थूकता है लेकिन 1920 से शुरू होने वाले जिन्नाह को पाक मानता है, भले ही वो कितना भी सुअर खाता हो, शराब पीता हो… बस वो हिन्दुओं का हन्ता हो, बाकी सब माफ़ है…

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