शास्त्रीजी की देशभक्ति, तपस्या और ईमानदारी ही उनके परिवार की धरोहर है

फेसबुक पर एक प्रश्न के उत्तर में मेरे द्वारा प्रस्तुत आलेख, जिसमें सत्तर रुपयों में एक डॉलर क्यों मंहगा आता है, रुपया कमजोर क्यों है? अमेरिकन डॉलर इतना मजबूत क्यों है? के तर्क वितर्कों का मसला ऐसा जूझा कि थोड़ी देर के लिए मुझे लगने लगा चुनाव कर्नाटक में नहीं मेरी फेसबुक की प्रस्तुति पर होने जा रहे हैं.

भाजपा समर्थक और कांग्रेस समर्थकों में जमकर ‘लेखन-पाही’ होने लगी. यद्यपि मैं तो राजनीति के मामले में “समदर्शी” हूं, पर विज्ञान में फार्मूले में कीमतें रखने के बाद नतीजा सही आए या गलत यह इस बात पर निर्भर करता है कि एक तो फार्मूला सही है या नहीं?

दूसरे प्रयोग करते समय आपने रीडिंग सही ली है अथवा नहीं? इस कारण जो गणना के बाद रिजल्ट आया वह मैंने प्रस्तुत कर दिया था. अब फार्मूला और रीडिंग सही है या गलत, यह हमको सोचना विचारना है.

कुछ मित्रों ने राजनीति के दलदल में अपनी मर्जी के पत्थर साधकर मुझ पर ही कीचड़ उछालने की कोशिश की. उनका मैं हृदय से आभारी हूं, क्योंकि उन्होंने अपने मायावी जल के दर्पण में नारद को विष्णु रूप का चेहरा न देकर, बन्दर का मुख दिखाने का प्रयास तो किया पर जिस तरह नारद मुनि ने नाराज होकर स्वंय विष्णु को श्राप देने को विवश कर दिया, उस प्रकार, मैं श्राप के स्थान पर उनके कीचड़ को सहृदय स्वीकार करके; उनके प्रति अनुग्रह प्रगट करता हूं कि उनके कीचड ने मुझे चाहने वाले मित्रों और शिष्यों को उत्प्रेरित कर दिया और अनेक हाथ आगे आ गए.

उस कीचड़ को मुझ पर लगने के पहले ही रोकने के लिये, मैं अपने ऐसे सभी मित्रों शिष्यों का भी आभारी हूं और ईश्वर से प्रार्थना करता हूं कि मेरी लेखनी में निस्वार्थ ऐसी ही शक्ति बनी रहे जो बिना किसी लाग लपेट के दूध का दूध और पानी का पानी करती रहे.

ऐसे ही मेरे परमप्रिय छात्र और कट्टर कांग्रेसी कार्यकर्ता कमल रघुबंशी ने कुछ इस प्रकार विचार रखे :-

“लाल बहादुर शास्त्री, संजय गांधी, पायलट सिंधिया की मौत के पीछे कोई है तो वह हैं कुछ संगठनों की गंदी सोच जो देश में सत्ता प्राप्ति की कोशिश कर रहे थे. और ऐसी अफवाहें फैला रहे थे. बाकी जो हकीकत है वह देश को पता है. आज भी अनिल शास्त्री, ज्योतिरादित्य सिंधिया, सचिन पायलट कांग्रेसी हैं यही प्रमाण है हां मेनका गांधी जरुर कांग्रेस से बाहर है यह उनका निर्णय है जो परिवारिक समस्या है और देश के 90%परिवारो की है”………..(श्री कमल रघुबंशी)

प्रिय रघुबंशी के चिंतन से मुझे एक सच्ची घटना याद आ गई वह इस प्रकार से है :-

अनिल शास्त्री जी आपात काल के बाद के समय पर इन्दौर के साकेत में निवास करते थे. वह ‘वोल्टाज’ कम्पनी में अधिकारी थे. एक दिन सामाजिक कार्य से में उनसे मिलने बड़े सबेरे जा धमका.

मैं उनके निवास पर उनके साथ चाय पी रहा था. तभी वहां टेबल पर पड़ी नईदुनिया में उस समय प्रकाशित “कतरनें “ नामक स्तम्भ पर मेरी नज़र पड़ी. किसी पत्रकार ने संजय गांधी से पूछा ‘और भी प्रधानमंत्री के बेटे थे, वह क्यों राजनीति में नहीं आए, आप कैसे आ गये?’

संजय गांधी ने दो टूक जबाव दिया “और प्रधानमंत्री के बेटे योग्य नहीं होंगे, ( यानि संजय गांधी काबिल थे, दूसरे काबिल नहीं थे इसलिये वह राजनीति में आ गये). मुझसे रहा नहीं गया, पूछ लिया अनिल जी आपको इस मुद्दे पर क्या कहना है?

पहले तो अनिल जी सकुचाए पर मेरे बार बार आग्रह करने पर बोले “दूसरे प्रधानमंत्री के बेटे प्रधानमंत्री के बेटे नहीं थे, वह अपने बाप के बेटे थे”.

मेरे यह कहने पर कि हर कोई अपने बाप का बेटा होता है, इसमें क्या नई बात हुई. अनिल जी ने मुस्कराते हुए किस्सा सुनाया. वह जब छोटे थे, प्रधानमंत्री निवास में रहते थे. एक दिन स्कूल जाने में देर हो गई थी. नाश्ता किये बिना स्कूल जाने लगे.

उनकी माता ललिता जी ने कहा पराठे तैयार हैं. ड्राइवर कार से स्कूल छोड़ आएगा. नाश्ता करके स्कूल जाओ. अनिल जी नाश्ता करने बैठ गए. ड्रायवर ने कार निकालकर पोर्च में लगा दी.

इस बीच शास्रीजी किसी मिलने वाले को बाहर तक छोड़ने निकले. ड्राइवर से पूछा “मुझे तो अभी बाहर जाना नहीं है. गाडी पोर्च में क्यों लगाई है.”

ड्राइवर ने सलाम ठोकते हुए बोला “बाबा साहेब को देर हो गई है, उन्हें स्कूल छोड़ने जाना है.”

इतना सुनते ही शास्त्री जी नाराज हो गए बोले – “यह सरकारी गाड़ी है, यह कोई बाबा साहेब के बाप की नहीं है. देर हो गई है तो क्या, जाओ उनसे कहो साईकिल से ही स्कूल जाए”. और तत्काल गाड़ी को पोर्च से निकालकर गैराज में रखने का हुक्म शास्त्री जी ने ड्राइवर को दे दिया.

अनिल जी ने लम्बी गहरी सांस लेकर धीरे से बुदबुदाया, “दूसरे प्रधानमंत्री के बेटे ‘प्रधानमंत्री’ के बेटे नहीं थे, वह अपने बाप के बेटे थे”.

उस दिन का वाक्या अनिल जी की आँखों की किनोर में गीली चमक, पिता के प्रति पवित्र स्नेह और अद्भुत महानता का एहसास मुझे आज भी हो रहा है. मेरा अपना विचार है अनिल जी एक सच्चे कार्यकर्ता के रूप में आज भी अगर कांग्रेस में हैं तो वह किसी वंशपरम्परा की अंधी भक्ति के कारण नहीं हैं.

वह अपने पूज्य पिताश्री के पदचिन्हों का अनुसरण करके, महान देशभक्त पिता को श्रद्धांजलि देने के रूप में काम कर रहे हैं. अन्यथा वह कांग्रेस सरकार के इतने लम्बे कार्यकल में किसी न किसी ऊंचे पद, उप राष्ट्रपति न सही कम से कम किसी राज्य के ‘राज्यपाल’ सहजता से बन सकते थे.

राजनीति में ऐसी अनोखी, विरली “वंश परम्परा” का पालन करने वाले “लाल बहादुर शास्त्री जी” के परिवार को मैं नमन करता हूं.

Comments

comments

loading...

LEAVE A REPLY