‘जय’ से कम कुछ भी हुआ तो भारत और हिन्दुओं को दोबारा नहीं मिलेगा कोई अवसर

एक प्रश्न जो अरसे से मुझे कचोट रहा है कि क्या हम राष्ट्रवादी, आपस में ही शंका, सन्देह और श्रेष्ठ होने की मानवीय दुर्बलता से घिर कर, अपने शत्रुओं द्वारा फिर लटका दिये जायेंगे?

क्या हम अपने इतिहास से कुछ भी नही सीखेंगे? क्या हम अपने लक्ष्य को जानते हुये भी, हताशा में अपने धनुष बाण रख देंगे?

हमें आज, भारत के भविष्य के लिये, 1930-31 के इतिहास से सीखना ही होगा. हमको अपनी अपनी समस्याओं की जीतना ही होगा.

लोग अपने अपने दृष्टिकोण और अपने अपने लक्ष्य से बंधे हुये, हम लोगों में, सन्देह और टूटन के बीज बोयेंगे ही और हमें इन सब सभी बीजो को नष्ट करना होगा.

यही वह बीज थे जिसने भगत सिंह, सुखदेव और राजगुरु को फांसी पर चढ़वा दिया था और भारत में हिंदुस्तान सोशलिस्ट रिपब्लिक आर्मी (HSRA) जो बाद में हिंदुस्तान सोशलिस्ट रिपब्लिकन एसोसिएशन बनी थी, को खत्म कर दिया था. और उसी के साथ हम फिर ऐसी गुलामी में बंध गये जिससे आज तक हम मुक्त नहीं हो पाये हैं.

भगत सिंह, राजगुरु और सुखदेव को अंग्रेज़ों ने भले ही फांसी पर चढ़ाया था लेकिन उनको फांसी के फंदे पर पहुचाने वाले उसी HSRA के क्रांतिकारी ही थे, जो अपने अपने कारणों से टूट गये और अंग्रेज़ों के सरकारी गवाह बन गये थे.

यह जो सरकारी गवाह बने थे, वे सब राष्ट्र भक्त ही थे लेकिन शत्रुओं की चालों में फंस कर अपने अपने हालात से समझौता कर बैठे थे.

सबसे पहले जय गोपाल सरकारी गवाह बना था क्योंकि उसी की निशानदेही पर भगत सिंह ने सान्डर्स को स्कॉट समझ कर गोली मारी थी. जय गोपाल उस हत्या में पूरी तरह शामिल था और उसको मृत्युदण्ड मिलना भी तय था.

इसी बात का फायदा अजीज़ अहमद जो इस केस के इंचार्ज थे और सरदार गोपा सिंह, जो डिप्टी सुपरिन्टेन्डेन्ट थे, ने उठाया था. उन्होंने जय गोपाल के पिता और उसकी पत्नी से सम्पर्क किया और मृत्यु दंड मिलने की बात कही.

उसी के साथ यह भी कहा कि यदि वे जय गोपाल को सरकारी गवाह बनने को तैयार कर लेंगे तो माफी के साथ इनाम भी दिया जायेगा.

उसके बाद जय गोपाल के माता पिता उसकी पत्नी को लेकर जेल में मिलने गये और जय गोपाल अपनी नव विवाहिता पत्नी के आंसू में बह गये और भगत सिंह, सुखदेव व राजगुरु को फांसी की तरफ धकेल दिया.

इसी के साथ हंसराज वोहरा टूटे. पुलिस ने उनको एक फ़र्ज़ी दस्तावेज़ दिखाया कि सुखदेव टूट चुके है और उन्होंने HSRA के सारे राज खोल दिये है. वोहरा ने उनको सच मान लिया और अपने ही गुरु सुखदेव के खिलाफ सरकारी गवाह बन गये.

लेकिन मुश्किल यह थी कि वोहरा को ज्यादा कुछ पता नहीं था, इस लिये उसने फणीन्द्र घोष, जो एक और बड़े क्रांतिकारी थे, के साथ मनगढ़ंत कहानी गढ़ी और भगत सिंह, सुखदेव व राजगुरु की फांसी की सज़ा पर मोहर लगा दी.

वोहरा को इस सेवा के लिये इंग्लैंड में पढ़ने का वजीफा मिला और वह पत्रकार बन गये. उसकी मृत्यु शायद 1985 में वाशिंगटन हुयी थी. फणीन्द्र घोष को 50 एकड़ जमीन और 20 हज़ार इनाम मिला था और बाद में एक नवजवान क्रांतिकारी बैकुंठ शुक्ल ने उसकी हत्या कर दी थी.

मुझे आज इस 86-87 वर्ष पूर्व हुयी दु:ख भरी घटना इस लिये याद आयी है क्योंकि जिस तरह से सम्मानीय राष्ट्रवादियों को लेकर अमर्यादित बाज़ार बनाया जा रहा है, उससे राष्ट्रवाद मज़बूत नहीं कमज़ोर होगा.

हमें आज जोड़ना है, तोड़ना नहीं है. हमारे शत्रु तो यही चाहते हैं कि हम अपने लक्ष्यों से भटक कर अपनी ऊर्जा विघटन में लगायें. आज यह साफ दिख रहा है कि अंजान चेहरे और कुछ जाने पहचाने चेहरे हमारी ही कमज़ोरियों पर चढ़ कर दरार को बढ़ाने में लगे हैं.

मेरे लिये जिन व्यक्तित्वों का राष्ट्र व हिंदुत्व के प्रति समर्पण उच्चतम शिखर पर हो, उन पर लोगों का कीचड़ उछालना सर्वदा निंदनीय है. आज के बाद से, किसी भी कारण से यदि कोई भी राष्ट्रवादी, इस तरह के किसी प्रपंच में पड़ता दिखाई देता है तो आप यह समझ लीजियेगा कि वह हमारे ही बीच का जय गोपाल, हंसराज वोहरा और फणीन्द्र घोष है.

हम लोगों को भगत सिंह, सुखदेव और राजगुरु को फिर से फांसी पर नहीं लटकने देना है. यह जो लोगों में नकारात्मकता और बौद्धिक चिंतन में हिंदुत्व के एजेंडे को लेकर हताशा आयी है, उसको रोक कर, हम लोगों को अगले युद्ध की तरफ बढ़ना है.

देश मे जो यह विचारधारा श्रेष्ठ या राजनैतिक सत्ता को लेकर जो बौद्धिक संकट खड़ा हुआ है और जो उस पर शास्त्रार्थ हो रहा है, वह अब विराम मांगता है. हमारे लिये यह 2019 की जीत कोई लक्ष्य नहीं है बल्कि यह विचारधारा की संप्रभुता के लिये एक राजनैतिक इकाई के होने की आवश्यकता है.

सत्ता और उस पर बैठने वालों की हम फिर एक वर्ष बाद भी आलोचना कर सकते हैं लेकिन यह अवश्य याद रहे कि 2019 हमारे लक्ष्य के रास्ते मे पड़ने वाली वह वैतरणी है जिसको पार किये बिना हम भारत को नया जीवन, नई धारा नहीं दे सकते हैं.

आइये हम सब हाथ मिलाये और इस युद्ध में अपनी पूरी शक्ति व पूरे आत्मविश्वास को समेट कर, ‘जय’ का उदघोष लगाते हुये कूद पड़ें.

आज जय ही लक्ष्य है, जय ही जीवन है, जय ही भारत है, जय ही हिंदुत्व है, जय ही संकल्प है और यह जय ही हमारी आने वाली पीढ़ियों के लिये हमारे द्वारा संजोयी विरासत है.

अंत में मैं सिर्फ यही कहूंगा कि यदि आज जय से कम, कुछ भी हुआ तो यह समझ लीजियेगा कि भारत और उसके हिन्दू को दोबारा कोई अवसर नहीं मिलेगा.

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