मैं देवी हो जाती हूँ तुमसे गुज़र के

तुम कहो या न कहो
मानो या न मानो
जानते तो तुम भी हो, मेरे शिव
तुम अधूरे हो मुझ बिन

तटस्थ, शांत, सरल
समाधि में तल्लीन
युगों युगों से लीन

पर सृष्टि तो यूँ नहीं चलती न, मेरे भोले
तो जब मैं मिल जाती हूँ तुम्हें
कभी तुम्हारी इच्छा के विरुद्ध
तो कभी यूँही अचानक से
तब तुम नाचते हो अपना आनंद तांडव
सृष्टि पैदा होती है तब
चलने लगती है शिशु के पाँव सी

मैं भी तो भटकती हूँ वन – वन
थल -थल
नदिया सी उछलती – उफनती
ढूंढ़ती फिरती हूँ तुम्हें
युगों -युगों की प्यास जन्मों – जन्मों की तड़प

कभी इस कोख से जन्मती हूँ कभी उस कोख से
कभी तुम मेरे पास से ही गुज़र जाते हो
मैं पहचान ही नहीं पाती
कभी मिलते -मिलते ही बिछड़ जाते हो

तुम से जब मिल जाती हूँ
तो सिमट आते हैं मुझ में सब
आकाश गंगा, धूम्रकेतु, तारे
सूर्य, चाँद, नदी, नारे

मैं देवी हो जाती हूँ तुमसे गुज़र के
अमृता हो जाती हूँ
जब तुम सुनाते हो मुझे वो अमर गाथा
तो सब सुनने वाले
पेड़ – पौधे, पशु – पक्षी भी हो जाते हैं अमर

पर मैं ठहरी प्रकृति, मेरे आराध्य
मेरा स्वभाव ही नहीं है रुक जाना
आवेश, आवेग, हलचल मेरी नियति है
तो मैं फिर चल पड़ती अपने रास्ते
तुम फिर हो जाते हो तटस्थ
शांत, तपस्या में लीन

यूँ ही चलता रहता है हमारा मिलना – बिछड़ना
यूँ ही चलती रहती है सृष्टि
अगर हमारा मिलना हो गया स्थायी
तो थम जायेगी दुनिया
अगर हमारा बिछड़ना हो गया स्थायी
तो आ जाएगा प्रलय
खत्म हो जाएगी कायनात
तो मेरी किस्मत में लिखे हैं
सिर्फ दो घूँट ही अमृत के

आसान नहीं है यूँ बार – बार मिलना बिछड़ना
आसान नहीं है सहना दर्द बेशुमार
पीड़ा असहनीय
आसान नहीं है तुमसे रूठ जाना
आत्मदाह कर लेना
ख़ाक हो जाना
युगों -युगों तड़पना, भटकना, ढूंढ़ना
फिर जन्मना, बार – बार जन्मना

जानती हूँ दर्द तुम्हारा भी कोई कम नहीं है, मेरे ईष्ट
तभी तो मुझ से बिछड़ते ही
रुष्ट हो करने लग जाते हो रूद्र – तांडव
हो जाते हो सृष्टि का सर्वनाश करने को अधीर

पर यही नियति है
नियमों से बाहर तो हम भी नहीं
यूँ ही चलता रहेगा सिलसिला मुसलसल
तो दो घूँट अमृत ही काफी है, मेरे शिव
मुझे अमृता बनाने के लिए…….

Comments

comments

loading...

LEAVE A REPLY