कश्मीरी शैवपरम्परा के कालजयी स्तोत्र ‘बहुरूपगर्भ’ और उनके रचयिता

(मेरे पितामह स्व. श्री शम्भुनाथजी राज़दान (रैणा) द्वारा अपने जीवन के अंतिम दिनों में लगनपूर्वक संकलित कश्मीरी शैवपरम्परा के कालजयी स्तोत्र “बहुरूपगर्भ” की प्रति मित्रों के दर्शनार्थ प्रस्तुत कर रहा हूँ.

कहना न होगा कि दादाजी वर्षों तक जम्मू-कश्मीर ‘ब्राह्मण महामंडल’ के अध्यक्ष रहे. ये महिमाशाली और पावन स्तोत्र केंद्रीय संस्कृत विद्यापीठ, दिल्ली के सौजन्य से 1986 में प्रकाशित हुए हैं.

इन्हें छापने का श्रेय उस समय के विद्यापीठ के उपकुलपति स्व. मण्डन मिश्र को जाता है. स्तोत्रों का हिंदी अनुवाद और विस्तृत टिप्पणियाँ डॉ. रुद्रदेव त्रिपाठी जी ने की हैं.

माना जाता है कि “स्वच्छन्दभैरव”की स्तुति में कहे गए ये स्तोत्र लोकहितकारी और कष्टमोचक हैं. इनका वाचन कश्मीरी पंडित समुदाय द्वारा अपने हर धार्मिक अनुष्ठान में श्रद्धापूर्वक करने की परम्परा रही है.)

श्रीबहुरूपगर्भ-स्तोत्रम् : उपसंहार एवं फलश्रुति

२१ गुरुशास्त्रसदाचारदूषके कलहप्रिये । निन्दके जम्भके क्षुत्रे, समयध्ने च दाभ्भिके ॥ दाक्षिण्यरहिते पापे, धर्महीने च गवते । भक्तियुक्ते प्रदातव्यं, न देयं परदीक्षिते ॥ पशूनां सन्निधौ देवि ! नोच्चार्यं सर्वथा क्वचित् । अस्यैव स्मृतमात्नस्य, विघ्ना नश्यन्ति सर्वशः ॥ गुह्यका यातुधानाच, देताला राक्षसादयः। डाकिन्यश्च पिशाचाश्च, क्रूरसत्त्वाश्च पूतनाः ॥ नश्यन्ति सर्वे पठितस्तोत्नस्यास्य प्रभावतः । खेचरी भूचरी चैव, डाकिनी शाकिनी तथा॥ ये चान्ये बहुधा भूता दुष्टसत्वा भयानकाः । व्याधि-दुभिक्ष-दौर्भाग्य-मारी-मोह-विषादयः ॥ गजव्याघ्रादयो दुष्टाः, पलायन्ते दिशो दंश । सर्वे दुष्टाः प्रणश्यन्ति, चेत्याज्ञा पारमेश्वरी॥ इति श्रीबहुरूपगर्भस्तोत्रं सम्पूर्णम् ।इति शुभम्

(उपसंहार एवं फलश्रुति)

इस प्रकार यह महान् स्तोत्रराज महाभैरव द्वारा कहा गया है. यह योगिनियों का परम सारभूत है. यह स्तोत्र किसी अयोग्य तथा अदीक्षित, मायावी, क्रूर, मिथ्याभाषी, अपवित्र, नास्तिक, दुष्ट, मूर्ख, प्रमादी, शिथिलाचारी, गुरु-शास्त्र तथा सदाचार की निन्दा करने वाले, कलहकर्ता, निन्दक, आलसी, सम्प्रदाय-विच्छेदक अथवा प्रतिज्ञा तोड़नेवाले, अभिमानी और कापुरुष को नहीं देना चाहिए.

यह केवल भक्तियुक्त सदाचारी व्यक्ति को ही देना चाहिए. इस स्तोत्र का स्मरण-मात्र करने से सदैव विघ्न नष्ट होते हैं. यक्ष, राक्षस, वेताल, अन्य राक्षस आदि, डाकिनियां, पिशाच, क्रूर जन्तु एवं पूतनादि राक्षसियां, खेचरी और भूचरी, डाकिनी, शाकिनी आदि सभी इस स्तोत्र के पाठ से उत्पन्न प्रभाव से नष्ट हो जाते हैं.

इनके अतिरिक्त जो भी भयङ्कर दुष्ट जीव हैं तथा रोग, दुभिक्ष, दौर्भाग्य, महामारी, मोह, विषप्रयोग, गज, व्याघ्र आदि दुष्ट पशु हैं, वे सभी दसों दिशाओं से भाग जाते हैं. सभी दुष्ट नष्ट हो जाते हैं. ऐसी परमेश्वर की आज्ञा है.

(पूरे स्तोत्र web पर उपलब्ध हैं. बड़ी खोजबीन और परिश्रम के बाद दादाजी की तस्वीर हाथ लगी जिसे इस लेख के साथ लगा रहा हूँ)

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