वामिस्लाम : मैत्री व सैद्धांतिक एकता के सूत्र

“लाइलाहा इल-अल्लाह, मुहम्मद उर रसूल अल्लाह” अर्थात कोई दूसरा नहीं सिर्फ एक अल्लाह है और मुहम्मद उसके पैगम्बर हैं.

रसूल के मज़हब को दुनिया में फैलाना है. इसके लिए जेहाद करना है. मोमिनों, उस राह में सिर कटाया तो तुम्हारे लिए 72 हूरें हैं और अगर जीते तो गाज़ी बन कर विजित क्षेत्रों से लूटे गए माल असबाब उनकी हूरों का उपभोग करो. महिलाओं-बच्चों को गुलाम बनाओ.

गाज़ी और शहीद मोमिनों के हाथों लूटमार और कत्लोगारत की यह अनवरत यात्रा 1400 साल से जारी है. आगे भी जारी रहेगी.

उसके बाद एक और नबी आए कार्ल मार्क्स. अभी पांच मई को 200 साल के हुए.

उन्होंने कहा, ये धर्म-मज़हब तो अफीम है. ला इलाहा छोड़ो. बाप बड़ा ना भैय्या- असली चीज रुपैय्या ही मूल मंत्र है. पूंजी, श्रम और मुनाफा यही तीन चीजें समझने लायक हैं, बाकी सब बकवास है. मालदार कामगार का शोषण करते हैं और मुनाफा कमाते हैं.

उनका फतवा था : इंकलाब ज़िंदाबाद, दुनिया के मजूरों एक हो जाओ, तुम्हारे पास खोने के लिए बेड़ियां हैं और पाने के लिए पूरी दुनिया. क्रांति करो, पूंजीपतियों को उखाड़ फेंको, सर्वहारा की तानाशाही कायम करो. और एकाध जगह नहीं पूरी दुनिया में.

क्रांति-क्रांति और अल्ला-अल्ला जपते हुए दूसरों का माल हड़पना और पूरी दुनिया पर राज करना, मोहम्मद के मोमिनों और मार्क्स के मज़दूरों में यह बुनियादी सैद्धांतिक साम्यता है. फिर भी हम आश्चर्यचकित रहते हैं कि आसमानी किताब वाले मोमिन और दुनियादारी सिखाने वाले मार्क्स के अनुयायी हमेशा एक ही पाले में क्यों खड़े रहते हैं?

यह पूरी तरह से स्वाभाविक है कि मोहम्मद और मार्क्स के अनुयायी हमेशा एक साथ खड़े मिलें क्योंकि बुनियादी सैद्धांतिकी और ध्येय समान हैं. दोनों ही सर्वसत्तावादी (तानाशाही) और सामूहिकतावादी हैं जहां अगर आप उनके जैसे नहीं सोचते या थोड़ा भी अलग हो तो तय है कि मार दिए जाएंगे.

इस्लाम जहां जहां गया वहां से स्थानीय धर्मों और संस्कृतियों का नामोनिशान मिट गया. वामपंथी अतीत का नामोनिशान मिटा देते हैं ताकि कोई अतीत की कोई स्मृति भी बाकी नहीं रहे. भाषा-संस्कृति व इतिहास बोध खत्म हो जाए तो वामपंथी ‘न्यूस्पीक’ की स्वीकार्यता आसान हो जाएगी.

मारे जाने का खौफ ऐसा होता है कि 1950-60 के दशक में पूर्वी यूरोप में लोग कहते थे – Better red than dead. दोनों दी विचारधाराएं सेंसरशिप और गुरिल्ला युद्ध के बल पर टिकी हैं. जिस दिन ये नंगी होने लगीं, अंत तय है.

दोनों ही किसी भी तरह की व्यक्तिगत स्वतंत्रता के घोर विरोधी हैं. हर चीज पर इनका नियंत्रण संपूर्ण (Absolute) होना चाहिए. लूट के माल के बंटवारे के लिए मार्क्स संपत्ति के समान वितरण का सिद्धांत देते हैं.

अरबी थोड़ा पैदल होते हैं तो मोहम्मद ने माल-ए-गनीमत पेश किया, जो आपको अश्लील लग सकता है लेकिन मोमिनों को नहीं. माल-ए-गनीमत माने काफिरों की संपत्ति की लूट और उनकी महिलाओं से बलात्कार हलाल है. रसूल और अल्लाह इससे खुश होकर प्रसाद के रूप में आपके खाते में थोड़ा सवाब भी ट्रांसफर कर देते हैं.

दोनों की दृष्टि पारदेशी (transnational) है. मोहम्मद और मार्क्स किसी भी तरह की स्थानीयता, सांस्कृतिक वैविध्य की गुंजाईश नहीं छोड़ते. किसी भी तरह के जातीय, भाषाई और सामुदायिक राष्ट्रवाद का सर्वथा निषेध है.

इसलिए पूरी दुनिया में बुनियादी मुद्दों पर इस्लाम और कम्युनिस्टों की प्रतिक्रिया हमेशा ऐसी होती है कि राष्ट्र-राज्य की अवधारणा में विश्वास करने वाले देश और समाज आश्चर्यचकित हो जाते हैं. अगर ये थोड़े भी देशज होते तो चीन के चेयरमैन माओ को खुद ही अपना चेयरमैन घोषित ना करते और ना तो जिन्ना की तस्वीर को सीने से लगाए घूमते.

चांद-सितारा और हंसुआ-हथौड़ा, दोनों का एकमात्र साध्य है वर्चस्व और इसके लिए ये बर्बर से बर्बर साधन अपना सकते हैं. यह तय कर पाना मुश्किल है कि बगदादी ज्यादा क्रूर है या स्टालिन. हां, दोनों के निशाने पर वो स्थानीय समाज होता है जो इनके प्रतिरोध में खड़ा है.

वर्चस्व कायम करने के लिए उन्हें इस समाज की एकता और संस्कृति का ध्वंस करना है. भारत में हिंदू नाम का वो समूह है जो इनके मंसूबों के पूरा होने में सबसे बड़ी बाधा है. किसी भी तरह वे इसे विखंडित करना चाहते हैं.

इसलिए ओवैसी, पीएफआई टुकड़े-टुकड़े गैंग के समर्थन में नज़र आएंगे तो टुकड़े-टुकड़े वाले जिन्ना और शेख उसामा के समर्थन में कोई न कोई तर्क ढूंढ ही निकालेंगे. फिर दोनों एकजुट हो संघ और सावरकर की निंदा करेंगे. वामिस्लामी मैत्री के कुछ मनोरंजक चुटकले भी हैं. पर उनकी चर्चा फिर कभी.

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