2019 की फेसबुकिया मुसीबत : मोदी से संघ सी अपेक्षा क्यों?

विशेषकर हिन्दू बौद्धिक मत में ये भेद गहरा दिख रहा है कि क्या सरकारी कामकाज के तरीके, विचारधारा के साथ हैं या उसे पुष्ट कर रहे हैं या कमज़ोर कर रहे हैं.

ये गौर से समझने वाली बात है.

ये दिखता भी आता रहा है. मोदी समर्थकों के दो गुट हैं जिनकी आलोचना का उद्देश्य या तो वाहवाही करना है या फिर उसे सही रास्ते पर लाने की जुगत करना. ये एक ही विवाद है और बहुत गहरा विवाद भी है जो गंभीरता की अलग ही मांग करता है.

जनता में भी, मुझे नहीं लगता कि लोग मोदी या संघ को इतना समझते हैं. वो केवल संघ से जुड़े या नहीं जुड़े लोगों की लेखनी से ही आभास मात्र से उपलब्ध होता है. मोदी के सपोर्टर्स काफी हैं. इसमें दो राय नहीं. पर बात विवाद की है.

प्रकृति कभी कभी विकल्प नहीं छोड़ती है. मेरे जैसा व्यक्ति दूर की सोचे, जो बहुत नॉर्मल भारतीय मूल का है, तो एक ही बात दृष्टिगत होती है कि विकल्प तो और कोई है नहीं.

भारत जैसे देश को मोदी ही चाहिए या मोदी जैसा नेता. जिसमें जिजीविषा हो, कार्य पूर्ण करने का संकल्प हो, जो निष्ठा पूर्वक लगा हो. जो जिम्मेदारी उठा सके.

इसमें संदेह नहीं कि बड़े नेताओं में उनके कद का कोई नहीं जो प्रधानमंत्री जैसे पद को सुशोभित कर सके. कौन है? तो इस हिसाब से मोदी ही ठीक हैं.

पर विवाद दूसरा है. क्या मोदी विचारधारा को पुष्ट कर रहे हैं या केवल जीतने का हिसाब बना कर चल रहे हैं. उनको बने रहना है तो राजनैतिक खेल भी खेलने होंगे. इसी बात में मेरी दृष्टि में, बात छुपी हुई भी है.

विचारधारा एक मनमोहक शब्द है. संघ जैसे संगठन की तपस्या तो सामने ही है. मोदी जी स्वयं उससे निकले हैं.

संघ की, राजनीति से दृष्टिगत तौर पर दूरी बनाके रखकर चलने की प्रवृत्ति है, भाजपा उनकी राजनैतिक इकाई भी है. ऐसा समझ में आता है. ये बात स्पष्ट है.

पर मसला ये है कि क्या संविधान का स्वरूप ही विचारधारा को पुष्ट करने का सम्बल देता है? कैसे करेंगे और क्या करेंगे? या क्या नहीं कर रहे हैं? ये मसला सरकारी मैनेजमेंट का सावधानी के साथ चलने का है.

मुझे नहीं लगता कि संघ का शीर्ष नेतृत्व इस बात से अनभिज्ञ हैं. ऐसा नहीं है कि अच्छे कार्यो में सहायता नहीं हो रही होगी. अवश्य ही हो रही होगी.

पर राजनीति का कोई क्या करेगा? एक तो सरकारी विधान है. मोदी जी उसके खिलाड़ी हैं. नो डाउट. उस पर दुश्मन खेमा बिजली गिराने को तैयार बैठा है. उसे हर उस मौके का इंतजार है जिससे वो सत्ता में आये.

आपको क्या लगता है 152 करोड़ रकम पकड़ी गई अभी कर्नाटक में. सरकार सोती रहती या कुछ नहीं करती तो ऐसा कैसे होता? दो निशाने सध गए – पहला तो काला धन पकड़ा, दूसरा काले धन से चुनाव जीतने वालों को कमजोर किया गया. ये ऑटोमेटिक बात है. मुझे विशेष रूप से कहने का औचित्य नहीं है.

पर शत्रु जब प्रबलता के साथ सत्ता पाने को खड़ा हो और ये पता हो, तो मोदी जी विचारधारा को पुष्ट करेंगे या जीतने की ओर बढ़ेंगे.

ऐसा नहीं कि वो स्वयं नहीं लगे हैं. हर बात का उदाहरण स्वयं बनते हैं. जो कहते हैं वो करते हैं. अपने सहयोगियों को भी लगातार कहते रहते हैं. हां, दलित के घर पर भोजन अगर बाहर से आएगा, तो विचारधारा समरसता की पुष्ट नहीं होगी, है मुझे भी समझ आता है. ये शायद मोदी जी को भी पता है.

तो क्या इसी बात से मोदी जी आगे बढ़ना छोड़ दें? दे दें विरोधियों को सत्ता ताकि बाद में आप लोग और कराहें और विचारधारा की ही बात करते रह जाएं? वो अकेले तो नहीं हैं न सब चीज के ज़िम्मेदार ?

दूसरा पॉइंट ये भी है कि जिन्हें शामिल किया गया है पार्टी में, वो बोझ बन जायेंगे. ये मुझे भी लगता है. पर मोदी जी को और संघ को भी तो पता होगा? सम्भावना है कि गलती हो. पर फिर वही पूर्व का मसला है कि सविधान है, सरकार चलानी है, मैनेजमेंट भी करना है. तो कैसे करेंगे.

स्मरण रहे, भाजपा संघ की राजनैतिक शाखा है. सरसंघचालक जी को सुना है, वो उसके मसले में हस्तक्षेप नहीं करते हैं. कोई बात होती है तो सलाह ज़रूर दे देते हैं. पर संघ का काम सत्ता चलाना नहीं है वो काम पार्टी का है. उनकी ज़िम्मेदारी है.

बात फिर से विचारधारा की है तो संघ और संघ की राजनैतिक इकाई की दूरी ही बताती है कि अचीवमेंट किसे कैसे करना है और दो बातें मिक्स वो भी नहीं करने वाले. इसका दुष्प्रभाव तो नहीं होगा.

अगर, राजनैतिक नाटक-चेटक अगर संघ में भी होने लगते हैं, जैसे समरसता भोज में भी होटल से खाना मंगाया जाने लगे, तब जरूर अलार्मिंग बात है. बाकी राजनीति को राजनीति के तरीके से चलने दीजिये.

राजनैतिक पक्ष में विचारधारा का वही इम्प्लीमेंटेशन बिल्कुल मत खोजिए. कम से कम वक्त दीजिये, वरना इसी बौद्धिक लड़ाई के चक्कर में, अगर आज़ादी के बाद से बिना विपक्ष के रही, मोनोपोली वाली पार्टी आ गयी, तो वो न केवल बदला ही लेगी, बल्कि और एग्रेसिव तरीके से खत्म करने को लग जायेगी. फिर आराम से विचारधारा का मंत्र जाप करियेगा.

संघ में राजनीति के गुण वायरस दिखें, तो खतरा है. सत्ता के प्रति लोभ दिखे, तो खतरा है, समाज को लेकर बने उद्देश्य में गड़बड़ दिखे तो खतरा है.

बाकी पॉलिटिकल पार्टी भाजपा से वो उम्मीद ही मत करिये कि सारे के सारे आदर्श आपको वहां दिखने ही चाहिये. ये टेक्निकल रूप से असम्भव है. अधिकतम हासिल करने की कोशिश हो सकती है पर अलग ही रास्ते से भी चले तो थोड़ा धैर्य से सोच लेना चाहिए, आगे हमें क्या चाहिए.

संघ तो कांग्रेस काल में भी सर्वाइव कर गयी थी, अब तो उनकी समर्थन की सरकार है, सुरक्षित क्यों नहीं रहेगी, पर राजनैतिक अनुभवों से गुजरते ही संघ के भी अपने अनुभव हैं जो शायद सबको पता न हों, पर मोदी जी को निश्चित ही पता होगा कि कैसे किस हाल से, किन अनुभवों से निकले हैं.

आपको क्या लगता है? मोदी जी एग्रेसिव राजनीति, भाषण आदि में भी, एक युवराज के पीछे क्यों लगे रहेंगे, जबकि पूरे देश को पता है वो कैसा और किस लायक है?

बाकी दूसरे भी सोचें. विचार संग्रह रख दिया है. कौन क्या निकाल सकता है अपने हिसाब से निकाल ले. मेरा इतना ही मत है.

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