बौद्धिक आतंकवाद

कभी दूरदर्शन पर साक्षरता को बढ़ावा देने के लिए एक विज्ञापन आता था जिसका टाइटल सॉन्ग था

पढ़ना लिखना सीखो ओ मेहनत करने वालों
पढ़ना लिखना सीखो ओ भूख से मरने वालों

इसमें एक अंतरा था

क ख ग को पहचानों अलिफ बे पढ़ना सीखो
क ख ग को हथियार बना कर लड़ना सीखो।

तो सवाल ये है क्या सच मे क ख ग को हथियार बनाया जा सकता है? चलिए विचार करते हैं –

शब्दों का बड़ा महत्व है. हर शब्द अपने आप में एक पूरी परिभाषा समेटे होता है. आप शब्द कहिये और एक पूरी व्याख्या सामने आ जायेगी. कोई भी शब्द ले लीजिए जैसे हमने कहा ‘गांव’, बस आप के मन में एक चित्र उभर जाएगा छोटी छोटी पंगडंडियां, कुछ कच्चे पक्के घर, कच्ची पक्की सड़कें, सादे लोग, खेत खलिहान.

एक शब्द में कितना कुछ समाया रहता है. तो शब्दों का जितना महत्व है उससे ज़्यादा महत्व है इनसे जुड़ी परिभाषाओं का. तो क्या अगर कोई चाहे तो शब्दों से जुड़ी परिभाषाओं को बदल कर किसी व्यक्ति समाज या देश का बड़ा अहित भी कर सकता है? तो मैं कहूंगा कि किसी समाज क्या देश या संस्कृति का विनाश भी सम्भवतः कर सकता है.

एक साधारण जन के पास ये क्षमता न हो, पर बौद्धिक जगत के बुद्धिजीवी लोग शब्द को हथियार बनाना बखूबी जानते हैं. विशेष कर ब्रिटिश हुक्मरान के समय में फली फूली मैकाले शिक्षा पद्धति और फिर वामपंथी विकार धारा, माफी चाहूंगा विचारधारा से जन्मे बुद्धिजीवियों ने शब्दों की परिभाषाओं को अपने हिसाब से बदल कर पूरी की पूरी संस्कृतियों की जड़ो में मट्ठा डालने का काम बखूबी किया.

यही नहीं, अपनी उधार की क्रांतिकारी विचार धारा से देश की मूल विचारधारा और जीवनशैली को Backward, Hypocrisy, Orthodox तक कह डाला.

इसके लिए किसी पुरातन ग्रँथ को खोल कर उदाहरण देने की आवश्यकता नहीं है. ताज़ा ताज़ा हमने बीते दो सालों में कई शब्दों की परिभाषाओं को बदल कर उनके उपयोग की दशा बदल दी है. जैसे कि, भक्त, सेक्युलर, हिंदुत्व या एक शब्द और है राष्ट्रवादी.

इनके भाषागत अर्थ कुछ और है और बौद्धिक जगत द्वारा दिए गए अर्थ कुछ और.

ये यहीं नहीं रुकते, ये अपने बौद्धिक प्रहारों से ऐसा भ्रमजाल बुनते हैं कि आप एक पल को आप को अपनी आदिकालीन संस्कृति, मिथ्या और अप्रमाणिक लगने लगती है और आप Identity Lost की सिचुएशन में होते हैं.

आपकी हर परंपरा की प्रमाणिकता मांगते हैं, क्यों, क्या, कब जैसे सवाल पूछते हैं. आपको अपने ही देश में बाहर से आए कोई आर्य बता देंगे. जबकि खुद इनकी आस्था वेटिकन अरब रूस और जर्मनी में कहीं बसी है.

आज हाल ये है कि भारत का मूल सनातन विचारधारा मानने वाला व्यक्ति जिसे हिन्दू कहा जाता है कटघरे में खड़ा है और वामपंथ दयालु येशु और आसमानी किताब और जाने किन किन मानने वालों के प्रश्नपत्रों के जवाब देने में लगा हुआ है.

यदि आप इनके विरुद्ध हैं तो आप अपनी पहचान पर प्रश्नात्मक और अपमानजनक हमले सहने को तैयार रहिए क्योंकि ये बौद्धिक आतंकवादी सिवाय अपनी विचारधारा के किसी मूल विचारधारा को जीवित नहीं रहने देना चाहते.

पर आप इनके प्रश्नों के उत्तर देना बंद करिए क्योंकि इन्हें आपके किसी उत्तर में कोई दिलचस्पी नहीं.

ये रामायण का वही पात्र है जिसके प्रश्न के उत्तर और लोकरंजन के लिए राम ने सीता त्याग कर दिया और सदा के लिए कटघरे में खड़े हो गए. पर किसी ने उसके प्रश्न पर प्रश्न नहीं उठाया कि अग्नि परीक्षा से पार हुई सीता पर वो प्रश्न पूछने वाला कौन था?

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