जीवन की पाठशाला में पढ़ने की कोई उम्र नहीं होती

पार्क में ये सम्भ्रान्त महिला रोज आतीं, कुछ राउंड लगाकर बेंच पर बैठ जातीं. मुस्करा कर अभिवादन होता, इस से ज्यादा पहचान नहीं थी. एक दिन उनकी बिल्डिंग में रहने वाली एक फ्रेंड ने बताया, हाल में ही उन्होंने बी ए. पार्ट वन की परीक्षा दी है. 65% मार्क्स मिले हैं. पिछले साल ही बारहवीं की है, उसमें भी फर्स्ट क्लास मिला था.

अब तो मुझे उनसे बात करने की इच्छा हो आई.

एक दिन उन्होंने बताया. उनका नाम ‘सुगंधी कोटियन’ है. शुरू से ही उनकी पढ़ने में रूचि थी. पर दसवीं के बाद शादी हो गई और 1967 में वे मुम्बई आ गईं. बेटा जब स्कूल जाने लगा तो उसे वे खुद ही पढातीं.

पर उन्होंने कन्नड़ मीडियम से दसवीं की थी और बेटा अंग्रेजी मीडियम में पढता. उन्हें addition, subtraction जैसे शब्द भी समझ में नहीं आते. डिक्शनरी देख देख कर उन्होंने बेटे को पढ़ाना शुरू किया.

बेटा क्लास में फर्स्ट आता. दूसरे पेरेंट्स भी उनसे अपने बच्चों को पढ़ाने का आग्रह करने लगे. उन्होंने ट्यूशन लेनी शुरू कर दी. बेटे को आठवीं के बाद पढ़ाना छोड़ दिया पर दूसरे बच्चे को पढ़ाती रहीं.

करीब बीस साल तक उन्होंने ट्यूशन लिया. बेटे की शादी हुई, बहू भी नौकरी करती. दोनों पोतियों की देखभाल, उनके होमवर्क सबकुछ वही देखतीं. पोतियाँ भी उनसे बहुत प्यार करतीं.

ज़िन्दगी अच्छी गुजर रही थी कि एक वज्रपात हुआ. बेटे को कैंसर हो गया. दुनिया की हर माँ की तरह उन्होंने ईश्वर से दिन रात दुआ मांगी कि उन्हें उठा ले और बेटे की ज़िन्दगी बख्श दे, पर ईश्वर ने उनकी नहीं सुनी.

वे पोतियों में बेटे का चेहरा देख जीने लगीं. तभी बहू के ऑफिस से उसे अमेरिका जाने का ऑफर मिला. बहू के यहाँ के ऑफिस का हाल ठीक नहीं था, उसका प्रोजेक्ट बंद होने की आशंका थी.

बहू के लिए भी यह निर्णय कठिन था पर जब उसने, इनसे अमेरिका जाने की परमिशन मांगी तो इन्होने दिल पर पत्थर रख बहू और पोतियों का भला सोच, उसे जाने की आज्ञा दे दी. बहू की बहन भी अमेरिका में ही थी. बहू, पोतियों के साथ चली गई और सुगंधी जी बिलकुल टूट गईं.

उन्हें दिन रात रोते देख, उनकी छोटी बहन ने उन्हें बहुत समझाया और आग्रह किया कि वे पास के स्कूल में, जिसमें अधिकांश झुग्गी झोपड़ियों में रहने वाले बच्चे ही आते हैं, उन्हें पढ़ाएं. उन्होंने वॉलेंटियर के तौर पर पढ़ाना शुरू किया. उनकी लगन देख, एक हफ्ते बाद ही स्कूल की प्रिंसिपल ने कहा कि ‘क्या वे नियमित पढ़ाना चाहेंगी?’

उन्होंने स्कूल ज्वाइन कर लिया. कुछ दिनों बाद प्रिंसिपल ने ही उन्हें बारहवीं की परीक्षा देने के लिए प्रेरित किया. वे तैयार नहीं थी, पर उनकी बहन ने भी बहुत जोर दिया और फॉर्म भरने के लास्ट डेट को ले जाकर फॉर्म भरवा दिया. किसी तरह पढ़ कर उन्होंने बेमन से परीक्षा दी और उन्हें 64% मार्क्स मिले. अब सबका उत्साह बढ़ा, सबलोग उनपर बी.ए. करने के लिए जोर डालने लगे. पति भी उत्साह बढ़ाते. उनका भी पढ़ने में मन लगने लगा और पार्ट वन भी उन्होंने फर्स्ट क्लास से पास की.

वे बता रही थीं, ‘जब मैं परीक्षा देने गई तो देखा, मेरे जैसी कई औरतें हैं. मुझसे उम्र में कम हैं पर पढ़ाई छोड़े बरसों बीत गए हैं. कुछ नौकरी में प्रमोशन के लिए, कुछ अच्छी नौकरी के लिए फिर से पढ़ रही हैं.

नौकरी, घर, पढ़ाई, बच्चे सब सम्भालते हुए संघर्ष कर रही हैं. दो तीन महिलायें ऐसी भी हैं जो सिर्फ शौक से पढ़ रही हैं कि बच्चों के साथ हमारी भी डिग्री हो जायेगी’ अब हम सब अच्छी सहेलियाँ बन गई हैं. हम एक दूसरे से नोट्स लेते हैं, वे सब मेरे घर आती हैं, हमेशा मेरा हाल चाल पूछती रहती हैं. सुगंधी जी को देखकर, उनके स्कूल की दो टीचर ने भी फिर से पढ़ना शुरू कर दिया है. सुगंधी जी कुछ बच्चों की पढ़ाई का खर्च उठाती हैं (ये बात उन्होंने नहीं, मेरी फ्रेंड ने बताई).

सुगंधी जी ने कंप्यूटर भी खरीदा, पड़ोसी के बच्चों को बुलाकर चलाना सीखा ताकि स्काईप के जरिये बहू और पोतियों से बात कर सकें. अंत में उन्होंने दीर्घ सांस लेकर कहा, ‘साठ बरस तक ज़िन्दगी बहुत हंसी ख़ुशी गुज़री पर शायद ईश्वर मुझे सिक्के का दूसरा पहलू भी दिखाना चाहता था कि ज़िंदगी में सुख है तो दुःख भी बहुत गहरा है’.

– रश्मि रविजा

Comments

comments

loading...

LEAVE A REPLY