कायदे-कानून नहीं, देश की कार्य-संस्कृति बदलने पर काम कीजिए : शिव खेड़ा

आसाराम और राम-रहीम सरीखे धार्मिक-आध्यात्मिक गुरुओं से मोहभंग के इस दौर में मोटिवेशनल और मैनेजमेंट गुरु बेहतर मालूम पड़ते हैं. दोनों तरह के लोग जिंदगी को बेहतर बनाने की शिक्षा देते हैं. पहले वाले गुरु अगले जन्म को बेहतर बनाने पर ज्यादा जोर देते हैं तो बाद वाले गुरु इसी जन्म को. बाद वालों से शोषण का खतरा नहीं दिखता.

शिव खेड़ा मोटिवेशनल गुरु हैं. अपने नाम के अनुरूप कल्याणकारी. देश-दुनिया घूम-घूमकर लोगों को अपनी असल क्षमता हासिल करने की प्रेरणा देते हैं.

15 किताबें लिख चुके हैं. शुरुआत सन 1998 में ‘यू कैन विन’ से की थी जो आज बेस्टसेलर किताबों में शुमार है. उनके सूक्ति वाक्य इतने मशहूर हैं कि कई जगह ऑटो के पीछे और दीवारों पर स्टिकरों के रूप में दिख जाते हैं.

मसलन ‘अगर आपके पड़ोसी पर अत्याचार और अन्याय हो रहा है और आपको नींद आ जाती है तो अगला नंबर आपका है.’

‘जीतने वाले अलग चीजें नहीं करते, वे चीजों को अलग तरह से करते हैं.’

इन्हीं शिव खेड़ा से राजेश मित्तल की बातचीत के खास हिस्से पेश हैं –

Q. आपने अपनी नई किताब का नाम ‘यू कैन अचीव मोर’ रखा है यानी जिंदगी में जो है, वह पर्याप्त नहीं है, ज्यादा हासिल करो लेकिन हमारे धर्मग्रंथों में संतोष की महिमा गाई गई है.

A. संतोष इंसान को ढीला और लापरवाह बना देता है. उसकी जिंदगी में कोई उत्साह नहीं होता. उसे कुछ पाना नहीं है. जो चल रहा है, ठीक है. वह बैठा है. दिन गुजार रहा है. अगर आपने शादी की है, आपका जीवनसाथी है, बच्चे हैं, मां-बाप हैं तो उन्हें ठीक-ठाक पालने-पोसने के लिए आपको मेहनत करनी ही होगी.

यह जिम्मेदारी बैठे-ठाले पूरी नहीं होगी. लोगों ने संतुष्टि का गलत मतलब निकाल लिया है. अगर इंसान के हाथ-पांव ठीक चलते हैं तो उसे मेहनत करनी चाहिए. मौजूदा स्थिति को बेहतर बनाने के प्रयास करने चाहिए. हमने समाज से बहुत कुछ हासिल किया है, हमें वापस भी देना है. संतोष परले दर्जे का स्वार्थ है.

Q. क्या महत्वाकांक्षा से मन की शांति भंग नहीं होती?

A. महत्वाकांक्षा भी दो तरह की होती है. एक मुनासिब और एक गैर-मुनासिब. गैर-मुनासिब महत्वाकांक्षा से मन की शांति भंग होती है. मेरी औकात होंडा गाड़ी की है और मैं प्राइवेट जेट की आकांक्षा पाल लूं तो मैं अपनी बर्बादी का रास्ता बना लूंगा. गैर-मुनासिब महत्वाकांक्षा लालच है.

Q. आपका एक बड़ा मशहूर कोट हैः ‘अगर आपके पड़ोसी पर अत्याचार और अन्याय हो रहा है और आपको नींद आ जाती है, तो अगला नंबर आपका है.’ लेकिन आजकल के माहौल में यह प्रैक्टिकल नहीं लगता. हमारे एक लेखक दोस्त ने बस कंडक्टर को रास्ते में खड़े होकर पेशाब करने से रोका तो उनकी बुरी तरह पिटाई कर दी गई.

A. आज के माहौल में बस कंडक्टर को मालूम है कि उसका कुछ नहीं बिगड़ेगा. इस दौर में अपराधी को सुरक्षा मिलती है और ईमानदार को सजा. आज शिक्षा, राजनीति से लेकर धर्म तक हमारा सारा समाज भ्रष्ट है. इस सिस्टम में जो भी निकलता है, भ्रष्ट ही निकलता है.

मेडिकल कॉलेज से पढ़ाई करने के बाद जब डॉक्टर निकलता है तो उसे बीमार नहीं, टारगेट नजर आता है. इंजीनियर कच्चे पुल बनाता है. पुलिसवाला खुद क्रिमिनल बन जाता है. जज सिर्फ फैसला सुनाता है, इंसाफ नहीं देता. आप यहां कितने भी कायदे-कानून बना लें, जब तक इस हिंदुस्तान की कल्चर नहीं बदलेगी, तब तक कुछ होने वाला नहीं है.

Q. तो हम अपने देश में कल्चर कैसे बदलें?

A. कल्चर ऊपर से नीचे चलती है. लीडर सही तो उस परिवार की, उस संगठन की, उस देश की कल्चर ईमानदारी से काम करने की होती है. अपने देश में हमें अच्छे लीडर की आज भी तलाश है. ऐसा लीडर जो देश का हित अपने हित से ऊपर रखे, जो निस्वार्थ हो, सचाई और ईमानदारी से चले. ऐसा लीडर बड़ी जल्दी इस देश का नक्शा बदल कर रख देगा.

Q. मौजूदा नेताओं में से किसी से उम्मीद?

A. अभी मुझे इनमें से किसी से उम्मीद नहीं.

Q. नरेंद्र मोदी से भी नहीं?

A. लंबे अरसे बाद आशा की किरण दिखी थी लेकिन अब बहुत सारे लोग निराश हैं. ग्राउंड में बदलाव नहीं दिखाई दे रहा. रोजमर्रा की समस्याएं ज्यों की त्यों हैं बल्कि बढ़ रही हैं. अंग्रेजों ने इस देश के लोगों को हिंदू-मुस्लिम में बांटा था, बीजेपी ने तो हिंदू-हिंदू को बांटने का काम किया. सन 1999 में अटल बिहारी वाजपेयी ने चुनाव जीतने की खातिर राजस्थान की संपन्न जाति जाटों को ओबीसी आरक्षण देने का ऐलान कर दिया. पार्टी जीत गई, देश हार गया.

Q. राहुल गांधी से आस है?

A. 70 साल से इस देश की जनता चुनाव से पहले नेताओं के झूठ सुनती आ रही है कि यह कर देंगे, वह कर देंगे. बाद में हुकूमत में आने पर करते कुछ नहीं. कांग्रेस हो या बीजेपी, सब एक जैसे हैं. बीजेपी 2014 में बहुत कुछ कहती थी. सत्ता में आने के बाद क्या रॉबर्ट वाड्रा के खिलाफ कोई कार्रवाई की?

असल में सभी पार्टियों की आपस में मिलीभगत है. पावर में आने पर एक-दूसरे को परेशान नहीं करते. अभी देश में वोटिंग का जो ट्रेंड है, उसके मुताबिक देश भरोसे का वोट नहीं दे रहा, मजबूरी का वोट दे रहा है. तमिलनाडु में देखिए. एक बार अम्मा आती थीं तो दूसरी बार अन्ना. यूपी में देखिए, एक बार मायावती, दूसरी बार मुलायम. अभी जो सत्ता में है, यह ठीक नहीं है. इसे बाहर निकालो. तब दूसरा आ जाता था.

Q. लेकिन मध्यप्रदेश, छत्तीसगढ़ में तो तीन-तीन बार मुख्यमंत्री वही रहे हैं?

A. वहां विपक्ष मजबूत नहीं था.

Q. 2019 में क्या होगा?

A. कहना मुश्किल है. चुनाव बहाव या लहर पर चलते हैं. 2014 में नरेंद्र मोदी की लहर थी. घटिया से घटिया उम्मीदवार भी उस लहर में जीत गया. फिलहाल तो लहर नहीं दिख रही.

Q. केजरीवाल के बारे में क्या कहेंगे?

A. उनसे भी बड़ी उम्मीदें थीं लेकिन उन्होंने भी अब दूसरी पार्टियों जैसे ही रंग-ढंग अपना लिए हैं. वह भी जात-पात की बात करते हैं, मजहब पर वोट लेते हैं.

Q. तो आप खुद राजनीति में क्यों नहीं आ जाते?

A. कई वजहें हैं राजनीति में ना आने की.

Q. कौन-सी वजहें?

A. सबसे बड़ी वजह तो सेहत ही है.

Q. एक आम नैतिक दुविधा यह होती है कि दूसरा बंदा अच्छा हो या बुरा, सभी के साथ हम अच्छा ही बर्ताव करें यानी चाहे बिच्छू डंक मारे, उसे हर बार पानी से निकालना हमारा फर्ज है. ऐसा करें या जो अच्छे हैं, उनके साथ अच्छा और जो बुरे हैं, उनके साथ बुरा बर्ताव करें? क्या दुष्ट आदमी को उसी की भाषा में जवाब देना चाहिए, नहीं तो वह हमें कमजोर ही समझता रहेगा?

A. पृथ्वीराज चौहान ने मुहम्मद गोरी को युद्ध में हराया और दरियादिली दिखाते हुए माफ कर छोड़ दिया.बाद में मुहम्मद गोरी ने जयचंद की मदद से पृथ्वीराज चौहान को युद्ध में मात दी और बंदी बना कर अपने साथ ले गया. पृथ्वीराज की दरियादिली के कारण भारत ने सैकड़ों साल की गुलामी झेली.

इतिहास से हम यही सीखे हैं कि हम कुछ नहीं सीखे. कहने में तो बड़ा अच्छा लगता है कि प्यार से सबको जीत सकते हैं. क्या राम रावण को प्यार से जीत पाए? गुंडा सीता को ले गया. राम को हथियार उठाकर उसका वध करना ही पड़ा. ऐसे ही गुरु गोविंद सिंह ने भी तलवार उठाई. उनका कहना था कि जुल्म करना पाप है, जुल्म सहना उससे भी बड़ा पाप है. कोई एक गाल पर चांटा लगा दे तो दूसरा गाल आगे कर देना, लोग कहते हैं, यह गांधीगिरी है तो मैं गांधीवादी नहीं हूं. लातों के भूत बातों से नहीं मानते. उन्हें मुंहतोड़ जवाब देना ही पड़ता है.

Q. यानी सीधों के साथ सीधे और कमीनों के साथ कमीना हुआ जाए?

A. मैं ये लफ्ज़ नहीं दूंगा. यही कहूंगा कि कहीं प्यार से काम लेना पड़ता है और कहीं लातों से.

Q. बीजेपी कई बार जातीय समीकरणों को देखते हुए भ्रष्ट छवि वालों को भी टिकट दे देती है ताकि पार्टी चुनाव जीत सके. यह रणनीति क्या ठीक है?

A. मैं इससे सहमत नहीं. बीजेपी ईमानदार कैंडिडेट खड़ा करे तो वह क्लीन स्वीप करेगी. उसने भी भ्रष्ट खड़ा कर दिया तो भ्रष्ट-भ्रष्ट में फर्क क्या रहा? उधर भी भ्रष्ट, इधर भी भ्रष्ट.

Q. लेकिन ईमानदार आदमी चुनाव में जीत नहीं पाता. लालू जैसे भ्रष्ट, शहाबुद्दीन जैसे गुंडे जीत जाते हैं और इरोम शर्मिला जैसी संघर्षशील महिला हार जाती हैं. आप खुद भी तो सन 2004 में दक्षिण दिल्ली से लोकसभा का चुनाव निर्दलीय के रूप में लड़े थे. आप भी कहां जीत पाए थे?

A. वह चुनाव मैंने बिना तैयारी के, बिना समय दिए लड़ा था. लोगों ने कहा, आपने तो किताब लिखी है ‘यू कैन विन’ और खुद हार गए, लेकिन लोग तो अंतिम परिणाम देखते हैं और यह ठीक ही है.

Q. आप पॉजिटिव एटिट्यूड अपनाने पर बहुत जोर देते हैं लेकिन जिंदगी में दोनों एटिट्यूट की जरूरत होती है. आपको नेगेटिव सोचना पड़ता है. आप यह सोच कर चलते हैं कि यह नहीं होगा तो हम क्या करेंगे. इसे मैनेजमेंट में कहते हैं कि प्लान बी तैयार करो. अगर पॉजिटिव सोच होगी, सब अच्छा-अच्छा सोचेंगे तो प्लान बी नहीं सोचेंगे.

A. इसे नेगेटिव सोच नहीं कहते. पॉजिटिव ही कहते हैं. आपका कोई हॉस्पिटल है. वहां पर ऑपरेशन होते हैं. बिजली का बंदोबस्त है लेकिन फिर भी जनरेटर भी रखते हैं इसलिए कि हर ऑपरेशन सफल हो, उसमें कोई कमी ना आए. जो एक जरनल होता है, वह प्लान ए, प्लान बी, प्लान सी, प्लान डी तक तैयार रखता है. इसे तैयारी कहते हैं. फेल होने की नहीं, सफलता की तैयारी. यह सुनिश्चित करना कि हमें कामयाबी मिले.

Q. आपकी पसंद की तीन सेल्फ-हेल्प किताबें
A.
1. Think And Grow Rich: Napoleon Hill
2. Psycho-Cybernetics: Maxwell Maltz
3. I’m OK – You’re OK: Thomas Anthony Harris

Q. मेरे जैसे अदने आदमी को भी कभी-कभी लगता है कि मैं भी शिव खेड़ा जैसा कामयाब लेखक बन सकता हूं. बस सेल्फ-हेल्प की 10 किताबें पढ़ लो. सार रूप में किताब पेश कर दो. हो गए हिट. मेरी सोच सही है या गलत?

A. आप बताइए, डॉक्टरी की 10 किताबें पढ़कर क्या कोई शख्स डॉक्टर बन सकता है?

Q. सेल्फ हेल्प किताब हो या कोर्स, इनके साथ सबसे बड़ी दिक्कत यह होती है कि कुछ दिन तो इंसान इन बातों को अपनाता है, धीरे-धीरे प्रेरणा फीकी पड़ती जाती है और रुटीन से बाहर हो जाती है. इस चुनौती से कैसे निपटें?

A. लोगों को यह गलतफहमी होती है कि ऐसी किताब या प्रोग्राम कर लेने से वे कामयाब हो जाएंगे. ऐसे कभी कोई कामयाब नहीं होता. किताब पढ़ना या कोर्स कर लेना एक चीज है और उसे जिंदगी में उतारना दूसरी चीज.

मेरे से यह सवाल अक्सर पूछा जाता है कि आपकी बातों को कितने लोग कितने लोग अमल में लाते हैं, मेरा जवाब होता है 10 फीसदी लोग 90 फीसदी बातों को अमल में लाते हैं और 90 फीसदी लोग 10 फीसदी बातों को ही. 10 फीसदी वाले जिंदगी में आगे बढ़ते हैं. बाकी कभी ज्योतिषी को फोन लगाएंगे, कभी कहेंगे मेरे स्टार्स अच्छे नहीं हैं. वे जिम्मेदारी नहीं लेते. खुद गलत काम करते हैं और दोष सितारों को देते हैं. गलती हुई तो सीखते इसलिए नहीं कि अपनी गलती मानी ही नहीं और जब तक सबक नहीं लेंगे तो हम दोहराते रहते हैं लेकिन दोष सितारों को देते हैं. कहते हैं कि मेरा वक्त ठीक नहीं है.

Q. कई बार ऐसा लगता है कि सेल्फ-हेल्प किताबें मन के ऊपरी लेवल पर बदलाव लाती हैं. गहरे मन के स्तर पर बदलाव कैसे लाया जाए ताकि जो आत्मसुधार हो, वह स्थायी बन सके?

A. रिसर्च कहती है कि कोई इंसान अगर 31 दिन रोज किसी चीज की प्रैक्टिस करें तो वह आदत में शुमार हो जाती है. कोई 21 दिन बताता है तो कोई 61 दिन भी. मैं कहूंगा, 61 दिन कोई भी चीज रोज प्रैक्टिस में आती है तो वह आपकी जिंदगी में शुमार हो जाती है.

आपको रोज अपनी अच्छाई को मजबूत करना है और कमी को कमजोर. ऐथलीट कैसे बनता है. रोज वह प्रैक्टिस करता है, धीरे-धीरे एक स्तर पर पहुंचता है और निपुणता हासिल कर लेता है. जिंदगी में सफलता सही काम कभी-कभी करने से नहीं मिलती. रोज और लगातार सही काम करना पड़ता है. कभी-कभी गलती हरेक से हो जाती है. इसे नाकामी नहीं कहा जाएगा. लेकिन सही काम लगातार करना पड़ता है. तब जाकर कामयाबी हासिल होती है. जो शख्स नाकाम है, वह गलत काम नियमित रूप से कर रहा है और सही काम कभी-कभी.

Q. आजकल जो माहौल बन रहा है, छोटे बच्चों के साथ रेप की खबरें आ रही हैं, ऐसा लगता है जैसे इंसान हैवान बनता जा रहा है. ऐसे में इंसान पॉजिटिव कैसे रहे?

A. पहले अंतरात्मा नाम की चीज होती थी जो इंसान को गलत काम करने से रोक देती थी. समाज में आज संवेदनशीलता बची नहीं. ऐसे में निराशा तो होती है, पर आदमी को खुद को उठाना पड़ता है. हौसला रखकर चीजों को बदलने की लड़ाई जारी रखनी चाहिए.

Q. रेप की समस्या का हल क्या है?

A. यह समस्या लॉ एंड ऑर्डर की है. सही माहौल, सही कल्चर बनाने की जरूरत है. सही लीडर होगा तो सब ठीक हो सकता है.

Q. आसाराम को सजा हुई. ऐसे गुरुओं के बारे में क्या कहेंगे?

A. ऐसे लोग टीवी पर भगवे कपड़े पहनकर उपदेश देते हैं कि सांसारिक जीवन से ऊपर उठ जाओ, पैसे का मोह छोड़ दो, यह सब माया है लेकिन वे असल में कह रहे होते हैं कि अपनी जमीन जायदाद मुझे दे दो. ऐसे गुरु लोग अपने भक्तों को बताते हैं कि मरने के बाद कैसे जिएंगे. अरे भाई, मरने से पहले जीना तो सिखा दो. हमारे रोड मॉडल ही गलत हैं. आसाराम, राम रहीम जैसों के पास हमारे राजनेताओं के जाने से भी उन्हें ताकत मिलती है.

Q. क्या गुरु जरूरी है?

A. जीवन में मार्गदर्शक तो होना ही चाहिए. अगर कोई कहता है कि मैं सेल्फ मेड हूं तो गलत कह रहा है. किसी ना किसी का योगदान उसकी जिंदगी में रहता ही है. गुरु तो जरूरी है लेकिन उसका चुनाव बहुत सावधानी से करना चाहिए और उसे परखते रहना चाहिए वरना धोखा खा सकते हैं.

Q. आपके गुरु कौन हैं?

A. 10 सिख गुरुओं से मैंने बहुत प्रेरणा ली है. डॉ. नॉर्मन विंसेंट पील ने तो मेरी जिंदगी बदल दी. मेरी मां, मेरे प्रिंसिपल – यह सब मेरे गुरु हैं.

Q. आपने करीब 20 साल पहले अपनी पहली किताब ‘यू कैन विन’ लिखी थी. तब से अब तक दुनिया काफी बदल चुकी है. बदले वक्त में क्या आपके कुछ सुझाव या फॉर्मूले भी बदले हैं?

A. ठीक है, आजकल मोबाइल का बोलबाला है, आर्टिफिशल इंटेलिजेंस आ गई है लेकिन जो बेसिक बातें हैं, वे बदली नहीं हैं. मूल नियम, सिद्धांत कभी नहीं बदलते.

Q. भविष्य की आपकी योजना?

A. तीन किताबें और लिखूंगा.

Q. किस बारे में?

A. इसी पर होंगी कि जिंदगी में कामयाबी कैसे पाए. जैसे-जैसे मैं जिंदगी से सीख रहा हूं, अपनी किताबों में समेट कर पेश करता जाता हूं.

Q. अपनी जिंदगी से 5 सबक क्या सीखे?

A.
1. जिंदगी में फोकस्ड रहना सीखें.
2. एकाग्रचित होकर काम करें.
3. सबकी जिंदगी में लहर आती है, उस बहाव को पहचान कर उस पर सवार होकर आगे बढ़ें.
4. अपनी जिंदगी की प्राथमिकताओं को न भूलें. प्राथमिकताओं के हिसाब से ही उन्हें वक्त दें.
5. जिंदगी में सबसे कीमती चीज वक्त है, उसे बर्बाद न करें.

Q. आजकल टेंशन आम समस्या है. इसका हल?

A. टेंशन हम खुद पालते हैं. जब आप अपनी प्राथमिकताओं में गड़बड़ करते हैं, इंपॉर्टेंट काम की जगह अर्जेंट कामों को अपना सारा वक्त दे देते हैं तो गड़बड़ हो जाती है. तनाव दो तरह का होता हैः पॉजिटिव और नेगेटिव.

पॉजिटिव तनाव होता है तो हम अच्छा परफॉर्म कर पाते हैं. एक ऐथलीट को परफॉर्मेंस की टेंशन होती है तो वह बहुत बेहतर प्रदर्शन कर पाता है जबकि नेगेटिव तनाव शरीर और मन को पैरालाइज कर देता है. वह हमारी इम्युनिटी को खत्म कर देता है.

समझने के लिए एक मिसाल लेते हैं. किसी की चमचमाती नई कार है. एक बाइकवाले से कार का बंपर टच हो गया. इतने में कारवाले ने हल्ला मचा दिया. मरने-मारने पर उतारू हो गया. दूसरी तरफ एक हादसे में कार पलट गई, लेकिन कारवाला खुश है – मैं किस्मत वाला हूं कि बच गया, इतना खतरनाक हादसा होकर भी.

हादसा दोनों के साथ हुआ बल्कि दूसरे के साथ ज्यादा बड़ा हादसा हुआ लेकिन सही एटिट्यूड से उसे तनाव नहीं हुआ. यानी तनाव बाहरी घटना से नहीं आता, उस घटना की हमारी व्याख्या से आता है. तो तनाव दूर रखना है तो अपना एटिट्यूट दुरुस्त करना होगा.

Q. जिंदगी का मकसद क्या है?

A. जिंदगी का मकसद है, मकसद भरी जिंदगी.

Q. आपके इस जवाब में तो उलझ गया.

A. बिना मकसद के जीना टाइमपास है.

Q. मकसद क्या हो?

A. मकसद आपकी सोच पर, आपके उसूलों पर निर्भर करता है. किसी को एक काम से खुशी मिलती है तो किसी को दूसरे काम से. कुछ लोगों को दूसरों का दुख दूर करके खुशी मिलती है तो किसी को दूसरों को तकलीफ देकर.

Q. हमारे यहां तो जीवन का चरम लक्ष्य मोक्ष माना गया है?

A. मोक्ष की बात करना बेमानी है. मौत के बाद क्या होता है, कोई नहीं जानता. इसलिए हमें मौजूदा जिंदगी को सलीके से जीना सीखना चाहिए.

शिव खेड़ा के चंद बेहतरीन कोटः

जिंदगी की 3 सबसे बड़ी प्राथमिकताएं हैं : सेहत, रिश्ते और दौलत.

कामयाब लोग कठिनाइयों के बावजूद सफलता हासिल करते हैं, न कि तब, जब कठिनाइयां नहीं होतीं.

जब हम अपनी हदों और सीमाओं को नहीं जानते, तो हम बड़े और ऊंचे काम करके खुद को ही हैरान कर देते हैं.

कोई आदमी अपने बारे में जो सोचता है, उसी से उसकी तकदीर तय होती है.

अनुशासन का पालन करें. आत्म-अनुशासन हमारे आनंद को खत्म नहीं करता, बल्कि बढ़ाता है.

गलती को दोहराना सबसे बड़ी गलती है.

समझदारी का मतलब है – छोटी-छोटी बातों और बहस में न उलझना.

किसी को माफ तो कर दो, लेकिन उसका नाम मत भूलो.

अनियमित कड़ी मेहनत से कहीं बेहतर है नियमित रूप से की गई थोड़ी-सी कोशिश, जो अनुशासन से आती है.

अपने दिमाग को रोज अच्छे विचारों की खुराक दें.

इतने मजबूत बनें कि हमारे मन की शांति को कोई भी बंदा भंग न कर सके.

खतरे उठाइए, पर जुआ मत खेलिए.

दूसरों के बर्ताव का बेवजह गलत मतलब निकालने से बचें.

Comments

comments

loading...

LEAVE A REPLY