जनसंख्या हस्तांतरण तब तक चलना चाहिये था जब तक कि अंतिम व्यक्ति चला न जाता

सोच के देखिये कि भारत का विभाजन न हुआ होता तो क्या होता?

आज का पाकिस्तान और बांग्लादेश हमारे देश का हिस्सा होते. आज उस अखंड भारत की जनसंख्या 155 करोड़ होती.

आज जबकि भारत की जनसंख्या 121 करोड़ है तो भाईजान लोग लगभग 20 करोड़ यानी लगभग 13.5% हैं.

अखंड भारत में इनकी जनसंख्या 55 करोड़ होती यानी कि अखंड भारत में इनकी जनसंख्या 33% होती.

13% में इन्होनें जीना हराम कर रखा है, सोच के देखो ये 33% में क्या करते???

इस लिहाज़ से देखा जाए तो विभाजन एक बहुत अच्छा कदम था.

इन्होंने कहा था कि 2 Nation theory मने तुम केर हम बेर… हम साथ साथ नहीं रह सकते, हमें अलग कर दो… आओ घर का बंटवारा कर लें…

हो गया बंटवारा… अच्छा हुआ…

गांधी, नेहरू, पटेल समेत पूरी कांग्रेस और संघ समेत तब का समूचा विपक्ष इस बात का दोषी है कि जब 2 Nation Theory के तहत घर बांट ही लिया तो फिर इन 13% को यहां क्यों रख लिया?

इस से बड़ी मूर्खता क्या होगी??? जब इनको यहीं रहना था तो फिर बंटवारे का मतलब क्या???

इसीलिए आज जब ये छाती ठोक के कहते हैं कि ये मुल्क हमारा है… ध्यान दीजिए “हमारा भी” नहीं कहते बल्कि ” हमारा ” कहते हैं. तब कहना पड़ता है कि तुम्हारे हिस्से का मुल्क तुम 47 में ले चुके हो …….. खाली करो ……..

1947 के समूचे राजनीतिक नेतृत्व ने, समूची political leadership ने मुल्क के साथ धोखा किया.

तत्कालीन विपक्ष क्यों चुप बैठ गया???

नवंबर 1947 के बाद, जबकि मारकाट शांत हो गयी थी, और शांति स्थापित हो गयी थी, तब जनसँख्याओं का स्थानांतरण, अदला बदली बंद क्यों कर दी गयी.

उन दिनों भारतीय रेल दिल्ली से लाहौर तक फ्री ट्रेन सेवा चलाती थी जो 1955 तक उसी तरह फ्री चली.

शेष बची 4 करोड़ जनसंख्या का स्थानांतरण क्यों नहीं हुआ??? नेहरू ने तो इनको वोट बैंक समझ के रोक लिया. संघ चुप क्यों बैठा???

परिवार का मुखिया गलती करे तो आने वाली पीढ़ियाँ भोगती हैं. जब देश के लीडर गलती करते हैं तो पूरा देश अगले 1000 साल भोगता है.

सच ये है कि जिन्ना तो विभाजन न करने को मान गए थे.

नेहरू और पटेल नहीं माने थे. इनको प्रधानमंत्री बनने की इतनी चुल्ल मची थी कि इन्होंने 100 प्याज भी खाई और 100 जूते भी.

पटेल ने देश भी बांट लिया और 4 करोड़ मियाँ भी रख लिए.

कल लिखे उपरोक्त लेख में देश विभाजन और उसके बाद 4 करोड़ मुसलमानों को पाकिस्तान न भेज कर यही रख लेने की भयंकर गलती के लिये मैंने सरदार पटेल समेत तत्कालीन विपक्ष और RSS को भी इस पाप का दोषी बताया है.

कई मित्रों ने लिखा है कि पटेल को काहे लपेट लिये? संघ को काहे लपेट लिये?

आज 70 साल बाद तो ये कहना ही पड़ेगा कि सरदार पटेल उस ज़माने में गाँधी, नेहरू के बाद कांग्रेस के सबसे बड़े नेता थे… आज़ाद भारत के पहले गृह मंत्री थे…

उनको तो नैतिक जिम्मेवारी लेनी ही पड़ेगी… नवंबर 1947 के आसपास जब कि मारकाट कुछ थम गई थी और प्रशासन ने स्थिति काबू कर ली थी… तब जनसंख्या हस्तांतरण रोक क्यों दिया गया?

नेहरू-गाँधी उन 4 करोड़ मुसलमानों को यहीं रखना चाहते थे जिसमें वो कामयाब रहे… पटेल उनके इस षड्यंत्र के भागी क्यों बने???

संघ समेत सारा विपक्ष क्या घुइयां छील रहा था? वो क्यों चुप रहे? उन्होंने इसे कैसे स्वीकार कर लिया? उनको दोषी क्यों न ठहराया जाए?

इस पाप के लिए हर वो व्यक्ति दोषी है जो 1947 में था.

जनसंख्या हस्तांतरण तब तक चलना चाहिये था जब तक कि अंतिम व्यक्ति चला न जाता… बेशक़ इसमे 20 साल ही क्यों न लगते…

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