इतिहास बताता है कि कौन था अंग्रेजों का दलाल-चाटुकार

लन्दन के बकिंघम पैलेस में ब्रिटेन की महारानी/महाराजा से ‘नाइटहुड’ (सर) की उपाधि लेने की प्रक्रिया अत्यन्त अपमानजनक है.

यह उपाधि लेनेवाले व्यक्ति को ब्रिटेन के प्रति वफादारी की शपथ लेनी पड़ती है और इसके पश्चात् उसे महारानी/महाराजा के समक्ष सिर झुकाकर एक कुर्सी पर अपना दायाँ घुटना टिकाना पड़ता है.

ठीक इसी समय महारानी/महाराजा उपाधि लेने वाले व्यक्ति की गरदन के पास दोनों कन्धों पर नंगी तलवार से स्पर्श करते हैं. तत्पश्चात् महारानी/महाराजा उपाधि लेने वाले व्यक्ति को ‘नाइटहुड’ पदक देकर बधाई देते हैं.

यह प्रक्रिया सैकड़ों वर्ष पुरानी है और भारत में जिस जिसको यह उपाधि मिली वो सभी ‘सर’ इस प्रक्रिया से गुजरे थे.

ब्रिटेन अपने देश और अपने उपनिवेशों में अपने चाटुकारों को ब्रिटेन के प्रति निष्ठवान बनाने के लिए ऐसी अनेक उपाधियाँ देता रहा है. नाइटहुड (सर) की उपाधि उनमें सर्वोच्च होती थी.

गुलाम भारत में ब्रिटिश शासकों द्वारा देश के अनेक राजा-महाराजा, सेठ-साहूकार, राजनीतिज्ञ, शिक्षाविद आदि ब्रिटेन के प्रति वफादार रहने की शपथ लेने के बाद ही ‘नाइटहुड’ से सम्मानित किए गए थे.

इतिहास बताता है कि ब्रिटिश हुकूमत उसी को नाइटहुड (सर) की सर्वोच्च उपाधि से सम्मानित करती थी जिसे वो अपना वफादार चाटुकार दलाल मुखबिर मानती थी.

हालांकि औपचारिक रूप से कहा यह जाता था कि व्यक्ति को अपने कार्यक्षेत्र में उल्लेखनीय योगदान के लिए यह उपाधि दी जाती है.

इसीलिए कभी कभी दिखावे के लिए कुछ वैज्ञानिकों, चिकित्सकों, शिक्षाविदों को भी यह उपाधि दे दी जाती थी.

कुछ अपवादों को छोड़कर देश के लगभग सभी राजा महाराजा नवाब और सेठ साहूकार आदि ब्रिटिश शासकों के तलुए चाटा करते थे. यह रहस्य किसी से छुपा नहीं है.

अतः उनको दरकिनार कर के आइए जानिए तत्कालीन राजनीति से जुड़े कुछ ऐसे बड़े नामों को जिन्होंने ब्रिटेन के प्रति वफादार रहने की शपथ लेकर नाइटहुड (सर) की उपाधि ब्रिटिश दरबार में घुटना टेक कर ग्रहण की थी.

पहला नाम

सन 1890 में भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के राष्ट्रीय अध्यक्ष फिरोजशाह मेहता बने थे. मेहता जी ने भारतीय स्वतंत्रता की लड़ाई इतने जुझारू तरीके से लड़ी थी कि 1904 में ब्रिटिश शासकों ने उनको नाइटहुड (सर) की उपाधि से सम्मानित किया था.

दूसरा नाम

सन 1900 में नारायण गणेश चंदावरकर भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस का राष्ट्रीय अध्यक्ष बना था. वह देश के प्रति कितना वफादार था और अंग्रेजों के प्रति कितना वफादार था यह इसी से स्पष्ट हो जाता है कि कांग्रेस का राष्ट्रीय अध्यक्ष बनने के साल भर बाद ही अंग्रेज़ी हुकूमत ने नारायण गणेश चंदावरकर को 1901 में बॉम्बे हाईकोर्ट का जज नियुक्त कर दिया था.

देश को अंग्रेजों से मुक्त कराने के लिए बनी कांग्रेस के उस राष्ट्रीय अध्यक्ष नारायण गणेश चंदावरकर ने जज बनकर अंग्रेजों की इतनी गज़ब सेवा की कि 1910 में ब्रिटिश शासकों ने नारायण गणेश चंदावरकर को नाइटहुड (सर) की उपाधि से नवाजा था. 1913 में जज के पद से रिटायर होने के बाद यह चंदावरकर फिर कांग्रेस का बड़ा नेता बन गया था.

तीसरा नाम

1907 और 1908 में लगातार 2 बार अखिल भारतीय कांग्रेस कमेटी के राष्ट्रीय अध्यक्ष बने रासबिहारी घोष (ध्यान रखिएगा रासबिहारी बोस नहीं, रासबिहारी घोष. दोनों अलग व्यक्ति हैं. बोस जी बहुत महान थे) ने कांग्रेस के झंडे तले अंग्रेजों के खिलाफ भारतीय स्वतंत्रता की लड़ाई इतनी ज़ोरदारी और ईमानदारी से लड़ी थी कि सन 1915 में ब्रिटिश शासकों ने रासबिहारी घोष को नाइटहुड (सर) की उपाधि से सम्मानित किया था.

चौथा नाम

सन 1897 में अंग्रेज़ सरकार का एडवोकेट जनरल चेत्तूर संकरन नायर कांग्रेस का राष्ट्रीय अध्यक्ष बना था. नायर ने कांग्रेस के झंडे तले देश की आज़ादी की लड़ाई इतने भीषण तरीके से लड़ी थी कि अंग्रेजों ने 1904 में उसको कम्पेनियन ऑफ इंडियन एम्पायर की तथा 1912 में नाइटहुड (सर) की उपाधि देकर समान्नित तो किया ही था साथ ही साथ 1908 में ब्रिटिश सरकार ने उसे मद्रास हाईकोर्ट का जज नियुक्त किया था. 1915 में वह उसी पद से रिटायर हुआ था.

यह चार नाम किसी छोटे-मोटे कांग्रेसी नेता के नहीं बल्कि कांग्रेस के उन राष्ट्रीय अध्यक्षों के हैं, जिन्होंने ब्रिटिश दरबार में घुटने टेक कर ब्रिटेन के प्रति वफ़ादार रहने की कसम खायी थी.

अतः आज यह प्रश्न स्वाभाविक है कि पेशे से वकील इन राजनेताओं ने ऐसा कौन सा उल्लेखनीय कार्य किया था जिससे ब्रिटिश सरकार इतनी गदगद हो गयी थी कि उन्हें नाइटहुड (सर) की सर्वोच्च उपाधि से सम्मानित कर डाला था?

अंग्रेजों के वफादार रहे कुछ और नामों के ऐसे उदाहरण भी हैं जिनको आज़ादी मिलने के बाद महत्वपूर्ण पद सौंप दिए गए.

आइए उनमें से कुछ नामों से आज आप भी परिचित होइए…

पहला नाम है फ़ज़ल अली का. इसे अंग्रेजों ने पहले खान साहिब, फिर खान बहादुर की उपाधि दी और फिर 1942 में नाइटहुड (सर) की उपाधि से तब नवाज़ा गया था जब देश ‘अंग्रेजों भारत छोड़ो’ आन्दोलन की तैयारी कर रहा था.

लेकिन 1947 में आज़ादी मिलने के बाद नेहरू सरकार ने इस फ़ज़ल अली को उड़ीसा का गवर्नर बनाया, फिर असम का गवर्नर बनाया. फ़ज़ल अली 1959 में असम के गवर्नर के रूप में ही मरा था.

एन गोपालस्वामी अयंगर नाम के एक नौकरशाह की ब्रिटेन के प्रति वफादारी से अंग्रेज़ हुक्मरान इतना गदगद थे कि अंग्रेजों ने 1941 में उसको नाइटहुड (सर) की उपाधि से तो नवाज़ा ही था साथ ही साथ दीवान बहादुर, आर्डर ऑफ दी इंडियन एम्पायर, कम्पेनियन ऑफ दी ऑर्डर ऑफ दी स्टार ऑफ इंडिया सरीखी 7 अन्य उपाधियों से भी नवाज़ा था.

1947 में देश को आज़ादी मिलते ही बनी पहली कांग्रेस सरकार के प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू इस गोपालस्वामी अयंगर पर इतना मेहरबान हुए थे कि उसे बिना विभाग का मंत्री बनाकर अपनी केबिनेट में जगह दी. फिर 1948 से 1952 तक देश का पहला रेलमंत्री नियुक्त किया. तत्पश्चात 1952 में उसे देश के रक्षामंत्री सरीखा महत्वपूर्ण पद सौंप दिया था.

लेख बहुत लंबा हो जाएगा इसलिए बस इतने उदाहरण ही पर्याप्त हैं. क्योंकि अपने चाटुकार वफादारों दलालों को ब्रिटिश हुक्मरान राय बहादुर, साहब बहादुर, खान बहादुर सरीखी उपाधियों से भी सम्मानित करती थी. उपरोक्त उपाधि पाने वालों की सूची में दर्ज तत्कालीन कांग्रेसी नेताओं के नाम भी यदि लिखूंगा तो लेख बहुत लंबा हो जाएगा.

अतः केवल सर्वोच्च उपाधि नाइटहुड (सर) के इन उदाहरणों के उल्लेख के साथ ही यह स्पष्ट करना चाहूंगा कि 1947 से पहले ब्रिटिश हुकूमत का वफादार होने का मतलब ही हिंदुस्तान का गद्दार होना होता था.

अतः कांग्रेस को यह बताना चाहिए कि ब्रिटिश शासकों ने राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (RSS) के, हिन्दू महासभा के कितने नेताओं/कार्यकर्ताओं को नाइटहुड (सर) या राय बहादुर, साहब बहादुर, खान बहादुर की उपाधि से सम्मानित किया था?

मित्रों, इसका जवाब शून्य ही है.

अतः इस सच्चाई व ऊपर उल्लिखित नाइटहुड (सर) की उपाधि पाए नामों को पढ़कर यह आप स्वयं तय कर लीजिए कि 1947 से पहले अंग्रेजों का वफादार दलाल मुखबिर कौन था?

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