काशी विश्वनाथ मंदिर मार्ग के चौड़ीकरण और सुगम व्यवस्था बनाने का सत्य

विश्वनाथ मन्दिर के आसपास जो भूमि है उसपर कभी किसी जमाने में, आज से सौ पचास साल पहले, देश के विभिन्न क्षेत्रों में रहने वाले सेठों ने छोटे-छोटे मन्दिर बनवाए थे तथा उन मन्दिरों में नित्य पूजा करने के लिए पुजारी रख दिए थे.

सेठों ने उन पुजारियों से कहा था कि ये हमारे द्वारा स्थापित किये गए देवता हैं तुम एक सेवाइत के रूप में इनकी पूजा अर्चना करते रहो हम तुमको साल छः महीने पर धन भेजते रहेंगे.

सेवाइत का अर्थ होता है कि किसी के द्वारा दी गयी प्रॉपर्टी की देखभाल और देवता की सेवा करने वाला किंतु उस प्रॉपर्टी को बेचने का अधिकार सेवाइत को नहीं होता.

कालांतर में जब सेठ लोग काल-कवलित हो गए और उनके परिवार वालों ने मन्दिरों की सेवा हेतु धन भेजना बन्द कर दिया तब इन्हीं पुजारियों ने उन मन्दिरों के ऊपर घर-दूकान आदि बनवा लिए और उसमें रहने भी लगे. कुछ लोगों ने जुगाड़ कर के घर दूकान के कागज़ात भी बनवा लिए.

अर्थात् जो स्थान पूर्णरूप से देवस्थल होना चाहिये था, जिसे कभी किसी जमाने में धर्म के प्रति अनुराग रखने वाले सेठों ने बनवाया था, अब उसमें पुराने छोटे से मन्दिर के साथ दो तल्ले का आवास और व्यवसाय भी हो गया.

इसीलिए आज कोई भी जब विश्वनाथ गली के भीतर जायेगा तो प्रमुख मन्दिरों को छोड़ दिया जाये तो छोटे मन्दिर अकेले नहीं दिखेंगे बल्कि उनके ऊपर बना आवास और दूकानें भी नजर आएंगी.

समस्या यह है कि विश्वनाथ मन्दिर कॉम्पलेक्स को विस्तार देने और संकरी गलियों के मार्ग को चौड़ा कर सुगम बनाने की योजना को प्रशासन खुल कर नहीं बता रहा है.

वास्तविक प्लान क्या है यह किसी को नहीं पता. परन्तु तथ्य यह भी है कि कोई भी भवन जबर्दस्ती या डरा धमका कर नहीं हथियाया जा रहा है. प्रत्येक भवन का चार गुना पैसा दिया जा रहा है.

लोग तो यहाँ तक कह रहे हैं कि विश्वनाथ गली में कोई भवन यदि दूने दाम पर मिल रहा है तो खरीद लो और फिर सरकार को बेच दो चार गुना दाम मिलेगा.

मकानों में जो किरायेदार बसे हैं उनसे बातचीत की जा रही है. आवासीय और व्यवसायिक दोनों को एडजस्ट करने का प्लान है. यहाँ तक कि जो मकान बेचे हैं उनको भी अगर दूसरी जगह चाहिए तो वो भी दी जायेगी.

समस्या केवल यह है कि प्रशासन पूरा प्लान सामने नहीं रख रहा जिसके कारण अफवाहें फैल रही हैं. जनता में प्रशासन संग सहभागिता की भावना की भी भारी कमी है.

यह कार्य दो साल पहले प्रारंभ हुआ था किंतु उस समय विश्वनाथ मन्दिर के आसपास रहने वाले किसी भी नागरिक ने प्रशासन से बात करने अथवा उनको गाइड करने की आवश्यकता नहीं समझी. स्थानीय लोगों को यह बताना चाहिये था कि फलाने मन्दिर का क्या महत्व है और समस्या का समाधान किस प्रकार निकाला जा सकता है.

जहाँ तक काशी की धरोहर को मिटाने का प्रश्न है तो आज के समय में यदि कोई त्रिपुरासुर भी आ जाए तो काशी की धरोहर को नुकसान नहीं पहुँचा सकता.

काशी की धरोहर को सर्वाधिक क्षति उनसे हुई है जिन्होंने पुराने मन्दिरों को पाट कर उसके ऊपर आवास और लैट्रिन बाथरूम बनवा लिए.

आज जब वही पुराने मकान टूट रहे हैं तो उनके नीचे से शिवलिंग और मूर्तियां निकल रही हैं. सम्भवतः ये वही मन्दिर हैं जिनका विवरण प्राचीन ग्रन्थों में मिलता है.

विश्वनाथ मन्दिर के विस्तारीकरण की प्रक्रिया में बहुत अधिक मार्ग चौड़ा नहीं किया जाना है, प्रारंभिक कार्ययोजना से यही प्रतीत होता है. केवल मन्दिर के पीछे से मणिकर्णिका घाट तक का मार्ग चौड़ा होगा जिसकी दूरी 500-700 मीटर से अधिक नहीं है.

ध्यान देने वाली बात यह भी है कि आज जो लोग चिल्ला रहे हैं, उन्होंने काशी की धरोहर को संजोने और उसका रखरखाव करने का प्रयास नहीं के बराबर किया है.

घाटों पर न जाने कितनी प्रतिमाएं क्षत विक्षत अवस्था में मिलती हैं. उन्हीं घाटों पर लोग पेशाब तक करते थे जबकि शास्त्रों में गंगा जी के किनारे मल मूत्र त्यागने की मनाही है. घाट किनारे गलियों में ऐसी सुंदर शिल्पकृतियां मिलती हैं जिन पर दशकों से धूल गर्द जमी है किंतु उन्हें कोई पोछने वाला तक नहीं है.

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