रूस की गुप्त यात्रा के बाद, अब वैटिकन क्यों गईं सोनिया!

वर्ष 2005 में रूस के 'अर्ध-सरकारी' दौरे पर सोनिया गांधी

राहुल गांधी की कांग्रेस के वाकई दुर्दिन चल रहे हैं. एक तरफ तो वो अपने अधकपारी अध्यक्ष की बेवकूफी भरी चुनौतियों पर मिल रहे जवाब से परेशान हैं और दूसरी ओर आर्थिक संकट में फंसते जा रहे हैं.

पिछले 7 दशकों से कांग्रेस को कभी धन की कमी नहीं रही है और इतनी अकूत धन वर्षा होती रही है कि उनके अध्यक्षों और उनके परिवार वालों को धन उपार्जन के लिये कोई काम भी नहीं करना पड़ा है.

यह धनवृष्टि कितनी घनघोर थी इसका अंदाज़ा इसी बात से लग जाता है कि कांग्रेस के वर्तमान अध्यक्ष राहुल गांधी फ़टी जेब का कुर्ता पहनने के बाद भी मालिश कराने बैंकॉक ही जाते हैं और उनकी माता जो पूर्व में कांग्रेस की अध्यक्षा रही हैं, वे बिना कोई उद्यम किये, विश्व की चौथी सबसे धनी राजनीतिज्ञ मानी जाती रही है.

कांग्रेस जब तक सत्ता में रही है तब तक तो उसको धन की कभी कमी नहीं रही थी लेकिन 2014 के बाद से एक के बाद एक राज्यों से सत्ता से बाहर होने के बाद, उसको धन की दिक्कत आती रही है.

वैसे तो कांग्रेस अपने चुनावों व अध्यक्षों और उनके परिवार को पालने के बोझ के लिए ले देकर अपनी पंजाब व कर्नाटक की सरकारों पर निर्भर थी लेकिन पंजाब के मुख्यमंत्री कैप्टन अमरिंदर सिंह द्वारा अपने अध्यक्षों की 10 जनपथ स्थित मजार पर चढ़ावा चढ़ाना बहुत पहले से बन्द कर देने के बाद से, अब सिर्फ कर्नाटक ही उनकी आय का स्रोत रह गया है.

यहां ऐसा भी नहीं है कि कांग्रेस के अध्यक्षों के पास धन नहीं है बल्कि उनके पास तो अकूत धन है लेकिन दिक्कत यही है कि वह काले धन के रूप में विदेशों में रखा हुआ है जिसको मोदी सरकार की आर्थिक नीतियों और नये कानूनों के कारण, भारत में लाना लगभग असंभव हो गया है.

अब उनके लिये, इस धन का उपयोग करना केवल भारत के बाहर ही विभिन्न शेल कम्पनियों और एनजीओ के माध्यम से ही संभव हो पा रहा है.

अब कांग्रेस की वित्तीय आपातकाल की स्थिति का अंदाज़ा इसी बात से लगाया जा सकता है कि आज सोनिया गांधी को रूस से लेकर वैटिकन तक धन की उगाही करने जाना पड़ रहा है. इसको पूरी तरह समझने के लिये हमें थोड़ा पीछे जाना पड़ेगा.

70 व 80 के दशक में सोवियत रूस की गुप्तचर संस्था केजीबी के कई वरिष्ठ अधिकारियों ने जिन्होंने वहां से भाग कर, पाश्चात्य देशों में शरण ली थी, अपनी किताबों व साक्षात्कार में यह खुलासा किया था कि 70 के दशक से ही भारत में इंदिरा गांधी व उनके परिवार को हर वर्ष सोवियत रूस द्वारा, केजीबी के माध्यम से धन दिया जाता था, जो स्विट्ज़रलैंड के बैंकों में भेजा जाता था.

यह धन देने का सिलसिला इंदिरा गांधी के प्रधानमंत्रित्व काल 1984 तक जारी रहा था. इस सम्बंध को फिर से शुरू करने के लिये, राजीव गांधी ने पहल की थी.

बहुतों को यह बात याद नहीं होगी कि राजीव गांधी ने 1985 में अपनी योरप की आधिकारिक यात्रा की समाप्ति पर, हॉलैंड से बिना किसी आधिकारिक कार्यक्रम के व विदेश मंत्रालय को बिना पूर्व सूचना दिये, अपनी पत्नी सोनिया गांधी के साथ मॉस्को, सोवियत रूस की 24 घण्टे के लिये यात्रा की थी.

इस यात्रा व उसके उद्देश्य को लेकर भारत सहित, पूरे विश्व में बड़ी चर्चा रही थी. उस वक्त, अंतर्राष्ट्रीय मीडिया का यह आंकलन था कि राजीव गांधी, सोवियत रूस को अपनी माँ इंदिरा गांधी से बने संबंधों की निरंतरता के प्रति आश्वस्त कराने गये थे. सोवियत रूस व गांधी परिवार के बीच का यह सम्बंध सोवियत रूस के टूटने तक चलता रहा था.

गांधी परिवार और सोवियत रूस के बीच के सबंधों में आयी इस टूटन को नये सिरे से जोड़ने का काम सोनिया गांधी व वर्तमान में रूस ने यूपीए के प्रथम काल मे शुरू हुआ था जब दिसम्बर 2004 में रूस के राष्ट्रपति पुतिन भारत की यात्रा पर आये थे और उन्होंने सोनिया गांधी से अकेले मुलाकात की थी.

यहां यह समझना महत्वपूर्ण है कि सोनिया गांधी भारत के किसी संवैधानिक पद पर नहीं थीं और रूस के राष्ट्रपति पुतिन, स्वयं पूर्व के सोवियत रूस की गुप्तचर संस्था केजीबी के महत्वपूर्ण अधिकारी थे.

इसी मुलाकात के बाद मई 2005 में सोनिया गांधी एक 3 दिवसीय अर्धसरकारी (यह एक बेहूदा लेबल था, जो एक गैर संवैधानिक व्यक्ति की विदेश यात्रा को वैधानिकता प्रदान करने के लिये गढ़ा गया था) दौरे पर, रूस के राष्ट्रपति पुतिन की व्यक्तिगत मेहमान बन कर गयी थी.

यहां यह खास बात है कि सोनिया गांधी ने यह यात्रा रिलाइंस इंडस्ट्री के हवाई जहाज से अकेले की थी और उनके साथ जाने वाले तत्कालीन विदेश मंत्री नटवर सिंह व अन्य अधिकारियों ने, रूस की हवाई सेवा, ऐरोफ्लोट से यात्रा की थी.

यह अर्धसरकारी यात्रा, जिसमे विदेश मंत्री भी शामिल थे, वह इतनी गुप्त थी कि इस यात्रा के उद्देश्यों और परिणामों के बारे में लोकसभा से लेकर सरकार के किसी भी विभाग में कोई जानकारी उपलब्ध नहीं है.

मुझे इतने विस्तार में पूर्व के घटनाक्रम को इसलिये बताना पड़ा है ताकि लोग अभी हाल में सोनिया गांधी की रूस की यात्रा का आर्थिक महत्व समझें.

मैं सोशल मीडिया पर चल रही इस बात को नहीं स्वीकार कर पा रहा हूँ कि सोनिया गांधी की रूस की रहस्यमयी यात्रा, नरेंद्र मोदी की हत्या कराने के उद्देश्य से है.

हां, यह अवश्य है कि नरेंद्र मोदी को 2019 में दोबारा सत्ता में आने से रोकने के लिये, सोनिया गांधी ने पुतिन व रूस में अभी भी प्रभावी भूतपूर्व सोवियत रूस के केजीबी सूत्रों से आर्थिक व लॉजिस्टिक मदद मांगी होगी.

यह सही है कि पुतिन, मोदी सरकार की रूसी अस्त्रों पर पूर्व की आत्मनिर्भरता से अलग होने की नीति पर चलने से विह्वल हैं लेकिन मोदी की वैश्विक स्थिति उन्हें भारत की राजनीति में सीधे दखल देने से रोकेगी. अब सोनिया गांधी की मोदी जी को हटाने में पुतिन कितने सहायक होंगे यह भविष्य की घटनाएं ही बतायेंगी.

लेकिन सोनिया गांधी की अब वैटिकन की यात्रा यह अवश्य संकेत दे रहे है कि कम से कम आर्थिक मदद के मामले में रूस में उन्हें कोई विशेष सफलता नहीं मिली है. यदि उन्हें सफलता मिली होती तो उन्हें व्यक्तिगत रूप से वैटिकन की यात्रा पर नहीं जाना पड़ता.

यहां मेरा ध्यान उन समाचारों की तरफ जा रहा है जिसमें यह इशारा किया गया था कि स्विट्ज़रलैंड के बैंकों पर कालेधन के खुलासे के दबाव बढ़ने व भारत की सरकार द्वारा स्विट्ज़रलैंड की सरकार से वहां पड़े भारतीय नागरिकों के धन की सूचना साझा करने के कूटनैतिक प्रयासों के कारण लोगों ने अपने धन को अन्य ठिकानों में जमा कराने का प्रयास किया है.

उसी के साथ यह भी समाचार था कि 2015-16 में गांधी परिवार के धन का एक बड़ा भाग स्विस बैंकों से, वेटिकन के बैंक के साथ हांगकांग में चीन के बैंक में स्थानांतरित किया गया है.

इसी को लेकर मेरा सन्देह है कि सोनिया गांधी को सत्ता में वापसी करने व मोदी के नेतृत्व में फिर से 2019 में सरकार बनने से रोकने के लिये, अपने खज़ाने को कुछ खाली करना पड़ रहा है.

जैसा कि मैंने शुरू में ही कहा था कि कांग्रेस आर्थिक आपदा से जूझ रही है, उसकी पुष्टि इससे भी हो रही है कि कांग्रेस ने जो 800 करोड़ रुपये कैम्ब्रिज एनालिटिका पर लगाये थे, वे कल बुधवार दो मई 2018 को डूब गये है.

इंग्लैंड से समाचार मिला है कि कैम्ब्रिज एनालिटिका और उसकी मातृ कम्पनी जेसीएल ने कल बुधवार से अपना कारोबार बंद कर दिया है. यही नहीं, कैम्ब्रिज एनालिटिका ने इंग्लैंड में दिवालिया होने की प्रक्रिया शुरू कर दी है ताकि उसे अमेरिका के फेडरल कोर्ट में इंसॉलवेंसी प्रोटेक्शन एक्ट के अधीन सुरक्षा प्रदान की जा सके.

अब आगे आगे देखिये, कौन कौन सी शक्तियां अपने अपने प्रारब्ध को प्राप्त होती हैं.

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