चुन लो अपना घर

अब वो चुनाव पास आ रहा है जिसे अस्तित्व का चुनाव कहें तो उचित होगा.

व्यग्रता और क्रोध दोनों ही तरफ उफान मार रहा है. चीजें खतरनाक रूप लेती दिख रही हैं.

लेकिन स्थिति अगर टुकड़े-टुकड़े खेमे के प्रतिकूल नहीं होती तो सच शायद ही सामने आ पता.

वामिस्लामी गठजोड़ इतना नंगा कभी नहीं दिखा. अब बेचारे गुमराह युवा कहीं बम फोड़ेंगे, कहीं रेल की पटरी उखाड़ेंगे, और पढ़े लिखे उम्रदराज लोग अखबारों, टीवी चैनलों और सोशल मीडिया में समझाएंगे कि भाईयों गुमराह मत होना.

इन निर्दोषों ने बम फोड़े तो इसलिए कि वे लाचार और मजबूर हो चुके थे. सुनो, बात को समझो, बम तो बस इसलिए फोड़ा कि मोदी के सत्ता में आने के बाद सांप्रदायिक ताकतें बेलगाम हो चुकी हैं. ऐसे में बेचारे ये मासूम करें तो क्या?

हमारे गुहा, चोपड़ा, ठाकुरता और वार्ष्णेय अपनी घृणा में इतने अंधे हो चुके हैं कि कभी अलीगढ़ इस्लामी मदरसे में जिन्ना की तस्वीर का बचाव करते करते कायद साहब को धर्मनिरपेक्षता और राष्ट्रवाद का अवतार तो संघ व हिंदू महासभा को पाकिस्तान और जिहाद का जनक बताने लगते हैं.

हाथरस में हिंदुओं के खिलाफ दीवारों पर उतरी वीभत्स घृणा को वे भाजपा और संघ का षड्यंत्र बताएंगे तो फंस जाने पर खुद को सबसे बड़ा हिंदू भी बता देते हैं.

दूसरी ओर मुसलमान हैं जो जयहिंद और भारत के इतने जयकारे लगाते हैं कि हमें लज्जा आने लगे. पर इसके तुरंत बाद वे जिहाद और शरिया के बचाव में जुट जाते हैं. ये उनका काम है. मतलब एक कांड करेगा और दूसरा उसका बचाव करेगा.

फिफ्थ कॉलम यानी घरद्रोही ऐसे ही लड़ते हैं.

भारत में इस समय कई भारत हैं. राष्ट्रवादी तो हैं ही. लेकिन अभी भी सबसे ताकतवर खेमा मलाईखोरवादियों का है जिसमें कांग्रेस की छतरी तले ममता, मुलायम, लालू, केएसआर, करुणानिधि जैसी धर्मनिरपेक्ष पारिवारिक दुकानें हैं.

जेहादियों और रेड इंडियनों (भारतीय कम्युनिस्टों के लिए यह शब्द आदरणीय ज्ञानेंद्र बरतरिया जी ने गढ़ा संभवत:) का इन्हें पूरा समर्थन है. समर्थन क्या कहें, वे इन्हें अपना आदमी समझते हैं जिसे बाद में वे जब चाहेंगे, नेपथ्य में या परलोक भेज देंगे.

एक वर्ग मोलभाव करने वालों का है. वे स्वयं को आंबेडकरवादी कहते हैं. उनकी स्थिति आज वो है जैसे कुछ साल पहले भारत की अंतरराष्ट्रीय जगत में थी.

तब रूस-चीन हों या अमेरिका और यूरोप के लोकतांत्रिक समाज, या जापान, हर कोई भारत को अपने पाले में चाहता था. पर हम बौद्धिक जुगाली करते रहे और किसी पाले में नहीं गए. सबसे सौदेबाजी की.

कुछ साल में समझ में आ गया कि कौन स्वाभाविक साथी है और कौन स्वाभाविक विरोधी. आंबेडकर के नाम पर दो नावों की ये सवारी ज्यादा दिन नहीं चलेगी. तय कर लो कि तुम्हारा अपना घर कहां है. अन्यथा शायद कहीं के नहीं रहो. सौदेबाजी की तटस्थता बस आत्मघात की ओर ले जाती है.

Comments

comments

loading...

LEAVE A REPLY